दै. ‘आज का आनंद' अपनी पत्रकारिता के 55 वर्ष पूरे कर आज 56वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है. आज ही के दिन, सन 1971 में, एक छोटे-से कमरे से शुरू हुआ यह सफर केवल एक अखबार की कहानी नहीं, बल्कि जिद, जुनून और सच्ची पत्रकारिता का जीवंत इतिहास है. इस इतिहास के केंद्र में हैं 81 वर्ष की उम्र में भी उतनी ही ऊर्जा और धार के साथ सक्रिय संपादक श्याम अग्रवाल. उम्र भले ही 81 की दहलीज पर हो, लेकिन उनकी कलम की धार आज भी वैसी ही पैनी है, जैसी शायद 25 वर्ष की उम्र में रही होगी. व्यावसायिक चुनौतियां, बदलते समय का दबाव, और मीडिया के बदलते स्वरूप इन सबके बावजूद उन्होंने कभी अपनी पत्रकारिता के मूल्यों से समझौता नहीं किया. आज के दौर में, जब खबरें रील और ट्रेंड के हिसाब से तय होती हैं, श्याम अग्रवाल की पत्रकारिता हमें याद दिलाती है कि खबर की असली ताकत उसकी गहराई और सच्चाई में होती है. वे फौरी सनसनी में वेिशास नहीं करते, बल्कि खबर की तह तक जाकर उसके हर पहलू को सामने लाते हैं. उनकी भाषा में कोई बनावटीपन या पांडित्य नहीं. सीधी, सरल और आम आदमी की भाषा, जिसमें हर वह सवाल शामिल होता है, जो एक पाठक के मन में उठ सकता है. याद आता है गुलजार का एक कथन जब उनसे पूछा गया कि आप अपने लिरिक्स में इंग्लिश के वर्डस का यूज क्यों करते हैं.. तो उन्होंने मुस्कराकर कहा था, यह कौन-सी भाषा है? (आप अपने लिरिक्स में इंग्लिश के वर्डस का यूज क्यों करते हैं.) यह तो आपकी ही भाषा है. ठीक यही बात श्याम अग्रवाल की पत्रकारिता पर भी लागू होती है. वे वही भाषा बोलते हैं, जो समाज बोलता है. विश्रांतवाड़ी से साप्ताहिक के रूप में शुरू हुआ यह सफर, फिर नारायण पेठ और उसके बाद शिवाजीनगर तक पहुँचा, और 1979 से दैनिक के रूप में प्रकाशित होने लगा. 56 वर्षों तक किसी अखबार को लगातार जीवित रखना केवल प्रबंधन नहीं, बल्कि प्रतिबद्धता और वेिशास का परिणाम है. आज जब गोदी मीडिया और सुविधाभोगी पत्रकारिता जैसे शब्द आम हो गए हैं, ऐसे समय में श्याम अग्रवाल का दृष्टिकोण और भी प्रासंगिक हो उठता है. उनका मानना है कि भ्रष्टाचार और नैतिक पतन हमारे समाज की सबसे बड़ी समस्याएँ हैं.जिन पर चर्चा तो होती है, लेकिन समाधान की दिशा में गंभीर प्रयास नहीं होते. वे केवल बड़े घोटालों की बात नहीं करते, बल्कि उस आम आदमी की पीड़ा को आवाज देते हैं, जो रोज सरकारी दफ्तरों में अपमान, शोषण और लूट का सामना करता है. लोग कहते हैं मीडिया बिक चुका है. लेकिन ऐसे समय में, श्याम अग्रवाल जैसे पत्रकार यह साबित करते हैं कि टाइगर अब भी जिंदा है. जब तक ऐसी कलम जिंदा है,जब तक सच लिखने का साहस जिंदा है,तब तक पत्रकारिता भी जिंदा रहेगी. ईेशर से यही प्रार्थना है कि उन्हें स्वस्थ, सक्रिय और दीर्घायु बनाए रखे ताकि आने वाली पीढ़ियां उनसे सीख सकें कि पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं, एक बड़ी जिम्मेदारी है. - सुरेश परिहार, (वरिष्ठ उपसंपादक)