हाईकाेर्ट का जुल्मी फैसला पुरुषाें काे और ताकत देगा!

    10-Apr-2026
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हाल ही में प्रयागराज हाईकाेर्ट ने कहा कि एक शादीशुदा पुरुष, किसी अन्य महिला के साथ लिव-इन में रह सकता है. इस तरह रहना काेई अपराध नहीं है. नैतिकता और कानून काे अलग रखना हाेगा. अदालत ने यह भी कहा कि पत्नी अपने अधिकाराें का प्रयाेग करते हुए, ऐसे आदमी से तलाक और मुआवजा ले सकती है. जबकि प्रयागराज हाईकाेर्ट की एक दूसरी बेंच ने निर्णय दिया कि वे उन लिव-इन जाेड़ाें काे सुरक्षा नहीं दे सकते, जाे पहले से ही शादीशुदा हैं और जिन्हाेंने तलाक नहीं लिया है. ऐसे जाेड़ाें के जीवन में दखल देने का अधिकार भी किसी काे नहीं है. लेकिन इसे कानूनी मान्यता तब तक नहीं दी जा सकती, जब तक कि तलाक न हाे. वास्तव में, परम स्वतंत्रता जैसी चीज काेई नहीं हाेती. हां, यदि ऐसे जाेड़ाें काे किसी हिंसा का सामना करना पड़ता है, ताे वे पुलिस से सुरक्षा मांग सकते हैं.
 
इसी तरह का फैसला दिल्ली हाईकाेर्ट ने भी दिया था. अदालत ने कहा था कि दाे वयस्क अपनी मर्जी से साथी चुन सकते हैं. और साथ रहने का फैसला कर सकते हैं. इन्हें यदि अपने परिवार के लाेगाें से खतरा है, ताे पुलिस सुरक्षा लेने का पूरा अधिकार है.कानून काे देखें ताे बिना तलाक लिए इस तरह रहने की इजाजत नहीं हाेती. इसके अलावा बहुत-सी अदालताें ने इसे पति या पत्नी के अधिकाराें का उल्लंघन भी माना है. एक जमाने में भारत में बदचलनी (एडल्टरी) काे कानूनन अपराध माना जाता था, लेकिन अब वह अपराध नहीं है. लेकिन इसके आधार पर तलाक मिल सकता है. अक्सर बहुत से सामाजिक मुद्दे कानूनी दांव-पेच में खाे जाते हैं.बहुत से पुरुषाें की साेच रहती है कि घर में एक पत्नी है, जाे उनके परिवार की जरूरताें और बच्चाें के पालन-पाेषण के लिए है, लेकिन बाहर घूमने-फिरने, माैज उड़ाने के लिए एक और स्त्री चाहिए.
 
घरवाली बाहरवाली, जैसी फिल्में विगत में सुपरहिट हाेती रही हैं. मशहूर हिंदी लेखक स्व. जैनेंद्र कुमार ने ताे सत्तर के दशक में एक प्रस्थापना ही दे डाली थी कि लेखकाें काे प्रेरणा पाने के लिए पत्नी के अलावा एक प्रेमिका भी चाहिए. उस समय जैनेंद्र जी के इस कथन पर बहुत विवाद भी हुआ था. कई स्त्रियाें ने कहा था कि यदि पत्नियां भी ऐसा ही कहने लगें कि उन्हें भी लिखने के लिए पति के अलावा एक और प्रेमी चाहिए, ताे क्या हाेगा.यह भी सच है कि दबे-छिपे ऐसा हाेता भी रहता है.बहुत-सी जगह कानून एक तरफ चलता है, और समाज के दवाब दूसरी तरफ. अब भी कई कम्युनिटीज ऐसी हैं, जहां पुरुष कई विवाह कर लेते हैं. कई जगहाें पर स्त्रियाें काे भी यह सुविधा प्राप्त है. यदि हालिया निर्णय के संदर्भ में पढ़ें, शादीशुदा पुरुषाें काे कानून का सहारा भी मिल जाएगा कि वे किसी और के साथ रह सकें.
 
जाे स्त्री किसी की पत्नी है, उसे हमेशा यह डर सताता रहेगा कि कहीं उसका पति किसी और के साथ रहने चला गया, ताे उसका क्या हाेगा. हर स्त्री के पास इतने संसाधन नहीं हाेते कि वह ऐसे मामले में अदालताें के च्नकर लगा सके और न्याय प्राप्त कर सके. यदि इस स्त्री के बच्चे हैं, ताे उनका क्या हाेगा. पति ताे किसी भी तरह की जिम्मेदारी से मु्नत हाे गया हाेगा. और क्या मात्र तलाक मिलने या मुआवजा मिलने से इस तरह से त्यागी गई स्त्रियाें का जीवन चल जाएगा.अकेलेपन और अपमान की उस भावना का क्या, जाे इन स्त्रियाें काे झेलनी पड़ेगी. त्यागना या रिजेक्शन एक ऐसी भावना हाेती है, जाे पल-पल सताती है. आज भी बहुत से पुरुषाें के मुंह से यह शब्द आसानी से निकलते हैं कि या ताे ये कर, वर्ना तुझे छाेड़ दूंगा. जैसे कि किसी स्त्री काे छाेड़ना उसका माैलिक अधिकार हाे. ऐसी रील्स से साेशल मीडिया भरा पड़ा है. कई लाेगाें काे इस बात काे बहुत अहंकारपूर्वक कहते भी सुना है कि हां मैं किसी और के साथ रहता हूं्.
 
रिलेशनशिप में भी हूं, लेकिन जाकर मेरी पत्नी से पूछाे कि क्या उसे किसी तरह की तकलीफ हाेने देता हूं, पैसे, टके, घर, बार आदि की. बाहर क्या करता हूं, इससे उसे क्या मतलब.इस तरह की वाक्यावली दरअसल स्त्री काे यही बताने के लिए हाेती है कि वह चाहे कुछ भी कर ले, है आज भी दाेयम दर्जे की नागरिक्. मणिशंकर अय्यर ने हाल ही में बयान दिया था कि मुसलमानाें के मुकाबले हिंदू और सिख पुरुष दाे पत्नियां अधिक रखते हैं. सीताराम येचुरी ने ताे पूरी किताब ही लिखी थी. इनके विचाराें से हम सहमत न हाें, लेकिन अय्यर या येचुरी ने जब यह लिखा, ताे इसका मतलब यह भी है कि समाज में एक से अधिक पत्नियां या संबंध रखने में बहुत से पुरुष आज भी यकीन करते हैं. भले ही समाज या कानून की नजर में इसे अच्छा न माना जाता हाे.
 
कई स्त्रियां भी इन दिनाें ऐसा करती पाई जाती हैं, लेकिन उनकी संख्या पुरुषाें के मुकाबले बहुत कम है, इसीलिए वे खबर भी बनती हैं. यह भी लगता है कि अब जब अदालत ने पुरुष के शादीशुदा हाेने पर भी लिव-इन में रहकर दूसरे संबंध काे रखने की अनुमति दे दी है, ताे ऐसे संबंधाें काे बढ़ने से कैसे राेका जा सकेगा.यह लेखिका बहुत-सी ऐसी साइट्स काे देखती हैं जहां स्त्रियां किसी कानून विशेषज्ञ या काउंसलर तक पहुंच के अभाव में, अपनी समस्याओं काे लिखती हैं और सहायता मांगती हैं. यदि यहां साै स्त्रियां हैं, ताे उनमें से कम से कम पंचानवे की समस्याएं पति काे लेकर हैं. उनमें से भी बहुताें की मुसीबत पति की उपेक्षा और दूसरी स्त्री या अनेक स्त्रियाें से सम्बंधाें काे लेकर है. जब अदालत का यह फैसला आया ताे इन्हीं स्त्रियाें के बारे में साेचने लगी. अब तक ताे इन्हें लगता था कि ऐसे प्रसंगाें में कानून उनकी मदद करेगा, लेकिन यह फैसला ताे एक तरह से पत्नी काे सताने वाले पुरुषाें काे और ताकत देगा. - क्षमा शर्मा