टक्सप्लास्टी : पार्शियल नी रिप्लेसमेंट (partial knee replacement)

साईश्री विटालाइफ के एमडी व चीफ रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जन और स्पोर्ट्स इंजुरी स्पेशलिस्ट डॉ. नीरज आडकर

    12-Apr-2026
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मांसपेशियां व हड्डियों के दर्द में उनकी गंभीरता के अनुसार इलाज किया जाता है. इसमें सर्जरी एक महत्वपूर्ण उपाय होता है. पेशेंट को जल्दी ठीक होने और उसकी रोजमर्रा की जिंदगी पहले जैसी आसान करने में फिजियोथेरेपिस्ट बहुत महत्वपूर्ण होते हैं. फिजियोथेरेपिस्ट की मदद से पेशेंट जल्दी ठीक हो सकता है. इस बारे में पूछे गए प्रश्नों के विस्तार से उत्तर देकर पुणे स्थित साईश्री विटालाइफ के संचालक और स्पोर्ट्स इंजुरी विशेषज्ञ डॉ. नीरज आडकर ने शंकाओं का समाधान किया.
  डॉ. नीरज आडकर चीफ रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट और स्पोर्ट्स इंजरी सर्जन चेयरमैन, साईश्री विटालाइफ हॉस्पिटल
 
सवाल : हड्डियों में घनत्व बना रहे और अस्थिभंग ना हो इस के लिए विटामिन डी कितना महत्वपूर्ण है?
जवाब : हड्डियां बनाने में मुख्य कार्य करने वाले कैल्शियम का शरीर में शोषण हो, इसलिए विटामिन-डी शरीर की बड़ी मदद करता है. विटामिन-डी की उचित मात्रा के अभाव में हड्डियां दुबली और कड़ी हो जाने से टूटने की संभावना बढ़ती है. खासकर बूढ़े लोगों में गिर जाने से अस्थिभंग का खतरा ज्यादा होता है. इन के लिए यह विशेष मायने रखता है. ओस्टियोपोरोसिस के पीछे साधारण कारण विटामिन-डी की कमी का होना होता है. लंबे समय तक हड्डियां मजबूत रहे तथा अस्थिभंग का खतरा विशेषकर कम हो इसके लिए विटामिन-डी की काफी मात्रा आवश्यक है.
सवाल : अस्थिबंधन (लिगामेंट) में आयी चोट अथवा शल्यक्रिया के बाद ठीक होने में विटामिन-डी की कमी के कारण क्या अधिक समय लगता है?
जवाब : जी हां. किसी भी प्रकार की चोट अथवा शल्यक्रिया के बाद ठीक होने में विटामिन डी की कमी अड़चनें पैदा कर सकती है. यह कमी टिश्यू, अस्थिबंधन, स्नायु तथा हड्डियों को पूर्ववत होने की क्रिया में बाधा बन सकती है. साथ ही जिन लोगों में इस की कमी है उन्हें दर्द तथा सूजन की तकलीफ अधिक होती है इसलिए ठीक होना कठिन और तकलीफदायक होता है. ठीक होने में अधिक समय जाता है एवं उलझने होने का खतरा बढ़ता है. शल्यक्रिया या खेलकूद में चोट आने के बाद शरीर में विटामिन डी की उचित मात्रा हो तो ठीक होने की क्रिया अधिक तेजी से होती है.
सवाल : क्या जोड़ों को बदलने की शल्यक्रिया से पहले या उसके बाद विटामिन डी की पूरक मात्रा देने की सलाह आप देंगे? जवाब : जी हां. अगर रोगी के शरीर में विटामिन-डी की मात्रा कम हो तो जोड़ों को बदलने की शल्यक्रिया से पहले या उसके बाद विटामिन-डी की पूरक मात्रा देने की सलाह हम देते है. ठीक होने के लिए स्नायुओं की शक्ति तथा हड्डियां पूर्ववत होना ये बातें अहम होती हैं, इनके लिए विटामिन-डी सहायता करता है. शल्यक्रिया के बाद सूजन और वेदना कम हो इसलिए विटामिन-डी की मदद मिलती है. शल्यक्रिया से पहले विटामिन-डी देने से शरीर को ठीक होने की पूर्व तैयारी में सहायता होती है और बाद में देने से ठीक होने की प्रक्रिया में विटामिन-डी हाथ बंटाता है.

सवाल : शरीर में अगर यूरिक एसिड अधिक हो तो जोड़ों तथा हड्डियों के स्वास्थ्य पर क्या असर होता है?
जवाब : जब यूरिक एसिड जोड़ों में स्फटिक (क्रिस्टल्‌‍स) रूप में जमा होता है तब ऐसी स्थिति को गाउट कहते हैं. इन स्फटिकों के कारण जोड़ों में अचानक तीव्र वेदना, सूजन, जलन और खासकर पैर के अंगूठे, घुटने, टखने तथा अन्य जोड़ें में होती है. गाउट की तकलीफ बार बार हो तो जोड़ों में उपस्थित नरम भाग को हानि पहुंचती है और कुछ समय पश्चात हड्डियां घिसने लगती है. गाउट के कारण होने वाली तीव्र जलन का असर आस-पास के टिश्यू पर होता है. वे सख्त होने से उनकी चलन-वलन क्षमता कम होती है. जोड़ों का स्वास्थ्य लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए यूरिक एसिड का स्तर होना आवश्यक है.
सवाल : क्या तीव्र स्वरूप के गाउट से जोड़ों को हमेशा के लिए नुकसान हो सकता है?
जवाब : जी हां. अगर गाउट की समस्या की ओर अनदेखी की गयी तो जोड़ों को हमेशा के लिए हानि हो सकती है. आगे चलकर बार-बार गाउट की तकलीफ हो तो जोडों में घिसाव शुरू हो जाता है और यूरिक एसिड के स्फटिक (क्रिस्टल्स) टॉफी नाम के गोले का रूप लेते है, जो हड्डियां तथा नरम टिशुओं को अधिक नुकसान पहुंचाते है. जोड़ों में विकृति आ सकती है, उन में कड़कपन तथा दर्द बना रहता है जो चलने-फिरने में परेशानी पैदा करता है. इन बातों से उस व्यक्ति का जीवन कठिन तथा काम करने की क्षमता पर असर होता है. समय पर उपचार और जीवनशैली में बदलाव हो जाता है इस प्रकार लंबे समय तक की हानि को रोक जा सकता है.
सवाल : जोड़ों की बदलने की शल्यक्रिया से पहले यूरिक एसिड के स्तर को नियंत्रित करना आवश्यक है क्या?
जवाब : बिल्कुल सही, यूरिक एसिड का उच्च स्तर होने से शल्यक्रिया के बाद गाउट भड़कने का खतरा बढ़ सकता है जो वेदना, सूजन बढ़ाकर ठीक होने की क्रिया धीमी कर देता है. इस के अलावा जोड़ों का संसर्ग या घाव भरने में देरी जैसी उलझनें आने का खतरा भी हो सकता है, अगर यूरिक एसिड की मात्रा उचित ना हो. शल्यक्रिया से पहले यूरिक एसिड के स्तर को नियंत्रित रखने से ठीक होने की क्रिया सहजता से होने के साथ-साथ नये बदले हुए जोड़ में तनाव कम होता है. आपको आहार में बदलाव, दवाइयां या दोनों में सुझाव दे कर आप डॉक्टर शल्यक्रिया से पहले यूरिक एसिड के स्तर को नियंत्रित करने की सलाह दे सकता है.