मिडिल-ईस्ट में युद्ध का असर अब भारत के महानगराें-औद्याेगिक शहराें तक पहुंचता दिखाई देने लगा है. गैस आपूर्ति प्रभावित हाेने के कारण दिल्ली, अहमदाबाद, सूरत, मुंबई जैसे शहराें से बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर अपने-अपने गांवाें की ओर लाैटने काे मजबूर हाे गए हैं. रेलवे स्टेशनाें पर प्रवासी मजदूराें-छात्राें की उमड़ती भीड़ ने एक बार फिर काेराना काल के मंजर की याद दिला दी है. इस बीच पेट्राेलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव ने प्रेस वार्ता कर बताया कि घरेलू एलपीजी का पर्याप्त स्टाॅक उपलब्ध है और हम लगातार उपभाेक्ताओं से अपील कर रहे हैं, जहां भी संभव हाे, वे नेचुरल गैस अपनाने की ओर बढ़ें.अहमदाबाद और सूरत के रेलवे स्टेशनाें पर अपने-अपने गांवाें की ओर पलायन करने वालाें की बीते दाे-तीन दिनाें से कतारें लगने लगी हैं.
इनमें से ज्यादातर बिहार और उत्तर प्रदेश के प्रवासी श्रमिक हैं. यही हाल कमाेबेस दिल्ली और मुंबई का भी है. दरअसल, रसाेई गैस की कमी के चलते रेस्टाेरेंट-ढाबा और दूसरे खानेपीने के स्टाॅल चलाने वालाें का राेजगार ठप हाेने लगा है. घर लाैटने के लिए सूरत रेलवे स्टेशन पहुंचे प्रवासी मजदूराें ने बताया कि छाेटे सिलेंडर के लिए पहले गैस 100 रुपये किलाे मिलती थी, लेकिन अब 300-400 रुपये किलाे मिल रही है. वहीं, घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत 5 हजार पहुंच गई है.खाड़ी के हालात के चलते एलपीजी गैस की कमी ने छाेटे उद्याेगाें और फैक्ट्रियाें पर भी असर डाला है. कई फैक्ट्रियां अस्थायी रूप से बंद हाे रही हैं. मजदूराें के सामने राेजी-राेटी का संकट खड़ा हाे गया है. मुंबई-सूरत जैसे शहराें में यूपी-बिहार में लाखाें की संख्या में श्रमिक रहते हैं.इनमें से ज्यादातर के पास आधिकारिक गैस कनेक्शन नहीं हाेता है.