मांसपेशियां व हड्डियों के दर्द में उनकी गंभीरता के अनुसार इलाज किया जाता है. इसमें सर्जरी एक महत्वपूर्ण उपाय होता है. पेशेंट को जल्दी ठीक होने और उसकी रोजमर्रा की जिंदगी पहले जैसी आसान करने में फिजियोथेरेपिस्ट बहुत महत्वपूर्ण होते हैं. फिजियोथेरेपिस्ट की मदद से पेशेंट जल्दी ठीक हो सकता है. इस बारे में पूछे गए प्रश्नों के विस्तार से उत्तर देकर पुणे स्थित साईश्री विटालाइफ के संचालक और स्पोर्ट्स इंजुरी विशेषज्ञ डॉ. नीरज आडकर ने शंकाओं का समाधान किया.
सवाल : गाउट की समस्या के साथ जॉइंट का स्वास्थ्य अच्छा रखने के लिए पेशेंट किस तरह की सावधानी रखें ? जवाब : अगर गाउट की व्याधि हो तो यूरिक एसिड की मात्रा नियंत्रित रखना अनिवार्य है .निर्देशित मात्रा के अनुसार दवाइयाँ लेने से गाउट की तकलीफ ना हो तो भी भविष्य में ऐसी तकलीफ से बचाव हो सकता है. रेडमीट, शेलफिश या अल्कोहल जैसे विशिष्ट नत्र पदार्थ अधिक होने अधिक व्यूरीन वाले खाद्य पदार्थ ना लें ताकि गाउट के लक्षण तीव्र ना बनें. जोड़ों में तनाव कम हो इसलिए भरपूर पानी पीएं और वजन उचित रखें. नियमित कसरत तथा जांच-चक्र के लिए डॉक्टर द्वारा दिए हुए समय का प्लान करने से जोड़ स्वस्थ तथा कार्यक्षम रहते हैं.
सवाल : TKR या कूल्हे का जॉइंट बदलने की शल्यक्रिया के बाद ठीक होने की प्रक्रिया पर डायबिटीज का क्या असर होता है? जवाब : पूरा घुटना या कूल्हे का जॉइंट बदलने की शल्यक्रिया के बाद शरीर पूर्ववत होने की प्रक्रिया पर डायबिटीज का महत्वपूर्ण प्रभाव हो सकता है. खून में चीनी का स्तर अधिक हो तो रक्त संचार कमजोर होता है तथा जख्म ठीक होने में अधिक समय लगता है, परिणामस्वरूप संसर्ग से लड़ने की शरीर की क्षमता कम होती है. अर्थात डायबिटिक लोगों को ठीक होने में अधिक समय लगता है, इसलिए उन पर बारीकी से ध्यान देना आवश्यक होता है. जटिलता कम से कम हो इसलिए शल्यक्रिया से पहले और उसके के बाद खून में चीनी का स्तर उचित रखना अहमियत रखता है. उचित रख-रखाव तथा सावधानी बरतने से अधिकतर डायबिटिक पेशेंट की शल्यक्रिया सफल होती है.
सवाल : जॉइंट बदलने की शल्यक्रिया में डायबिटीक पेशेंट संसर्ग बाधित होने का खतरा क्या अधिक होता है ?
जवाब : हां, जॉइंट बदलने की शल्यक्रिया में डायबिटीक पेशेंट इंफेंक्शन बाधित होने का खतरा अधिक होता है. चीनी के उच्च स्तर के कारण रोगप्रतिकारक शक्ति कमजोर होती है और बैक्टीरिया से लड़ना शरीर के लिए कठिन होता है. बदले हुए जॉइंट के आजूबाजू इंफेंक्शन गंभीर स्वरूप लेता है इसलिए फिर से शल्यक्रिया अथवा लंबे समय तक एंटीबायोटिक्स लेना अपरिहार्य होता है. इसी कारण शल्यक्रिया के पहले खून में चीनी की मात्रा उचित होना अहम मायने रखता है. डायबिटीज नियंत्रित हो तो पेशेंट को जटिलता का खतरा कम से कम हो सकता है.
सवाल : जॉइंट बदलना अथवा लिगामेंट की क्षति ठीक करने के लिए आवश्यक शल्यक्रिया डायबिटीक पेशेंट की करनी पड़े तो आप कौन सी खास सावधानी रखते है ?
जवाब : शल्यक्रिया से पहले और के बाद एक टीम के रूप में, पेशेंट को उपचार देने वाले डॉक्टर्स से या Endocrinologist से विस्तारपूर्वक चर्चा करते है जिस से खून में चीनी का स्तर स्थिर रहने की गारंटी मिलती है. साथ ही बेहोशी की दवा देने से पहले पूरे शरीर की जांच की जाती है और एनेस्थिटिस्ट पेशेंट के खून की सभी रिपोर्ट्स देखता है. वह जब हार्मोन्स से संबंधित सकारात्मक प्रतिक्रिया देता है तब शल्यक्रिया की जाती है. शल्यक्रिया करते समय तथा ठीक होने की कालावधि में खून में ग्लूकोज की मात्रा कम-ज्यादा ना हो इसलिए बारीकी से नजर रखी जाती है. इंफेंक्शन टालने के लिए एंटीबायोटिक्स और जख्म का विशेष रूप से ख्याल रखा जाता है. पेशेंट की जरूरत के मुताबिक पोषक घटकों का प्रावधान तथा फिजियोथेरेपी की व्यवस्था की जाती है ताकि डायबिटीज के कारण होने वाले खतरे ठीक होने की कालावधि में कम से कम हो .
सवाल : लिगामेंट्स में चोट आने पर शल्यक्रिया जरूरी है या वह पुरानी पद्धति से ठीक होगी इस का निर्णय आप कैसे लेते हैं ? जवाब : लिगामेंट में आयी चोट का प्रकार, गंभीरता, पेशेंट की आयु, उस की रोज की व्यस्तता, आदि चीजों के बारे में जान कर और साथ ही देखते है कि जोड़ स्थिर है या नहीं? हल्की चोट अथवा अंशत: फटा हुआ अस्थिबंधन विश्राम, जोड़ देना और फिजियोथेरेपी से ठीक हो सकता है. खास कर अथक काम करने वाले अथवा खिलाड़ियों के पूरी तरह फटे हुए अस्थिबंधन अच्छी तरह ठीक होने के लिए शल्यक्रिया आवश्यक होती है. MRI जैसी साफ इमेज दिखाने वाली जांच पद्धति के कारण हमें सर्वोत्तम उपचार चुनने में सहायता मिलती है. ऐसा निर्णय लेते वक्त पेशेंट के जीवन में लक्ष्य तथा जीवनशैली के बारे में निश्चित रूप से विचार होता है.
सवाल : ACL ( Anterior Cruciate Ligament) यानि अस्थिबंधन पुनर्बांधणी शल्यक्रिया के बाद पूरी तरह ठीक होने के लिए कितना समय अपेक्षित है? जवाब : ACL(A nterior Cruciate Ligament ) यानि अस्थिबंधन पुनर्बांधणी शल्यक्रिया के बाद पूरी तरह ठीक होने के लिए साधारणत: 12 से 14 हफ्ते लगते हैं. किन्तु ठीक होने की व्यक्ति के अनुसार तथा रोज की जिंदगी पूर्ववत होना इन बातों पर समय निर्भर रहता है और बदल भी सकता है. पहले कुछ हफ्ते वेदना और सूजन कम करने के लिए केंद्रित होती है बाद में ताकत धीरे धीरे वापस लाने के लिए प्रशिक्षण तथा हालचाल के लिए व्यायाम ये चीजें होती है. तीन महीनों के बाद ज्यादातर पेशेंट हल्के काम कर सकते है लेकिन खेलकूद में पूरी तरह सम्मिलित होने के लिए 8 से 9 महीने आवश्यक हैं. घुटनों में स्थिरता आने के लिए संरचित पुनर्वसन कार्यक्रम महत्वपूर्ण है. इस के पहले जल्दबाजी में खेल में भाग लेने से फिर चोट लगाने का खतरा रहता है.