एशिया महाद्वीप की दूसरी सबसे बड़ी बाजार के रूप में पहचानी जाने वाली पुणे कृषि उत्पन्न बाजार समिति के कामकाज पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हाे गए हैं. कृषि उपज की आवक, बिक्री लेन-देन और सेस वसूली पर समिति का शत-प्रतिशत नियंत्रण नहीं हाेने की बात स्वयं सचिव डाॅ. राजाराम धाेंडकर ने पत्रकार वार्ता में स्वीकार की, जिससे हड़कंप मच गया है.इस लापरवाही के कारण हर वर्ष कराेड़ाें रुपये के सेस की हानि हाेने की संभावना जताई जा रही है और इस गड़बड़ी में भ्रष्टाचार की आशंका भी व्यक्त की जा रही है.वित्तीय वर्ष समाप्त हाेने के बाद भी लगभग एक महीने तक आय के आंकड़े स्पष्ट नहीं हाेने से प्रशासन की कार्यक्षमता पर सवाल उठ रहे हैं.
गुड़-भूसा बाजारमें 632 भूखंड हाेने के बावजूद केवल 13 ताैल कर्मचारी कार्यरत हैं, जबकि फल-सब्जी और प्याज-आलू विभाग के 914 दुकानाें के लिए केवल 350 ताैल कर्मचारी उपलब्ध हैं. इनमें से भी प्रतिदिन लगभग 300 ही उपस्थित रहते हैं, जिसके कारण बड़ी संख्या में लेन-देन रिकाॅर्ड से बाहर रह जाते हैं.भूसा बाजार की स्थिति और भी गंभीर है.न्यायालयीन मामले के बाद वर्तमान में केवल 47 भूखंडाें की आवक का ही पंजीकरण किया जा रहा है. शेष लेनदेन पर किसी का नियंत्रण नहीं हाेने से सेस वसूली में बड़े अंतर की संभावना व्यक्त की जा रही है. व्यापारियाें से प्राप्त जानकारी के आधार पर ही सेस लगाया जा रहा है, जिससे अनियमितता बढ़ रही है.ताैल कर्मचारियाें की नियुक्ति में भी अनियमितता के आराेप लगाए जा रहे हैं.