कोल्हापुर-पन्हाला, 27 अप्रैल (आ. प्र.)
कोल्हापुर के पन्हाला में आचार्य देव अभयशेखरसूरीजी और आचार्य राजरक्षितसूरीजी आदि शताधिक साधुसाध्वि यों की पावन निश्रा में पांच मुमुक्षुओं ने संयम स्वीकार कर संयमजीवन का शुभारंभ किया. विशाल मंडप में हजारों लोगों की उपस्थिति में इन मुमुक्षुओं ने सिंह-गर्जना के साथ पूज्य गुरुदेव से भावपूर्ण प्रार्थना की- हे गुरुदेव! मेरे मस्तक के राग-द्वेष का मुण्डन कीजिए, मुझे दीक्षा प्रदान कीजिए और श्रमण वेश धारण करने का सौभाग्य दीजिए. इस अवसर पर पूज्य आचार्य अभयशेखरसूरीजी ने कहा कि, यह अत्यंत विशेष पुण्योदय का परिणाम है कि उन्हें ऐसा रजोहरण (ओघो) प्राप्त हो रहा है, जो अनंत भवों के पापों का नाश करने वाला और सिद्धिपद की प्राप्ति कराने वाला है. उन्होंने स्पष्ट किया कि यह रजोहरण वे स्वयं नहीं दे रहे, बल्कि करुणामूर्ति प्रभु महावीर स्वामी तथा उनकी परंपरा के महान आचार्य-गौतमस्वामी, सुधर्मास्वामी, जंबूस्वामी से लेकर आचार्य प्रेमसूरी, आचार्य भुवनभानुसूरी, आचार्य जयघोषसूरी, आचार्य धर्मजीतसूरी, आचार्य राजेन्द्रसूरी, आचार्य जयशेखरसूरी आदि महापुरुषों की दिव्य परंपरा द्वारा प्रदान हो रहा है. उन्होंने नवदीक्षितों को प्रेरणा दी कि वे रजोहरण के प्रति पूर्ण निष्ठा रखते हुए ऐसा उत्कृष्ट जीवन जिएं कि 7-8 भवों में आत्मा परमात्मा बन जाए. पंन्यास नयरक्षितविजयजी ने बताया कि इन पांच मुमुक्षुओं ने संसार के सभी भोग-सुखों का त्याग कर प्रभु वीर के मार्ग पर चलने का दृढ़ संकल्प लिया है. उन्होंने सिंह जैसी निर्भीकता से संयम स्वीकार किया है और उसी दृढ़ता से जीवनभर उसका पालन करेंगे, क्योंकि उन्हें श्रेष्ठ गुरु परंपरा का सान्निध्य प्राप्त हुआ है. जब ये पांचों दीक्षार्थी संसार के रंग-बिरंगे वस्त्रों का त्याग कर ेशेत श्रमण वेश में मंडप में पधारे, तो ‘नूतन दीक्षार्थी अमर रहो’ के जयघोष से पूरा वातावरण गुंजायमान हो उठा. आचार्य अभयशेखर सूरीजी के शिष्य-प्रशिष्य की संख्या 100 तक पहुंच गई है.
जैन शासन 21 हजार वर्षों तक अखंड रूप से चलेगा श्र्रमणीगणनायक पूज्य आचार्य अभयशेखर सरीजी, आचार्य राजरक्षित सूरीजी आदि मुनिवृंद नवदीक्षित मुनियों के साथ उनके गृहस्थ जीवन के घर पर पधारे. परिवार ने अत्यंत भावपूर्ण स्वागत किया. आचार्य राजरक्षितसूरीजी ने कहा कि, जैन धर्म में वैशाख शुक्ल एकादशी (शासन स्थापना दिवस) का विशेष महत्व है. इसी दिन भगवान महावीर स्वामी ने साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका रूपी चतुर्विध संघ की स्थापना की थी. प्रभु महावीर के महान पुण्य और शुद्धि के कारण यह जैन शासन 21 हजार वर्षों तक अखंड रूप से चलेगा. यदि यह स्थापना नहीं हुई होती, तो संवत्सरी, ज्ञान पंचमी, मौन एकादशी जैसे पर्व मनाने का अवसर भी नहीं मिलता. अहिंसा, करुणा, दया और कर्म जैसे महान सिद्धांतों का ज्ञान भी नहीं होता. भगवान महावीर ने साढ़े बारह वर्षों तक कठोर साधना की, अनेक उपसर्ग और परिषहों को सहा, कर्मों का क्षय करके कैवल्यज्ञान प्राप्त किया और मोक्ष का मार्ग बनाया. अब हमें केवल उस मार्ग पर चलना हैण इसके लिए जमानावाद और भोग-वाद का त्याग कर जैनाचार का दृढ़ पालन करना आवश्यक है.