विश्व के राजनीतिक और कूटनीतिक हलकाें में अभी यही सवाल सबकी जुबान पर है कि ईरान युद्ध कब तक चलेगा और इसका अंजाम ्नया हाेगा? ये दाेनाें सवाल जटिल हैं और इनके जवाब अभी ठीक-ठाक नहीं दिए जा सकते अब तक न ताे अमेरिकी राष्ट्रपति डाेनाल्ड ट्रम्प ने काेई संकेत दिए हैं कि वह युद्ध कब और किन शर्ताें पर खत्म करेंगे, और न ही युद्ध का आखिरी अंजाम परदे के सामने नजर आ रहा है.हां, एक निष्कर्ष, जाे हमारे क्षेत्र के साथ-साथ पूरी दुनिया काे परेशान कर रहा है, वह ऊर्जा से जुड़ा है. ईरान ने हाेर्मुज जलमार्ग पर इतना नियंत्रण बना लिया है कि उसकी इच्छा के बगैर यहां से काेई समुद्री जहाज पार नहीं कर पा रहा. वहीं, ईरान द्वारा खाड़ी में गैस के उत्पादन-केद्राें काे निशाना बनाए जाने के कारण कतर जैसे देश ने अपनी उत्पादन इकाइयाें काे बंद कर दिया है. चूंकि भारत जैसे देश कच्चे तेल और गैस के लिए खाड़ी के देशाें पर निर्भर हैं, इसलिए उनकी अर्थव्यवस्था पर ईरान युद्ध का विशेष रूप से बुरा असर पड़ रहा है.
लेकिन वे मुल्क भी, जाे अरब देशाें पर इतने निर्भर नहीं हैं. जैसे- यूराेपीय संघ के सदस्य देश और अमेरिका जैसे बिल्कुल ही निर्भर न रहने वाले देश काे भी इस युद्ध से नुकसान हाे रहा है. क्योंकि वहां भी तेल के दाम बढ़ गए हैं. गाैरतलब है कि ईरान युद्ध से पहले की तुलना में आज कच्चे तेल की कीमत 40 प्रतिशत तक चढ़ चुकी है.समीकरणाें की बात करें,ताे इस जंग ने अमेरिका और उसके मित्र देशाें के बीच भी तनाव की स्थिति पैदा कर दी है. इसका काेई आसान समाधान दिख भी नहीं रहा. यहां तक कि हाेर्मुज जलडमरूमध्य में युद्धपाेत भेजने की राष्ट्रपति ट्रम्प की गुजारिश भी इन देशाें ने नहीं मानी, जबकि दावा किया गया था कि अमेरिका ऐसा करके हाेर्मुज गैस और तेल की निर्बांध आपूर्ति सुनिश्चित करना चाहता था. इन्कार करने वाले यूराेपीय संघ के सदस्य शामिल हैं. वैसे, ब्रिटेन, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने भी अपने जहाज न भेज पाने की विवशता जताई थी. राष्ट्रपति ट्रम्प इससे नाराज हुए और उन्हाेंने इसका सार्वजनिक इजहार भी किया.
राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा है कि जब मित्र देशाें काे साथ की जरूरत थी, तब अमेरिका ने पूरी मदद की,लेकिन आज जब वाशिंगटन काे उनकी सहायता की दरकरार है, ताे ये देश उदासीन बन गए हैं. जाहिर है. इससे अमेरिका और उसके मित्र देशाें के रिश्ताें पर असर पड़ेगा, हालांकि यह भी सच है कि दाेनाें काे एक-दूसरे की जरूरत है. इसलिए उस घटनाक्रम से आपसी संबाधाें में शायद ही स्थायी या गहरी दरार आ सकेगी.इन देशाें ने बेशक ईरान युद्ध के लिए काेई गर्मजाेशी नहीं दिखाई, लेकिन वे वाशिंगटन के इस तथ्य से सहमत है कि ईरान के पास परमाणु हथियार बनाने की क्षमता नहीं हाेनी चाहिए. इतना ही नहीं, तेहरान की मिसाइल और ड्राेन-निर्माण क्षमता काे सीमित या नाममात्र किए जाने, उसकी सैन्य ताकत काे कमजाेर करने और हमास, हिज्बुल्लाह व हूती जैसे ईरान समर्थित गुटाें काे बेअसर किए जाने के भी वे हिमायती हैं.
यानी, अमेरिका और उसके मित्र देशाें का लक्ष्य एक है, लेकिन रास्ते अलग हैं.उधर, चीन और रूस ने इस युद्ध काे जल्द से जल्द खत्म करने की मांग की है. उन्हाेंने अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर हमला किए जाने पर अफसाेस भी जताया. हालांकि, संयु्नत राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जब खाड़ी के देशाें काे निशाना बनाने काे लेकर ईरान की निंदा की गई, ताे इन दाेनाें ने तेहरान से दूरी बरती. यह संकेत है कि दुनिया का काेई देश नहीं चाहता कि युद्ध का दायरा बढ़े, हालांकि यह भी सच है कि ईरान की जिस तरह से घेराबंदी की जा रही है, उसमें उसके पास युद्ध बढ़ाने के अलावा काेई विकल्प नहीं है. उसकी यह साेच हे कि अगर वह दुनिया में ऊर्जा संकट पैदा कर दे, ताे अमेरिका अपने पांव समेटने पर विवश हाे जाएगा.राष्ट्रपति ट्रम्प के लिए मानाे यही झटका काफी न था, अमेरिका के काउंटरटेररिज्म सेंटर के निदेशक जाे केंट ने यह कहते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया है कि इजरायल के प्रभाव में आकर राष्ट्रपति ने युद्ध छेड़ा है,जब कि ईरान की तरफ से अमेरिका की सुरक्षा पर काेई खतरा नहीं था. केंट का यह सुझाव भी है कि अमेरिका काे जंग तुरंत राेक देनी चाहिए.
हालांकि, राष्ट्रपति ट्रम्प ने केंट की बाताें काे नजरंदाज कर दिया है, लेकिन इससे उन हलकाें काे बल मिलेगा, जाे मानते हैं कि इस युद्ध से अमेरिका काे काेई लाभ नहीं है.भारत जैसे देशाें काे ईरान युद्ध से नुकसान हाेना स्वाभाविक है. 90 लाख से एक कराेड भारतवंशी अरब देशाें में रहते हैं, जाे अपनी आमदनी का एक बड़ा हिस्सा बताैर रेमिटेंस भारत भेजते हैं. इसकी हमारी अर्थव्यवस्था के लिए काफी अहमियत है. गाड़ी के देश हमारे व्यापार के लिए भी अहम हैं और कच्चे तेल व गैस काे लेकर हमारी उन पर निर्भरता जगजाहिर है. हाेर्मुज के बंद हाेने से अभी कच्चे तेल का अभाव ताे नहीं दिख रहा, लेकिन गैस की आपूर्ति बनाए रखने के लिए सरकार काे कुछ एहतियाती कदम उठाने पड़े हैं, जिसके कारण कुछ सूक्ष्म व लहु-उद्याेंगाें, ढाबाें और रेस्तरांओं पर असर पड़ा है.
भारतीय प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री ने विभिन्न देशाें के अपने-अपने समकक्षाें से संपर्क बनाए हैं.उन्हाेंने अरब देशाें काे हाे रहे नुकसान पर भी उचित सहानुभूति जताई है. इसके साथ ही ईरान के राष्ट्रपति से भी भारतीय प्रधानमंत्री ने बात की है और राजनय व आपसी बातचीत के जरिये समाधान निकालने का सुझाव दिया है. जाे बिल्कुल सही है. हालांकि, इस व्नत यह कहना मुश्किल है कि इजरायल अमेरिका और ईरान कब से रास्ते पर आगे बढ़ेंगे? फिलहाल युद्ध जारी है. और विशेषकर इजरायल यही चाहता है कि ईरान काे अधिक से अधिक नुकसान हाे. व हालांकि, तेहरान का यदि पतन हुआ और यहां शून्य तक की स्थिति पैदा हुई, ताे इससे इस पूरे खित्ते काे काफी नुकसान हाे सकता है. इस युद्ध से यह भी पता चलता है कि इस्लामी उम्मा के बीच गहरी दरारें हेें, जिनकी जड़ें इस्लाम के इतिहास में फैली हैं.
- विवेक काटजू, पूर्व राजनयिक