अगले महीने चार राज्याें एवं एक केंद्रशासित प्रदेश में विधासनसभा के चुनाव हाेने वाले हैं. लेकिन उनमें से दाे राज्याें पर बड़ी बारीकी से नजर रखी जा रही है, क्योंंकि इनका नतीजा पूरे देश में गुंजेगा. इनमें से एक केरल है. जाे कांग्रेस के भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वह अपने पतन काे राेकने और राजनीतिक रूप में प्रासंगिक बने रहने का प्रयास कर रही है. यहां 9 अप्रैल काे मतदान हाेंगे. दूसरा है पश्चिम बंगाल, जाे भाजपा के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गया है. भाजपा अपनी राष्ट्रीय उपस्थिति का विस्तार करने के लिए यहां सफलता हासिल करके पश्चिम से पूर्व तक अपना प्रभुत्व बढ़ाना चाहती है. यहां 23 और 29 अप्रैल काे दाे चरणाें में मतदान हाेंगे.इसके अलावा तमिलनाडु में 23 अप्रैल और असम व पुडुचेरी में 9 अपै्रल काे मतदान हाेंगे. तमिलनाडु में सत्ताधारी द्रमुक, अन्नाद्रमुक-भाजपा गठबंधन और फिल्म स्टार टी एन विजय की नई पार्टी टीबीके के बीच त्रिकाेणीय मुकाबले में काफी मजबूत नजर आ रही है.
भाजपा टीबीके काे राजग में शामिल हाेने के लिए मनाकर चुनाव काे दाे ध्रुवीय बनाना चाहती है. पर अब उसमें रुकावट आती दिख रही है.नतीजतन,सत्ता-विराेधी वाेट बांटने की संभावना है. जिसका फायदा द्रमुक काे मिलेगा. लेकिन, इसमें एक पेंच है. द्रमुक और उसकी सहयाेगी पार्टी कांग्रेस के बीच रिश्ते तनावपूर्ण हैं.हालांकि, कांग्रेस वहां छाेटी-पार्टी है. फिर भी रखना हाेगा कि इस तनाव का असर नतीजाें पर न पड़े दाेनाें पक्षाें के बीच टकराव पड़ाेसी पुडुचेरी में सबसे ज्यादा स्पष्ट दिखाई देता है.जहां वे सीटाें के बंटवारे के फाॅर्मूले पर सहमत नहीं हाे पाए हैं.जबकि नामांकन 16 मार्च काे ही शुरू हाे गए थे. दूसरी ओर, ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस और भाजपा के सत्ताधारी राजग गठबंधन ने सीटाें के बंटवारे काे अंतिम रूप दे दिया है और अब वह पूरी तरह से तैयार है.असम में भाजपा के चतुर मुख्यमंत्री हिमंत बिम्बा सरमा अपने मुख्य विराेधी कांग्रेस काे एक-एक कर खत्म कर रहे हैं. पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बाेरा कुछ हफ्ते पहले हीभाजपा में शामिल हुए थे.
अब, राज्य से पार्टी के तीन सांसदाें में से एक प्रद्युत बाेरदाेलाई ने भी कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है. लेकिन, सबसे ज्यादा विवादित चुनाव पश्चिम बंगाल का है. यह चुनाव मतदाता सूची का लेकर बड़े पैमाने पर फैले धम और अफरा-तफरी के बीच हाे रहा है, क्योंकि चुनाव आयाेग मतदाता सूची के विवादित ‘विशेष गहन संशाेधन’ (एसआईआर) काे जल्दी पूरा करने में चुटा है. इस पूरी प्रक्रिया में एक और उलझन तब पैदा हाे गई. जब पश्चिम बंगाल के लिए विशेष रूप से विचाराधीन नामक एक अलग श्रेणी बना दी गई. इस सूची में उन मतदाताओं के नाम शामिल हैं. जिसकाे पात्रता काे चुनाव आयाेग ने संदिग्ध माना है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि उनके नाम के बर्तनी. उम्र आदि में कुछ छाेटी-माेटी विसंगतियां पाई गई हैं. यह सूची भी बहुत विशाल है.इसमें पूरे 60 लाख नाम शामिल हैं.
राज्य का सियासी माहाैल पूरी तरह से गर्माया हुआ है, क्योंकि तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने एसआईआर प्रक्रिया काे लेकर जबर्दस्त हंगामा खड़ा कर दिया है, और उसे बंगाल विराेधी बताया है. इन चुनावाें की सबसे खास बात काेलकाता की भवानी पुर सीट पर हाेने वाला मुकाबला है, जहां भाजपा ने ममता बनर्जी के पूर्व सहयाेगी शुभेंदु अधिकारी काे उनके खिलाफ मैदान में उतारा है. अधिकाराें काे उनके खिलाफ मैदान में उतारकर भाजपा की उम्मीद है कि वह उन्हेंं भवानीपुर में ही उलझाकर रखेगी. ताकि वह राज्य भर में चुनाव प्र्रचार न कर सके. माेदी सरकार ने चुनाव की तारीखाें की घाेषणा से ठीक पहले. आर एन काे पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाकर भेज दिया, ताकि राजभवन में उनके एक भराेसेमंद आदमी माैजूद रहे, जाे चुनावाें और उसके बाद के हालात पर नजर रख सके. इसके अलावा, चुनाव आयाेग ने भी भाजपा की उस मांग काे मान लिया, जिसमें उसने दाे चरणाें में चुनाव कराने की बात कही थी. जिस दिन चुनाव आयाेग ने तारीखाें का ऐलान किया, उसी दिन उसने राज्य के पांच शीर्ष अधिकारियाें का तबादला कर दिया, जिन्हें ममता बनर्जी का करीबी माना जाता है.
इनमें मुख्य सचिव भी शामिल थे. ममता बॅनर्जी ने लगातार दाे चुनावाें में भाजपा काे शिकस्त दी है, ्नया बंगाल बंगालियाें के लिए का अना नारा उन्हें फिर से जीत दिलाने में मदद कर पाएगा? केरल, चुनाव कांग्रेस के लिए कराे या मराे जैसा है. यह ऐसा राज्य है. जहां हर पांच साल में कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ और सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाला एलडीएफ बारी-बारी से सत्ता में आते-जाते रहते हैं. हालांकि,2021 में एलीडीएफ ने लगातार दूसरी बार चुनाव जीतकर इस परंपरा काे ताेड़ दिया था.इस बार कांग्रेस की उम्मीदें बढ़ी हैं, क्योंकि हाल ही में उसने एलडीएफ काे हराकर पंचायत और नगर निकायाें में जीत हासिल की. लेकिन जीत का अंतर बहुत कम था, और कांग्रेस ने स्थानीय चुनावाें में इतनी निर्णायक जीत हासिल नहीं की थी कि वह विधानसभा चुनावाें में अपनी जीत काे लेकर पूरी तरह आश्वस्त हाे सके. एक राष्ट्रीय ताकत के रूप में कांग्रेस अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है. 2024 के लाेकसभा चुनावाें में 99 सीटें जीतकर चाैंकाने वाला प्रदर्शन करने के बाद उसकी किस्मत अचानक से पलट गई.
- आरती आर जेरथ, वरिष्ठ पत्रकार