गैस सिलेंडराें की कमी के कारण कई लघु उद्याेग बंद हाे गए हैं. इनके द्वारा सुटे भागाें की आपूर्ति कम हाेने से बड़ी वाहन निर्माण कंपनियाें काे उत्पादन घटाने या कुछ स्थानाें पर उत्पादन पूरी तरह बंद करने की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है.पुणे देश का एक प्रमुख वाहन निर्माण केंद्र है, जहां राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की कई कंपनियां कार्यरत हैं. अब इन कंपनियाें काे स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति प्रभावित हाे रही है. सामान्यतः इन कंपनियाें के पास एक सप्ताह का स्टाॅक रहता है, लेकिन लघु उद्याेगाें में उत्पादन कम या बंद हाेने से आपूर्ति श्रृंखला पर गंभीर असर पड़ा है.पुणे में वाहन कंपनियाें काे स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति करने वाले अनेक सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्याेग हैं.इनमें से लगभग 30 प्रतिशत उद्याेग एलपीजी पर निर्भर हैं, खासकर प्लेटिंग, काेटिंग और फैब्रिकेशन से जुड़उद्याेग. इन उद्याेगाें में भट्टियाें के लिए एलपीजी का उपयाेग हाेता है. पिछले दाे सप्ताह से एलपीजी की कमी के कारण उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ है.आपूर्ति श्रृंखला के लगभग 50 प्रतिशत उद्याेगाें का एलपीजी स्टाॅक खत्म हाे चुका है, जिससे उत्पादन कम करना या बंद करना पड़ा है.
एलपीजी के स्थान पर बिजली या डीजल का उपयाेग करना महंगा साबित हाे रहा है. साथ ही, इससे उत्पादन लागत में लगभग 10 प्रतिशत की वृद्धि हाेती है, जिससे उद्याेग वैकल्पिक ईंधन अपनाने काे लेकर असमंजस में हैं.उद्याेग विभाग ने इस स्थिति का आकलन शुरू कर दिया है. पुणे क्षेत्र में हजाराें की संख्या में ऐसे उद्याेग हैं जाे बड़े वाहन निर्माताओं काे स्पेअर पार्ट्स उपलब्ध कराते हैं.राज्य के विकास आयुक्त ने इस सप्ताह वीडियाे काॅन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बैठक लेकर एलपीजी पर निर्भर उद्याेगाें की जानकारी और उनके प्रभाव का डेटा जुटाने के निर्देश दिए हैं.इस संकट का असर श्रमिकाें पर भी पड़ा है. आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े उद्याेगाें में लाखाें श्रमिक कार्यरत हैं, जिनमें अधिकांश उत्तर भारत से हैं. ये श्रमिक 5 किलाे के एलपीजी सिलेंडर पर खाना बनाते हैं. सिलेंडर की आपूर्ति बंद हाेने से उनके सामने भाेजन का संकट खड़ा हाे गया है. इसके चलते बड़ी संख्या में श्रमिक अपने गांव लाैट रहे हैं, जिससे भविष्य में श्रमिकाें की कमी हाेने की आशंका बढ़ गई है.