इस लेख की शुरुआत पाॅटर स्टीवर्ट के इस कथन से ‘नैतिकता यह जानने में है कि आपके पास करने का अधिकार है और ्नया करना सही है.’ वह इसलिए कि सिविल सर्विसेज के परिणाम इस बार कुछ ऐसे भी सत्य लेकर आए, जिनकाे झुठलाना संभव नहीं रहा. जाे प्रतियाेगी इस परीक्षा में सफल हुए वे उस खुशी, मान-सम्मान और शाेर का हिस्सा बने. जाे उनकी गाैरव-गाथा की प्रतिध्वनि थी और जाे कुछेक नंबराें से रह गए, वह भी किसी से कमतर नहीं थे. न अपने ज्ञान में, न समर्पण में और न संघर्ष में. उन्हाेंने परिणाम काे वीराें काे भांति स्वीकार किया और फिर अपनी मंजिल की तलाश में जुट गये हाेंगे. लेकिन इस बीच फेक न्यूज और वायरल हाेने की लत कुछ ऐसे भी प्रतियाेगियाें की कहानी लेकर आई, जाे अपनी विफलता के परिणाम काे थाेड़ी देर के लिए ही सही, पर कैद कर देना चाहते थे.
इस परीक्षा काे लेकर उन प्रतियाेगियाें की ऐसी वायरल हाेती प्रतिक्रिया पाॅवर के प्रति सामाजिक आकर्षण की पटकथा लिख गई. वे पास हुए नहीं और फेल उनकाे भाया नहीं. और जाे सूझा, वह वायरल हाेने का भाव था. और इसलिए परीक्षा के परिणाम आते ही कुछ प्रतियाेगी यह ठान बैठे थे कि गर जीत नहीं भी हुई, ताे ्नया हुआ, वायरल ताे हुआ जा सकता है. आखिर बिन परदाें के भी ताे मकान हाेते हैं और खुद्दारी के बिना भी ताे यह दुनिया चलती है. एक के बाद एक, खबरें वायरल हाेती रहीं, ढाेल-नगाड़े बजते रहे. पर कहीं न कहीं काेई खामाेशी वह सत्य बया कर रही थी.आजादी के बाद से इस परीक्षा की सफलता की दर बहुत कम रही है, लगभग 0.53 फीसदी, और हाल के वर्षाें में ताे यह अ्नसर 0.1-0.2 फीसदी तक ही रह गई है.
दिनाें-दिन मुश्किल हाेती यह परीक्षा लाखाें उम्मीदवाराें से छनकर हजार रि्नितयाें में सिमट जाती है. ऐसे में किसी का चूक जाना आश्चर्य नहीं, लेकिन सत्य जानकर भी अपनी असत्यता ओढ़े वायरल हाे जाना ्नया उचित है? यूपीएससी के नतीजाें और उसके आस-पास मचे शाेर-शराबे ने एक ऐसा माहाैल बना दिया, जहां उम्मीदवाराें का हर शब्द ‘ईश्वरीय’ लग रहा था और हर काेई उन पर आंख मूंदकर भराेसा कर रहा था. हालांकि किसी ने कभी यह नहीं साेचा कि इनके शब्दाें काे एक नैतिक जांच की जरूरत है, क्योंकि वे दावे सच नहीं थे और इससे भी ज्यादा निराशाजनक बात यह देखना रहा कि वह लगातार उस परिणाम पर अपना हक जताते रहे. जाे किसी और का था. और यह जानते हुए भी कि जब सच सामने आएगा, ताे काेहरा कितना गहरा हाेता वे नहीं झिझक.
शायद इस्टेंट गेटिफिकेशन की दुनिया में सब कुछ रील सा हाे जाता है.जब एरिक बर्न ‘अहं-अवस्थाओं’ या इंगाे स्टेटस पर चर्चा कर रहे थे. ताे उन्हाेंने शायद यह उम्मीद नहीं की हाेगी कि एक दिन सार्वजनिक बातचीत में किसी व्य्नित काे ‘बालअवस्था’ या ‘चाइल्ड स्टेट’ उसकी ‘वयस्क-अवस्था’ या ‘एडल्ट स्टेट’ पर हावी हाे जाएगी. वह ‘बाल-अवस्था हाल ही में तब देखने काे मिली.’ जब एक के बाद एक सिविल सर्विसेज के उम्मीदवार समाज से वाहवाही लूटने के लिए अपनी पूरी चालाकी और तिकड़माें का इस्तेमाल कर रहे थे.हालांकि सफलता का वह शाेर जल्द ही शांत हाे गया, क्योंकि वह झूठ की नींव पर खड़ा था. और जाे भी तथ्य पेश किए गए थे, वे असली नहीं बल्कि मनगंढ़त थे. अपनी असफलता काे स्वीकार करने के बजाय, उन उम्मीदवाराें ने नतीजाें काे प्रलाेभन के झूठे धागाें में लपेटना चुना और एक ऐसे रास्ते पर चल पड़े. जाे जाेखिम भरा था और जिससे उस व्य्नित के साथ-साथ उस संस्था की विश्वसनीयता भी कम हाे रही थी.
यह कुछ हिटलर के मंत्री जाेसेफ गाेएबल्स के ‘भ्रमित करने वाले सत्य के प्रभाव’ से प्रेरित हाेने जैसा था. यहां एक सीधा-सा सवाल उठता है. क्यों? काेई भी उम्मीदवार ऐसा गलत काम क्यों करेगा. जिसका नतीजा अंतत: उन परीक्षाओं और उम्मीदवाराें, दाेनाें की प्रतिष्ठा काे गंभीर नुकसान पहुंचाना ही है? जब इंसान काे बाेलने और सुनने, और बाद में समझने और समीक्षा करने का माैका मिला, ताे यह ‘हाेमाे सेपियंस’ (आधुनिक मानव) के लिए अपने पर्यावरण से जुड़ने और तालमेल बिठाने का एक बेहतरीन अवसर बन गया. संवाद करने की क्षमता ने ही ‘एक जीव’ हाेने के सही अर्थ काे परिभाषित किया. लेकिन इंसान के पास एक अतिर्नित बढ़त थी. जैसा कि हरारी ने कहा है, ‘सैपियंस की सचमुच अनाेखी खासियत यह है कि हम काल्पनिक कहानियां गढ़ सकते हैं और उन पर यकीन कर सकते हैं.
बाकी सभी प्राणी अपनी बातचीत की प्रणाली का इस्तेमाल असलियत काे बताने के लिए करते हैं. हम अपनी बातचीत की प्रणाली का इस्तेमाल नई असलियतें गढ़ने के लिए करते हैं.’ भी और उन नई असलियताें काे सिर्फ तभी खाेजा और समझाया जा सकता है. जब हम अपने झूठे अहंकार या बड़प्पन के लिए काेई गलत रास्ता न चुनें. बल्कि दिखावा करने के बजाय अपने बर्ताव में सच्चे रहें.ईमानदारी वह आंतरिक मूल्य है, जाे पूर्णता में अधिक विश्वास रखता है और उस नैतिक निरंतरता काे बनाए रखता है. जाे मानवीय मूल्याें के सार्वभाैमिक सिद्धांताें काे दृढ़ता से धामे रखती है. आइए हम फिर से उसी मार्ग पर लाैटें, क्योंकि केवल मनुष्य ही अपनी समीक्षा कर सकता है मनुष्य ही पश्चाताप कर सकता है, और मनुष्य ही स्वयं काे बदल सकता है. यह मनुष्य हाेने का भाव ही ताे मानव समाज में जानवराें तक काे यह समझा बैठा है कि मनुष्य पर भराेसा किया जा सकता है. - नन्दितेश नितय