धर्मादाय संस्थाओं को दान पर छूट मिलने की प्रक्रिया आसान

प्रावधान का कर-मुक्ति प्रमाणपत्र से संबंध नहीं; खंडपीठ द्वारा 6 सप्ताह में पुन: सुनवाई के आदेश

    24-Mar-2026
Total Views |

 vBf
 
शिवाजीनगर, 23 मार्च (आज का आनंद न्यूज नेटवर्क)

मुंबई उच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में दिए गए एक निर्णय से धर्मादाय (चैरिटेबल) संस्थाओं को दान पर छूट मिलने की प्रक्रिया आसान हो गई है. यदि धर्मादाय संस्थाओं के संविधान में यह स्पष्ट प्रावधान नहीं भी है कि संस्था स्थायी रूप से अस्तित्व में रहेगी, तो भी आयकर विभाग दान पर छूट के लिए कर-मुक्ति प्रमाणपत्र देने से इनकार नहीं कर पाएगा. न्यायमूर्ति बी. पी. कोलाबावाला और न्यायमूर्ति फिरदोश पूनीवाला की खंडपीठ के समक्ष इस संबंध में एक याचिका सुनवाई के लिए आई थी, जिस पर यह निर्णय दिया गया. गौरतलब है कि पंजीकृत चैरिटेबल संस्थाओं के उद्देश्यों और समाजोपयोगी कार्यों को देखते हुए आयकर विभाग द्वारा उन्हें आय पर कर-मुक्ति प्रमाणपत्र दिया जाता था. इसके कारण ऐसी संस्थाओं को अपनी आय पर आयकर नहीं देना पड़ता था. साथ ही, यदि कोई इन संस्थाओं को दान देता था, तो संबंधित दानदाता को उसकी कर योग्य आय में से उस राशि पर छूट मिलती थी. परंतु, साधारणतः वर्ष 2021 के बाद आयकर विभाग ने यह नियम बना दिया था कि यदि संबंधित चैरिटेबल संस्था के संविधान में यह स्पष्ट प्रावधान होगा कि वह संस्था सदैव (चिरंतन) अस्तित्व में रहेगी, तभी उसे कर-मुक्ति प्रमाणपत्र दिया जाएगा. ऐसा प्रावधान न होने पर आवेदनों को नामंजूर कर दिया जाता था. आयकर अधिनियम की मधारा 12 इफ के तहत जिन धर्मादाय संस्थाओं के कर-मुक्ति प्रमाणपत्र के आवेदन खारिज कर दिए गए थे, उनकी ओर से मचेंबर ऑफ टैक्स कंसल्टेंट्सफ और बॉम्बे चार्टर्ड अकाउंटेंट्स सोसाइटी ने मुंबई उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की थी. न्यायमूर्ति बी. पी. कोलाबावाला और न्यायमूर्ति फिरदोश पूनीवाला की खंडपीठ के समक्ष इस याचिका पर सुनवाई हुई. याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पर्सी पारडीवाला ने बहस करते हुए न्यायालय के संज्ञान में लाया कि आयकर कानून के मानदंडों में ऐसा कोई निर्देश नहीं है, जिसके अनुसार संस्था के संविधान में संस्था सदैव (चिरंतन) अस्तित्व में रहेगी ऐसा प्रावधान होना अनिवार्य हो. इस सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों के साथ-साथ केंद्रीय वित्त विभाग की रिपोर्टों पर भी विचार किया गया. खंडपीठ ने आदेश दिया है कि आयकर विभाग ने कर-मुक्ति के जो आवेदन नामंजूर किए हैं और परिणामस्वरूप धारा 80 ॠ के तहत अनुमति देने से इनकार किया है, उन पर छह सप्ताह के भीतर फिर से सुनवाई की जाए. इसके अलावा, यह भी स्पष्ट किया गया है कि कर-मुक्ति के ये प्रावधान 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी होंगे.  
 
संस्था के विसर्जन के प्रस्ताव संबंधी स्पष्ट प्रावधान

धर्मादाय संस्थाओं के विसर्जन के संबंध में ‌‘महाराष्ट्र सार्वजनिक ट्रस्ट अधिनियम, 1950' की धारा 22(3) के तहत स्पष्ट प्रावधान किया गया है. यदि संस्था के विसर्जन का प्रस्ताव आता है, तो उसकी जांच कर उस पर उचित आदेश देने का अधिकार धर्मादाय आयुक्त (चैरिटेबल कमिश्नर) और उनके अधीनस्थ अधिकारियों के पास है. इस निर्णय में यह भी रेखांकित किया गया है कि धर्मादाय आयुक्त इस बात की सावधानी बरतेंगे कि संस्था की अचल और चल संपत्ति का उपयोग केवल परोपकारी कार्यों के लिए ही किया जाए और ट्रस्टियों के बीच निजी तौर पर इसका बंटवारा न हो. -एड. शिवराज कदम जहागीरदार पूर्व अध्यक्ष, पब्लिक ट्रस्ट प्रैक्टिशनर्स एसोसिएशन,