आग भी न जलाए, अगर मन स्वीकार करने काे राजी नहीं है, और ठंडक भी जला दे, अगर मन जलने के लिए तैयार है.सम्माेहन के प्रयाेग बड़े मन के संबंध में गहरे सत्याें काे प्रकट करते हैं. एक लड़की पर कुछ दिनाें तक मैं प्रयाेग कर रहा था.उसके घर ही ठहरा हुआ था जब वह सम्माेहित थी, ताे मैंने उससे कहा कि इस कमरे में तुम्हारी मां नहीं है. उसकी मां सामने ही बैठी हुई है और काेई आठ लाेग बैठे हुए हैं.सब मिलाकर हम दस लाेग उस कमरे में हैं.वह लड़की, मैं, और आठ लाेग. दस लाेग उस कमरे में हैं. मैंने उस लड़की से कहा कि तेरी मां इस कमरे के बाहर चली गई.अब तू आंख खाेल और गिनती कर. उसने आंख खाेली और गिनती की. गिनती उसने नाै की. क्याेंकि मां जाे सामने बैठे थी वह ताे नहीं थी उसके लिए. उससे बहुत कहा कि यह सामने के साेे पर काैन है?
उसने कहा,आप भी कैसी बात करते हैं! साेा खाली है. उसकी मां ने उसकाे साेे से आवाज दी, उस लड़की का नाम लेकर. उसने उस साेे काे छाेड़कर पूरे कमरे में देखा कि मां की आवाज कहां से आ रही है? उस साेे पर उसकी मां नहीं है. िफर उसे दाेबारा आंख बंद करने काे कहा- और उसके पिता उस कमरे में माैजूद नहीं थे- और उससे कहा कि अब तुम्हारे पिता आ गये हैं और सामने की कुर्सी पर आकर बैठे हुए हैं.आंख खाेलाे उसने आंख खाेली, और उससे कहा, अब गिनती कराे. उसने गिनती अब दस की. मां जाे माैजूद थी उस कुर्सी पर, वह माैजूद नहीं है. उससे पूछा कि इस कुर्सी काे तू पहले खाली कर रही थी, लेकिन अब गिनती क्याें कर रही है? उसने कहा कि पिता जी आकर बैठ गये हैं. पिता वहां नहीं हैं, लेकिन उसका मन अगर पूरी तरह स्वीकार कर ले, ताे घटना घट जायेगी.