शिवाजीनगर , 25 मार्च (आज का आनंद न्यूज नेटवर्क)
पुणे में कमर्शियल गैस की आपूर्ति बाधित होने के कारण कई होटलों में विभिन्न समस्याएं पैदा हो गई हैं. कुछ होटल बंद हो रहे हैं, तो कुछ लोगों ने इंडक्शन और चूल्हों पर काम जारी रखा है. कुछ होटलों ने अपने मेनू में व्यंजनों की संख्या कम कर दी है, तो कुछ ने कीमतें बढ़ा दी हैं. कुल मिलाकर, ये सभी बातें होटल उद्योग पर आए बड़े संकट की ओर इशारा करती हैं. मध्य पूर्व के चल रहे युद्ध के कारण वाणिज्यिक एलपीजी की कीमतों में भारी वृद्धि और अनियमित आपूर्ति से पुणे का खाद्य व्यवसाय प्रभावित हो रहा है. इस स्थिति ने रेस्तरां, स्ट्रीट फूड विक्रेताओं और मेस संचालकों को अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए या तो मेनू की दरों में वृद्धि करने या अलग से गैस सरचार्ज शुरू करने के लिए मजबूर कर दिया है. कई विक्रेताओं ने मुख्य खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ा दी हैं, जिसका सीधा असर उन छात्रों और कामकाजी पेशेवरों पर पड़ा है जो किफायती भोजन पर निर्भर हैं. कुछ दक्षिण भारतीय रेस्तरां मालिक बताते हैं कि उन्होंने ईंधन की बढ़ती कीमतों की भरपाई के लिए अपने मेनू की हर चीज की कीमत 10 रुपये बढ़ा दी है, क्योंकि हमारे पास कोई विकल्प नहीं था. बताया गया कि कुछ रेस्तरां में ग्राहकों को अतिरिक्त शुल्क के बारे में बताया गया है. कुछ छोटे रेस्तरां में पाव-भाजी की कीमत 120 से बढ़ाकर 140 रुपये और पुलाव की कीमत 150 से बढ़ाकर 170 रुपये कर दी है, क्योंकि अब पुरानी दरों पर काम जारी रखना संभव नहीं है. कुल मिलाकर एलपीजी की कीमतों या आपूर्ति में तत्काल कोई राहत न मिलने के कारण, शहर के खाद्य उद्योग पर अलग से संकट मंडरा रहा है.
इन परिस्थितियों की आदत डालना मजबूरी
कोविड जैसे ही एक युद्ध से गुजर रहे हैं कीमतों में मामूली बढ़ोतरी करनी पड़ी होटल ही नहीं चलेंगे, तो मेन्यू में कीमतें क्यों बढ़ानी पिछले 22 दिनों से हमें एक भी सिलेंडर रिफिल नहीं मिला है. हम अपना सारा खाना कोयला, लकड़ी और बिजली के माध्यम से बना रहे हैं. वर्तमान में सबसे बड़ी समस्या यह है कि गैस न होने के कारण हम चपाती, रोटियां नहीं बना पा रहे हैं. हमने रोटियों के बजाय पूरियां बनाना शुरू किया है, बस यही एक बदलाव किया है. बाकी सभी व्यंजन बन रहे हैं. कई लोग स्वास्थ्य कारणों या अपनी पसंद की वजह से पूरियां नहीं खा सकते; उन्हें चपाती ही चाहिए होती है. लेकिन, फिलहाल हम उन्हें चपाती नहीं दे पा रहे हैं. इस सब में खर्च बहुत ज्यादा आ रहा है. लकड़ी और कोयले में ऊर्जा कम होती है, जिसकी वजह से खाना बनाने में समय अधिक लगता है. हमारे पास बिजली से चलने वाली कड़ाही है, लेकिन उसमें हमेशा बिजली कटने (पॉवर कट) का डर बना रहता है. अगर ऐन वक्त पर बिजली चली जाए, तो क्या करेंगे..? इसका जवाब आज हमारे पास नहीं है. कोरोना के समय लोग सड़कों पर नहीं थे. लेकिन, वर्तमान में लोग होटलों और कैंटीन में आ रहे हैं. ग्राहक आ रहे हैं, पर उन्हें जो चाहिए वह हम दे नहीं पा रहे हैं. फिलहाल इसका कोई विकल्प नहीं है, यानी अब हमें इन परिस्थितियों की आदत डालना मजबूरी है. गैस के बिना किसी अन्य माध्यम से बड़े पैमाने पर रोटियां या भाकरी बनाना संभव नहीं है. फिर भी, इस तमाम प्रतिकूल स्थिति में हमने अपना व्यवसाय जारी रखा है और अपने ग्राहकों तथा कर्मचारियों की सुविधा का पूरा ध्यान रखा है. -सुहास उड़पीकर, संचालक, न्यू पूना बोर्डिंग
कीमतों में मामूली बढ़ोतरी करनी पड़ी
शुरुआत के कुछ दिनों में हमें कोई बदलाव करने की जरूरत नहीं पड़ी, लेकिन पिछले पांच-छह दिनों में हमने दरों में 3 से 4% का बदलाव किया है. कीमतों में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी नहीं की है, क्योंकि बाजार में पहले से ही डर और घबराहट का माहौल है. गैस और ईंधन की किल्लत के कारण न केवल हमारा उद्योग, बल्कि प्लास्टिक, बेकरी और डेयरी उद्योग भी प्रभावित हुए हैं. उनकी लागत बढ़ने के कारण हमें भी मजबूरी में दरों में सुधार करना पड़ा है. हमने कीमतें केवल वहीं बढ़ाई हैं, जहां गैस का इस्तेमाल ज्यादा होता है. उदाहरण के तौर पर, इंडियन मेन्यू के दाम बढ़ाए गए हैं, जबकि जूस जैसी चीजों की दरों में बदलाव की जरूरत नहीं पड़ी. नाश्ते की बात करें तो साउथ इंडियन डिशेज जैसे डोसा और उत्तप्पा फिलहाल बंद हैं. अभी केवल इडली, मेदू वडा और बटाटा वडा ही उपलब्ध कराया जा रहा है. हमारे पास इंडक्शन और डीजल भट्टी की सुविधा है, इसलिए हमने अपना काम जारी रखा है. राहत की बात यह है कि ग्राहकों की संख्या में कमी नहीं आई है. लोग स्थिति को समझ रहे हैं और सहयोग कर रहे हैं. अगर डोसा उपलब्ध कराना संभव नहीं होता, तो ग्राहक पावभाजी या सैंडविच जैसे विकल्पों को चुनकर तालमेल बिठा रहे हैं. -मेहुल भटेवरा, होटल आनंद वेज, कर्वे रोड
होटल ही नहीं चलेंगे, तो मेन्यू में कीमतें क्यों बढ़ानी
जब यह खबर आई कि गजट जारी किया गया है और गैस सप्लाई बंद करनी है, तब तुरंत यह बात किसी के ध्यान में नहीं आई. लेकिन दो दिनों बाद जब उनका स्टॉक खत्म हुआ, तो उन्होंने अचानक सप्लाई बंद कर दी. नतीजा यह है कि उस दिन से लेकर आज तक एक भी गैस सिलेंडर उपलब्ध नहीं हुआ है. केंद्र सरकार ने शनिवार को कहा था कि सोमवार से हम (कीमतों में) 20% की बढ़ोतरी करने वाले हैं, खासकर होटलों के लिए. वह पत्र हर जगह वायरल भी हुआ और राज्य सरकार की ओर से भी वैसी ही जानकारी दी गई. मगर वास्तविकता यह है कि अभी तक गैस उपलब्ध नहीं हो पाई है. जो मल्टी-क्यूजीन होटल हैं, उन्होंने शुरुआत में तालमेल बिठाने की कोशिश की. लेकिन बाद में जब यह मुमकिन नहीं हुआ, तो उन्होंने एक-एक करके सेक्शन्स बंद किए. पहले साउथ इंडियन बंद किया गया; कुछ होटलों में पंजाबी मेन्यू अभी चल रहा है, लेकिन पावभाजी बंद कर दी गई है. आगे चलकर जब यह भी संभव नहीं होगा, तब होटल पूरी तरह बंद करने की नौबत आ जाएगी. इसमें सकारात्मक बात सिर्फ इतनी है कि जिनके पास एमएनजीएल के कनेक्शन हैं, वहां सब कुछ सुचारू रूप से चल रहा है. अगर होटल ही नहीं चलेंगे, तो मेन्यू में कीमतें बढ़ाकर क्या फायदा..? और जिनके पास एमएनजीएल कनेक्शन है, उनके लिए कीमतें बढ़ाने का सवाल ही नहीं उठता क्योंकि सरकार ने (पाइप्ड गैस की) कीमतें नहीं बढ़ाई हैं. -राजेश शेट्टी, सेक्रेटरी, प्राहा
कोविड जैसे ही एक युद्ध से गुजर रहे हैं
गैस की किल्लत तो निश्चित रूप से है, लेकिन दाम बढ़ाना इसका कोई समाधान नहीं है. इसके उलट, हमने (मेन्यू में से) एक-दो आइटम कम कर दिए हैं, क्योंकि बेवजह दाम बढ़ाकर नुकसान झेलने में कोई तुक नहीं है. हमने चार चूल्हे तैयार किए हैं और उन पर खाना पकाने का काम बढ़िया तरीके से चल रहा है. अभी हर दिन ऐसा लग रहा है कि अगले चार-पाच दिनों में स्थिति सामान्य हो जाएगी, लेकिन यह कितने दिनों तक चलेगी, कुछ कहा नहीं जा सकता. तेल वगैरह के दाम भी 1,800 रुपये प्रति डिब्बा से बढ़कर 2,500-2,600 रुपये तक पहुंच गए हैं. मौजूदा स्थिति में महंगाई तो बढ़ी है, पर हम दाम नहीं बढ़ा सकते; क्योंकि अगर रेट बढ़ाए तो जो ग्राहक आ रहे हैं, वे भी आना बंद हो जाएंगे. फिलहाल ग्राहकों की संख्या में कुछ कमी आई है, लेकिन अभी परीक्षाओं का सीजन है और मार्च के महीने में सामान्यतः जैसी स्थिति रहती है, वैसे ही ग्राहक कम हैं. इंडक्शन के लिए पहले बिजली का लोड बढ़ाना होगा, लेकिन अगर बिजली गुल हो गई तो बड़ी किल्लत हो जाएगी. आखिर में खाना पकाने में जो असर गैस का होता है, वह बाकी विकल्पों में नहीं रहता. लकड़ी जो पहले 5 रुपये में मिलती थी, वह अब 20 रुपये में ला रहे हैं. कोयला जो 20 रुपये का मिलता था, वह अब 50 रुपये हो गया है. फिलहाल मुनाफा कमाने का उद्देश्य नहीं है, बल्कि कोशिश यही है कि ‘नो प्रॉफिट-नो लॉस' पर काम चलता रहे हैं. हम बस इस स्थिति में टिके रहने का प्रयास कर रहे हैं. हम कोविड जैसे ही एक और युद्ध से गुजर रहे हैं. -गौरव द्विवेदी, होटल विष्णुजी की रसोई, कर्वेनगर