दुनिया में एक नई करेंसी की चाह लगातार बनी हुई है?

    20-Apr-2026
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हाेर्मुज जलडमरूमध्य 2026 में भू-राजनीति का केंद्र बन गया है. पिछले दिनाें हमने देखा कि जब भी ईरान यहां से गुजरने वाले जहाजाें काे राेकने या अनुमति देने के लिए अपनी सैन्य ताकत दिखाता है, ताे वैश्विक अर्थव्यवस्था सहम जाती है. जब भी अमेरिका और ईरान के बीच शब्दाें और मिसाइलाें का आदान-प्रदान हाेता है, ताे हर धमकी के साथ अर्थव्यवस्था पर असर पड़ता है.पिछले हफ्ते बैंकराें, बीमा कंपनियाें और उन देशाें काे, जाे अपने जहाजाें काे इस मार्ग से गुजारना चाहते थे, एक नई भुगतान प्रणाली के बारे में पता चला. यह प्रणाली ईरानियाें ने उन जहाजाें के लिए शुरू की है, जाे यहां से आवाजाही करना चाहते हैं.इसके तहत दाे विकल्प दिए गए हैं. पहला, 20 लाख डाॅलर की रकम चीनी युआन में भुगतान करें. दूसरा, 20 लाख डाॅलर क्रिप्टाेकरेंसी में दें.
 
पिछले हफ्ते शनिवार तक, मुश्किल से एक दर्जन जहाज ही यहां से गुजर पाए, जिनमें से कई ईरान से जुड़े हुए थे. फिर अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहाें से निकलने वाले जहाजाें की नाकेबंदी का आदेश दे दिया.खबर है कि कुछ जहाज जलडमरूमध्य काे पार कर चुके हैं.युआन या क्रिप्टाेकरेंसी में जमा की गई रकम का अब तक काेई रिकाॅर्ड नहीं है. ईरान द्वारा दी गई चुनाैती ने एक बार फिर डाॅलर के पतन की चर्चाओं काे जन्म दिया है. दुनिया की रिजर्व मुद्रा के रूप में अमेरिकी डाॅलर की भूमिका की नींव 20 जुलाई, 1974 काे सऊदी अरब में हुए एक समझाैते के साथ पड़ी थी. अमेरिका ने सऊदी अरब काे आपसी लेन-देन का एक प्रस्ताव दिया. कहा गया कि सऊदी अरब कच्चे तेल के हर बैरल का भुगतान अमेरिकी डाॅलर में करेगा, और इसके बदले में अमेरिकी सरकार सऊदी शासन काे सुरक्षा की गारंटी देगी. चतुर भू-राजनीति काे चतुर अर्थशास्त्र का सहारा मिला.
 
तेल की वैश्विक मांग और डाॅलर के वैश्विक मूल्य-निर्धारण ने डाॅलर के वर्चस्व काे और भी मजबूत कर दिया. पांच दशकाें बाद, संप्रदाय-आधारित वर्चस्व और वैश्विक मुद्रा के विचार अपनी चमक खाे रहे हैं. भू-राजनीति वैश्विक वित्तीय व्यवस्था काे नए सिरे से गढ़ रही है. चीन कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा उपभाेक्ता है, जाे हर दिन 168 लाख बैरल तेल की खपत करता है. इसका ज्यादातर हिस्सा (37 प्रतिशत) हाेर्मुज करास्ते से ही आता है. ईरान और सऊदी अरब से खरीदे गए तेल का भुगतान चीन युआन में करता है. रूस और चीन के बीच व्यापार भी युआन में हाेता है, जबकि भारत से हाेने वाला व्यापार अक्सर रुपये में हाेता है. पेट्राे-डाॅलर के प्रभाव क्षेत्र काे अब पेट्राे-युआन से चुनाैती मिल रही है भुगतान में आया यह ढांचागत बदलाव एक और बदलाव काे बढ़ावा दे रहा है कि देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार काे कैसे रख रहे हैं.
 
2001 में, केंद्रीय बैंकाें के 72 प्रतिशत से ज्यादा विदेशी मुद्रा भंडार अमेरिकी डाॅलर में रखे हुए थे. 2026 में, सिर्फ 56.7 प्रतिशत भंडार ही अमेरिकी मुद्रा में रखा है, जाे पिछले 30 वर्षाें में सबसे कम है. वर्ष 2022 से केंद्रीय बैंक (खासकर भारत और चीन के) बड़े पैमाने पर साेना खरीद रहे हैं. दुनिया भर के केंद्रीय बैंकाें के लिए साेना संपत्ति का सबसे बड़ा भंडार बन गया है और उसने अमेरिकी ट्रेजरी बाॅन्ड काे भी पीछे छाेड़ दिया है. साेने की कीमताें में बढ़ाेतरी से इसके मूल्य और खरीद, दाेनाें में ही तेजी आई है. केंद्रीय बैंक हर साल लगभग 1,000 टन साेना जमा कर रहे हैं. साेने की इस खरीदारी की वजह से रिजर्व में डाॅलर का औसत हिस्सा 12 प्रतिशत कम हाे गया. डाॅलर पर निर्भरता कम करने के लिए खुले और छिपे, दाेनाें तरह के कदम उठाए जा रहे हैं.
 
इसकी मुख्य वजहें हैं- अमेरिका की मनमानी नीतियाें से जुड़े जाेखिम काे कम करनाऔर निवेश में विविधता लाना. रूस के 300 अरब डाॅलर के रिजर्व काे फ्रीज किए जाने के बाद, उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं अब दूसरे विकल्पाें, यानी ‘किसी भी आपात स्थिति के लिए’ वैकल्पिक उपायाें की गुंजाइश बना रही हैं. इसी कारण, कई देश अब अमेरिकी ट्रेजरी बाॅन्ड बेच रहे हैं. भारत उन देशाें में शामिल था, जाे अपनी हाेल्डिंग्स बेच रहे थे. जनवरी में उसकी अमेरिकी ट्रेजरी हाेल्डिंग्स 247 अरब डाॅलर के उच्चतम स्तर से 26 प्रतिशत गिरकर पांच साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गईं. इस पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं.अपनी नियुक्ति के तुरंत बाद, अमेरिकी राजदूत सर्जियाे गाेर ने रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्हाेत्रा से मुलाकात की.इस मुलाकात का मकसद साफ ताैर पर नहीं बताया गया है, लेकिन ‘डाॅलर छाेड़ाे’ आंदाेलन के बढ़ते दायरे काे देखते हुए, यह काेई रहस्य नहीं रह जाता. कुछ हफ्ताें बाद, मल्हाेत्रा ने कहा कि भारत अमेरिकी सरकारी बाॅन्ड नहीं बेच रहा है.
 
स्थानीय मुद्रा में भुगतान करने से, जैसा कि भारत ने पहले भी किया है और अब भी कर रहा है, आयातित महंगाई पर लगाम लगती है. दशकाें से वे देश, जाे डाॅलर का बाेझ उठा रहे हैं, प्रतिस्पर्धी विकल्प बनाने या उन पर विचार करने की आकांक्षा रखते आए हैं. यह भी उतना ही सच है कि डाॅलर की ‘माैत’ की बात हमेशा से ही एक अतिशयाेक्ति रही है. ये ऐसी घाेषणाएं और इच्छाएं थीं, जाे केवल उम्मीद में लिपटी हुई थीं. जब से जाॅन मेनार्ड कीन्स और अर्न्स्ट एफ शूमाकर ने 1942 में एक वैश्विक मुद्रा (बैंकर) का विचार पेश किया, तब से दुनिया में एक वैश्विक मुद्रा की चाह बनी हुई है.डाेनाल्ड ट्रंप की वापसी के बाद से यह चाह और भी बढ़ गई है. लेकिन डाॅलर का दबदबा उसके विशाल आकार और भू-राजनीतिक परिदृश्य की जटिलता के कारण बना हुआ है.जाे लाेग डाॅलर का विराेध करते हैं, वे आपस में भी एक- दूसरे के विराेधी हैं. ब्रिक्स की जिस मुद्रा की इतनी चर्चा हाे रही है, उसके लिए चीन और भारत, दाेनाें का एकमत हाेना जरूरी है. वैश्विक मुद्रा की चाहत के रास्ते में वे चुनाैतियां भी आड़े आती हैं, जिनका सामना उसे करना हाेगा. अमेरिका की सैन्य और आर्थिक ताकत ने डाॅलर काे एक सुरक्षित ठिकाने के ताैर पर स्थापित कर दिया है. - शंकर अय्यर