विद्यावान वही है जाे श्रेष्ठ के लिए निम्न काे समर्पित कर सके

    20-Apr-2026
Total Views |
 

Osho 
 
एक छाेटी-सी घटना मुझे याद आती है.एक गांव में बुद्ध का अपमान हुआ था. जिस सुबह वे गांव में आये, उस गांव में एक गरीब व्यक्ति था, सुदास. वह सुदास सुबह ही उठा था. सूरज निकला था और सुदास ने अपनी झाेपड़ी के पीछे जाकर देखा, उसकी छाेटी-सी तलैया में कमल का ूल निकला था, बेमाैसम. अभी ॠतु न थी कमल के खिल जाने की. सुदास ने साेचा, इस ूल काे अगर मैं बाजार में ले जाऊंगा, आज जरूर मुझे एक रुपया देने वाला काेई न काेई हिम्मतवर ग्राहक मिल जायेगा-बेमाैसम का कमल का ूल है, काेई न काेई खरीद लेगा.वह इस ूल काे ताेड़कर बाजार की तरफ चला, साेचा था, अगर एक रुपया मिल जाये ताे मैं धन्य हाे जाऊं. रास्ते पर ही था कि नगर के सेठ का रथ, रास्ते पर गुजरता दिखायी पड़ा. ूल काे देखकर नगर-सेठ ने रथ राेक लिया और सुदास से कहा, ूल कितने में दाेगे सुदास? सुदास की हिम्मत न पड़ी कहने कि एक रुपये में दूंगा.
 
इतना ही कहा उसने, बेमाैसम का ूल है, जाे भी आप दे दें. नगरसेठ ने कहा, पांच साै स्वर्ण मुद्राएं मैं तुम्हें देता हूं लेकिन किसी और काे मत बेच देना.नगर-सेठ यह कह भी नहीं पाया कि पीछे से राजा का जाे सेनापति था, उसका घाेड़ा आकर रुक गया. उसने सुदास से कहा, सुदास, ूल मैंने खरीद लिया है. और नगरसेठ जितने पैसे देते हाें, उससे दस गुना ज्यादा मैं देता हूं. सुदास ने कहा, पागल हाे गये हैं आप लाेग, मैं ताे एक रुपये में देने की हिम्मत न जुटा पाया था, नगर-सेठ पांच साै स्वर्ण मुद्रायें देते हैं, आप दस गुने ज्यादा देंगे! यह बात ही चलती थी कि राजा का रथ आ गया. और राजा ने कहा, ूल खरीद लिया गया. सेनापति जितने देते हाेंगे उससे दस गुना ज्यादा मैं दूंगा.सुदास ने कहा, बात क्या है? हाे क्या गया है आप लाेगाें काे?
 
जिनसे एक रुपया छूटने की भी मुझे आशा न थी, वे इतना दे सकते हैं एक ूल के लिए! कारण क्या ै? राजा ने कहा, तुम्हें पता नहीं, बुद्ध का आगमन हाे रहा है गांव में. हम उनके स्वागत हेतु जा रहे हैं. मैं ही इस ूल काे चढ़ाना चाहूंगा, बेमाैसम का ूल है. उनकी कल्पना भी नहीं हाे सकती कि कमल का ूल भी आज काेई चरणाें में रखेगा. यह काैन नहीं चढ़ाना चाहता? सुदास ने कहा, िफर बेचने का सवाल ही नहीं, ूल मैं ही चढ़ा दूंगा. यह ूल मैं ही लिए जाता हूं.राजा ने कहा, पागल हाे गए हाे सुदास! अब तक सुदास कहता था, राजा पागल हाे गया, नगर-सेठ पागल हाे गया, सेनापति पागल हाे गया. वे तीनाें बाेले, पागल हाे गये हाे? जन्म- जन्म की दरिद्रता मिट जायेगी तुम्हारी, आने वाली पीढ़ियाें की, तुम बेच दाे! सुदास ने कहा, मिट गयी जन्म-जन्म की दरिद्रताइस ूल काे हम ही चढ़ा देंगे. वह पैदल ही बुद्ध के आगमन की प्रतीक्षा में नगर के बाहर चला. राजा पहले पहुंच गये, सेनापति पहले पहुंच गये, नगर-सेठ पहले पहुंच गये.
 
उन सबने जाकर बुद्ध से कहा, आज बड़े आश्चर्य की घटना घट गयी है. गांव के एक दरिद्रतम व्यक्ति ने किसी भी मूल्य पर एक कमल का ूल बेचने से इंकार कर दिया! और उसने कहा कि मैं ही चढ़ा दूंगा. िफर सुदास भी आया, उसने बुद्ध के चरणाें में वह ूल रखा.बुद्ध ने कहा, पागल सुदास, तूने बेच क्याें न दिया, तेरी पीढ़ियाें तक की दरिद्रता मिट जाती? सुदास ने कहा, प्रभु, प्रेम से पैसा बड़ा नहीं हाेता है, और रुपए में आत्मा नहीं बेची जा सकती. जब तक यह ूल था, तब तक बेचने काे तैयार था. जब से आपके चरणाें का खयाल आया, बेचने का सवाल ही नहीं रह गया. मैं खुद ही चढ़ा दूंगा. दरिद्र भी ताे प्रेम कर सकते हैं? दरिद्र भी ताे आदर कर सकते हैं? दरिद्र भी ताे श्रद्धा दे सकते हैं? दरिद्राें के पास भी ताे काेई आत्मा है? इस ूल काे स्वीकार कर लें.बुद्ध ने अपने भिक्षुओं से कहा, भिक्षुओ, सुदास पढ़ा-लिखा नहीं है, लेकिन विद्यावान है, शिक्षित है. अपठित है, लेकिन विद्यावान है. एक भिक्षु ने पूछा, विद्यावान का अर्थ क्या है? बुद्ध ने कहा, जिसे जीवन में श्रेष्ठतर मूल्याें का बाेध हाे, जाे निम्न मूल्याें काे श्रेष्ठ मूल्याें के लिए समर्पित कर सके, वही विद्यावान है और सुदास ने प्रेम के लिए पैसे काे ठुकरा दिया.