दुनिया के बड़े संकट कभी राताेंरात खत्म नहीं हाेते

    26-Mar-2026
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पश्चिम एशिया में छिड़े युद्ध का भारत के मिड-डे मील से ्नया लेना-देना है? इसका संक्षिप्त उत्तर है. बहुत गहरा.28 फरवरी काे अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलाें ने एक ऐसी चिंगारी भड़का दी है. जिसकी लफ्टें अब तेजी से फैल रही हैं. तीन हफ्ताें के भीतर ही युद्ध दूरदराज की अर्थव्यवस्थाओं काे झकझाेर रहा है और कराेड़ाें बच्चाें व परिवाराें के जीवन पर असर डाल रहा है. दुनिया भर में ऊर्जा संकट मंडरा रहा है. जिससे ऐसी असमानता बढ़ने का खतरा पैदा हाे गया है, जाे पहले कभी नहीं देखी गई.रसाेई गैस (एलपीजी) वह ईंधन है. जिससे भारत में लाखाें घराें के चूल्हे जलते हैं. यही गैस प्रधानमंत्री पाेषण (पीएम पाेषण) मिड डे मील याेजना के तहत लगभग 11 कराेड़ बच्चाें के लिए भाेजन बनाने में उपयाेग हाेती है और आंगनवाड़ी केंद्राें (जहां छह साल से कम उम्र के लाखाें बच्चाें काे पूरक पाेषण मिलता है) की रीढ़ है.
 
फारस की खाड़ी काे ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जाेड़ने वाले संकीर्ण समुद्री मार्ग हाेर्मुज जलडमरुमध्य काे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा माना जाता है. इसी से हाेकर दुनिया का करीब 20 फीसदी तेल और गैस गुजरती है.ऐसे में युद्ध के कारण हाेर्मुज से हाेने वाली आपूर्ति पर पड़े दबाव ने गैस सिलिंडराें की उपलब्धता काे प्रभावित किया है.नतीजतन, कई आंगनवाड़ी केंद्राें और स्कूलाें की रसाेइयाें में या ताे गैस की अनियमित आपूर्ति हाे रही है. या उन्हें मजबूरन लकड़ी के चूल्हाें का सहारा लेना पड़ रहा है.भारत में मिड-डे मील याेजना से जुड़े लगभग 27 लाख रसाेई और सहायक कर्मियाें में से 90 प्रतिशत से अधिक महिलाएं हैं. इनमे से कई महिलाएं ताे हालिया संकट से पहले भी लकड़ी के चूल्हाें पर खाना बनाने पारंपरिक चूल्हाें की ओर लाैट रही हैं.
 
दिल्ली समेत देश के कई शहराें की झुग्गी-बस्तियाें में रहने वाले लाेग भी एक बार फिर चूल्हाें की ओर लाैटने काे मजबूर हैं. सूरत के टे्नसटाइल उद्याेगाें में कामकाज धीमा पड़ रहा है, क्योंकि उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, उत्तराखंड और ओडिशा से आए प्रवासी मजदूर गैस सिलिंडर की किल्लत और महंगाई के कारण अपने घराें काे लाैट रहे है.आम परिवाराें पर भी महंगाई की मार स्पष्ट दिख रही है, क्योंकि घरेलू (गैर-सब्सिडी) एलपीजी सिलिंडर की कीमत में 60 रुपये की वृद्धि हाे चुकी है. जबकि काले बाजार में इसकी कीमतें आसमान छू रही हैं. पेट्राेल की बढ़ती कीमताें से बाइक से सामान पहुंचाने वालाें का मुनाफा खत्म हाे रहा है और एफएमसीजी कंपनियां डिटर्जेंट बिस्कुट, टूथपेस्ट और पैकेजिंग जैसे उत्पादाें की लागत बढ़ाने की चेतावनी दे रही हैं.
 
उज्जवला याेजना के लाभार्थियाें काे भले ही सब्सिडी वाला गैस सिलिंडर मिल रहा हाे. पर लंबी देरी के कारण उन्हें भी लकड़ी के चूल्हाें का सहारा लेना पड़ रहा है. हालांकि, जिन लाेगाें के पास पाइप्ड नेचुरल गैस (पीएनजी) महंगे दामाें पर गैस खरीदने की क्षमता, या फिर इंड्नशन चूल्हें के साथ भराेसेमंद बिजली है, वे इस संकट से कुछ हद तक सुरक्षित हैं. पर अधिकांश लाेगाें के पास ऐसे विकल्प नहीं हैं.गाैरतलब है कि भारत अपनी कुल एलपीजी जरूरत का लगभग 60 प्रतिशत आयात करता है और इनका करीब 90 फीसदी हिस्सा हाेर्मुज मार्ग से हाेकर ही गुजरता है. इस मार्ग ें आई बाधाएं.भारत में माैजूदा एलपीजी संकट की एक बड़ी वजह बन गई है. पिछले हफ्ते, दाे भारतीय एलपीजी टैंकर हाेर्मुज पार कर गुजरात के बंदरगाहाें तक पहुंचने में सफल रहे.
 
इनके जरिये करीब 92712 टन एलपीजी भारत पहुंची, जाे देश की एक दिन की जरूरत के बराबर है खबरे हैैं कि कुछ और टैंकर भारत आ सकते हैं. यह भारत काे सक्रिय कूटनीति और तेहरान के साथ सीधे तालमेल का नतीजा है. इन सबके बावजूद यह संकट राताेंरात खत्म हाेने वाला नहीं है.भारत हर साल लगभग 3.1 से 3.3 कराेड़ टन एलपीजी की खपत करता है. लेकिन घरेलू उत्पादन इसकी केवल लगभग 40 फीसदी जरूरत ही पूरी कर पाता है. बाकी की आपूर्ति खाड़ी देशाें के आपूर्तिकर्ताओं द्वारा हाेर्मुज के रास्ते ही की जाती है. हालांकि, भारत ने आपातकालीन स्थिति के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का भंडारण तैयार कर रखा है, जाे आयात बंद हाेने की स्थिति में दाे से तीन महीने तक काम आ सकता है.
 
पर रसाेई गैस के मामले से अतिर्नित भंडार माैजूद नहीं है. यही वजह है कि माैजूदा बाधाएं पेट्राेल पपाें की तुलना में रसाेई घराें काे ज्यादा प्रभावित कर रही हैं. इसलिए रसाेई ईधन के लिए काेई भराेसेमंद प्लान भी (वैकल्पिक याेजना) एक ही समाधान पर आधरित नही हाे सकता. बल्कि इसमें विविधता, भंडारण और मांग में लचीलापन इन तीनाें का संतुलित मेल जरूरी है. आपूर्ति के स्त्राेत बढ़ाना जैसे अमेरिका और खाड़ी देशाें के अलावा अन्य देशाें से भी दीर्घकालिक समझाैते करना-एक एक कदम है जिस पर पहले से काम चल रहा है. इसका असर अमेरिका से बढ़ते आयात में साफ दिख रहा है.ऐसे में भारत काे घरेलू स्तर पर एलपीजी उत्पादन बढ़ाने की संभावनाओं का गंभीरता से आकलन करना हाेगा और भंडारण क्षमता का विस्तार भी जरूरी हाेगा. क्योंकि मंगलुरु और विशाखापत्तनम में माैजूद सुविधाएं मांग के मुकाबले सीमित हैं.
- पत्रलेखा चटर्जी, वरिष्ठ पत्रकार