चार राज्याेंं (पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरलम) और एक केंद्रशासित प्रदेश-पड्डुचेरी के विधानसभा चुनावाें का ऐलान अहम है. इन चुनावाें में कुल 824 विधानसभा सीटाें के लिए मत डाले जाएंगे, जिनके नतीजाें से बेशक केंद्र सरकार की स्थिरता पर काेई असर न पड़े, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति और गठबंधनाें पर इनका प्रभाव जरूर पड़ेगा.यह इलाके भारतीय मानचित्र के वे हिस्से हैं, जहां से 116 सांसद लाेकसभा के लिए चुनकर आते हैं, इसीलिए राष्ट्रीय व क्षेत्रीय दाेनाें दलाें का काफी कुछ दांव पर लगा हुआ है.असम और केरलम जैसे राज्य राष्ट्रीय दलाें (भाजपा, कांग्रेस और वाम पार्टियाें) के बीच चुनावी जंग के गवाह बनेंगे, ताे तमिलनाडु, पुड्डुचेरी और पश्चिम बंगाल में क्षेत्रीय पार्टियाें (द्रमुक, अन्नाद्रमुक, तृणमूल कांग्रेस) की भूमिका अहम हाेगी.
यह चुनाव एक बार फिर विभिन्न राजनीतिक दलाें के जनाधार, उनकी संगठनाात्मक श्नित चुनावी रणनीति और नेतृत्व क्षमता की परीक्षा लेंगे, क्योंकि यह आज भी चुनावी सफलता की कुंजी हैं. निस्संदेह, सुशासन और लाेक- कल्याणकारी राजनीति का खासा महत्व है, पर किसी भी दल की चुनावी नैया उसकी संगठनात्मक श्नित और नेतृत्व क्षमता से पार हाेती है.भाजपा असम और पुड्डुचेरी (एनडीए) में अपनी सरकार बचाने उतरेगी, जबकि दाे क्षेत्रीय पार्टियां-तृणमूल और द्रमुक क्रमश: पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में. केरल में वाम दलाें वाले एलडीएफ की परीक्षा हाेगी. भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनाैती असम और पुड्डुचेरी में अपनी सत्ता बनाए रखने की है, फिर वह पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी काे हराने का प्रयास करेगी, जाे बीते 15 वर्षाें से कुर्सी पर काबिज हैं.
2021 के विधानसभा चुनावाें में असम में भाजपा (60 सीटें) ने अपने सहयाेगियाें के साथ 75 सीटें जीतीं और 43.9 फीसदी मत पाए थे. इसके उलट, ‘इंडिया’ ब्लाॅक के खाते में, जिसे यहां महाजाेत कहा जाता था, 42.3 फीसदी मत के साथ 50 सीटें आई थीं. यानी, सीटाें के मामले में बेशक दाेनाें में बड़ा अंतर था, पर मत प्रतिशत के लिहाज से फर्क उन्नीस-बीस का ही था. इसका अर्थ है कि जनाधार में मामूली बदलाव भी यहां एनडीए के समीकरण काे बिगाड़ सकता है. जाहिर है, असम में चुनावी सफलता की कुंजी, जन-समर्थन के अलावा, गठबंधन हाेगा और यह देखना दिलचस्प हाेगा कि कांग्रेस व भाजपा जैसी पार्टियां किस तरह छाेटे-छाेटे क्षेत्रीय दलाें के साथ साझेदारियां बनाती हैं, जिनका छाेटे कबीलाें, जातियाें और समुदायाें में प्रभाव है.
पश्चिम बंगाल की जंग असम के मुकाबले कहीं अधिक करीबी हाे सकती है यहां तृणमूल बीते डेढ़ दशक से सत्ता में है, इसलिए मतदाताओं में सरकार के प्रति कुछ हद तक नाराजगी भी है. भाजपा इसे भुनाने का प्रयास कर सकती है. हालांकि, ्नया वास्तव में मतदाताओं में सरकार-विराेधी रुझान है? इसका जवाब ठीक-ठीक नहीं दिया जा सकता.उल्लेखनीय है कि तृणमूल सरकार ने चुनाव की घाेषणा से ठीक पहले सरकारी कर्मचारियाें के लंबित महंगाई भत्ते काे जारी करके सत्ता-विराेधी माहाैल काे कुछ हद तक संभालने का प्रयास किया है. इसके कारण सरकारी कर्मचारियाें का एक वर्ग नाराज चल रहा था.राज्य सरकार ने पुराेहिताें और मुअज्जिनाें के मासिक मानदेय काे भी 1,500 रूपये से बढ़ाकर 2,000 रूपये कर दिया है. जिससे यह संदेश देने की काेशिश की गई है कि पार्टी हिंदुओं व मुसलमानाें काे समान मानती है.
तृणमूल सरकार काे महिलाओं के खिलाफ कुछ हिंसक घटनाओं, शिक्षक भर्ती मुद्दा और फुटबाॅलर मेसी के दाैरे के दाैरान कुप्रबंधन जैसी चुनाैतियाें से जूझना पड़ा था. इनसे पार्टी की छवि काे कुछ हद तक नुकसान पहुंचा था, पर ्नया यह अब अतीत की बातें हाे चुकी हैं या विपक्षी पार्टी, खासताैर से भाजपा, चुनावाें में इनकाे मुद्दा बनाने में सफल हाे सकेगी, इस पर नजर बनी रहेगी. वैसे देखने वाली बात यह भी हाेगी कि ्नया राज्य की जनसांख्यिकी काे प्रभावित करने वाला घुसपैठियाें का मुद्दा भी चुनावाें में सुनाई देगा? 15 साल काेई छाेटा व्नत नहीं हाेता. हमने देखा है कि इतने लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद सरकारें बाहर हाे जाती हैं, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश में गुजरात जैसा माॅडल भी है. जहां भाजपा न केवल 1995 से सत्ता में है, बल्कि पिछले विधानसभा चुनावाें में और अधिक मजबूत बनकर उभरी है.
निश्चय ही, भाजपा यहां सत्ता हासिल करने के लिए पूरा दम-खम लगा रही है,और वह पूरी तरह से ना काम भी नहीं है. पिछली बार 38.1 प्र्रतिशत वाेटाें के साथ वह 77 विधानसभा सीटाें पर कब्जा करने में सफल रही और राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी बन गई. फिर भी, तृणमूल से पार पाने में वह अब तक नाकाम रही है. हालांकि, भाजपा की यह उपलब्धि सराहनीय जरूर है कि उसने इस राज्य में कांग्रेस और वाम माेर्चा काे काफी पीछे धकेल दिया है और ये दाेनाें अब क्रमश: तीसरे और चाैथे पायदान पर पहुंच गए हैं.इनका मत प्र्रतिशत भी इकाई अंकाें में सिमट गया है.रही बात केरलम की, ताे यहां भी भाजपा कड़ी मेहनत कर रही है. जबकि चुनावाें में एलडीएफ और यूडीएफ के बीच ही मुकाबला रहता है, उधर, तमिलनाडु में भी द्रमुक और अन्नाद्रमुक गठबंधन के बीच सत्ता बदलती रही है हालांकि, इस बार अभिनेता विजय की पार्टी भी मैदान में है.जिससे चुनाव दिलचस्प बन सकता है.
- संजय कुमार