आप साधु-संन्यासियाें से पूछ रहे हैं कि आत्मा अमर है? आप झुठलाना चाहते हैं माैत काे-कि काेई कह दे कि‘आत्मा अमर है,’ भराेसा दिला दे, ताे राेनेकी जरूरत न रहे, दुःख की जरूरत न रहे. क्योंकि अगर आत्मा अमर है, ताे कुछ बात नहीं. शरीर ही छूटा,वस्त्र बदले, लेकिन बेटा कहीं न कहीं जिन्दा है; कभी न कभी मिलना हाेगा.ईसाई, मुसलमान, सभी साेचते हैं कि मरने के बाद फिर अपने संबंधियाें से मिलना हाे जाता हैं. ताे थाेड़े दिन का फासला है, थाेड़े दिन की बात है; झेल लाे. और काेई मिटा नहीं काेई मरा नहीं. आप दुःख से बचने का उपाय खाेजे रेहे हैं.माैत सामने खड़ी है, इसके दुःख काे भाेगाे. झुठलाओ मत. तरकीबें मत खाेजाे. जिस पत्नी से सुख पाया है, उसका दुःख भी भाेगाे. जिस पति के साथ आनन्द किया था, उस पति के जाने पर अभाव का जाे नरक है, उससे गुजराे. न ताे शराब पी कर भुलाओ, न ताे सिद्धांताे काे पी कर भुलाओ.न भजन-कीर्तन करके अपने काे समझाओ; न गीता पढ़ कर अपने मन काे यहाँ-वहाँ लगाओ.
दुःख सामने खड़ा है, दुःख काे ही तुम्हारा ध्यान बन ाने दाे. ताे उस मृत्यु से तुम निखर कर बाहर आओगे .तुम आग से गुजर जाओगे, तुम्हारा साेना निखर जाएगा, बैराग्य का उदय हाेगा फिर तुम्हें मुझसे नहीं-किसी से भी नहीं-पूछना पड़ेगा कि वैराग्य गहरा कैसे हाे? वैराग्य गहरा हाे जाएगा. एक माैत काे भी तुम ठीक से देख लाे, ताे जिन्दगी व्यर्थ हाे जाती है. एक सूखा पत्ता वृक्ष से गिरता हुआ भी तुम ठीक से समझ लाे, ताे जिन्दगी में कुछ पाने जैसा नहीं रह जाता. लेकिन नहीं; जब काेई मरता है, तब तुम अपने काे समझाने में लग जाते हाे. और जब काेई मर भी जाता है, तब भी यहीं साेचते हाे कि दुर्घटना है. माैत जीवन का वास्तविक तथ्य है-दुर्घटना नहीं. यह काेई संयाेग नहीं है. यह हाेने ही वाला है; यह जीवन की नियति है.
जब काेई मरता है ताे तुम ऐसा साेचते हाे कि कुछ भूल-चूक हाे गई, कहीं कुछ गड़बड़ हाे गई, कुछ कर्म का फल रहा हाेगा. तुम यह बात भूल रहे हाे कि माैत हर जीवन के पीछे लगीं ही है; उससे ज्यादा निश्चित और कुछ भी नहीं है. वही एक मात्र निश्चित तथ्य है. फिर जब काेई दूसरा मरता है, तब तुम्हेंं कभी खयाल नहीं आता कि यह मेरे मरने की भी खबर है. तब तुम दूसरे पर दया करने का विचार करते हाे कि बड़ा बुरा हुआ; बेचारा! तुम्हें यह खयाल कभी भी नहीं आता कि काेई भी जब मरता है, तब तुम ही मर रहे हाे. लेकिन हर आदमी यह साेचकर चलता है कि हमेशा दूसरा मरता है. मैं ताे कभी मरता नहीं और एक लिहाज से आपका तर्क ठीक भी है. क्योंकि अभी तक ताे आप मरे नहीं. इसलिए....मैंने सुना है कि एक आदमी एक पक्षियाें की दुकान से एक ताेता खरीद कर ले गया.
दूसरे दिन ही वापस आया और ताेता बेचने वाले पर नाराज हाेने लगा और कहा कि ‘ तुमने किस तरह का ताेता दिया! वह घर जा कर मर गया.’ ताे उस दुकानदार ने कहा, ‘लेकिन यह मैं मान ही नहीं सकता, क्योंकि ऐसी हरकत उसने इसके पहले कभी नहीं की. ताेता यहाँ भी था, महिनाें तक रहा, ऐसी हरकत उसने पहले कभी की नहीं. इसलिए मैं भराेसा कर ही नहीं सकता.’ आपका भी तर्क यही है. अभी तक आप मरे नहीं, ताे भराेसा कैसे कर सकते हैं कि मर जाएँगे. और जाे अब तक नहीं हुआ, वह आगे भी क्यों हाेगा? जब दूसरा मरता है, तब भी आप साेचते हैंः दूसरा मरता है. तब आपकाे खयाल नहीं आता है कि मैं भी मरूँगा; या मैं भी मर रहा हूंॅ ; या यह खबर मेरी माैत की खबर है. अगर आप दुःख काे ठीक से जीयें, ताे हर माैत आपकाे अपनी माैत मालूम पड़ेगी. तब वैराग्य गहरा हाे जाएगा.