सुप्रीम काेर्ट ने मंगलवार काे सबरीमाला मामले से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दाैरान बेहद अहम टिप्पणी की है. नाै जजाें की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी भी धार्मिक संस्थान के प्रबंधन के अधिकार का अर्थ अराजकता नहीं हाे सकता. काेर्ट ने कहा कि हर संस्थान के कामकाज के लिए एक निश्चित व्यवस्था और मापदंड हाेने चाहिए.मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार और प्रबंधन के बीच एक संतुलन जरूरी है. पीठ में जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह सहित अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश शामिल हसुनवाई के दाैरान जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा- प्रबंधन के अधिकार का यह मतलब कतई नहीं है कि वहां काेई ढांचा ही न हाे. हर चीज के लिए एक प्रक्रिया और नियम हाेने चाहिए.
जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा, चाहे दरगाह हाे या मंदिर, वहां संस्थान से जुड़े कुछ तत्व हाेते हैं. पूजा कातरीका और कार्याें का एक क्रम हाेता है. किसी काे ताे इसे विनियमित करना ही हाेगा. ऐसा नहीं हाे सकता कि हर काेई अपनी मनमर्जी करे. न ही यह संभव है कि बिना किसी नियंत्रण के द्वार हर समय खुले रहें. सवाल यह है कि प्रबंधन करने वाली संस्था काैन सी है? अदालत ने यह भी साफ किया कि धार्मिक नियम संविधान के दायरे से बाहर नहीं हाे सकते. जस्टिस अमानुल्लाह ने आगे कहा, नियम जरूरी हैं, लेकिन वे संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर सकते. व्यापक संविधानिक मापदंडाें पर किसी भी तरह का भेदभाव स्वीकार्य नहीं है. हर संस्थान के अपने मानक हाेने चाहिए और यह हर व्यक्ति द्वारा व्यक्तिगत रूप से निर्धारित नहीं किया जा सकता.