आज पीढ़ी ने पलायन की बस कहानियां ही पढ़ी थीं, जब तक कि काेराेना काल में बड़े पैमाने पर शहराें से भागते लाेगाें काे अपनी आंखाें से नहीं देख लिया. तब काैन साेच सकता था कि कुछ ही साल बाद वही नजारा फिर देखने काे मिलेगा? हां, पैमाना उतना बड़ा नहीं है.इन दिनाें फिर से पलायन हाेने लगा है. हालांकि, इस बार कारण काेई बीमारी नहीं, पेट की आग है. पिछले महीने ऐसा पहली बार हुआ कि देश के बड़े शहराें, औद्याेगिक व व्यापारिक केंद्राें और बड़े-बड़े निर्माण-स्थलाें पर बसे मजदूराें के लिए राेटी का इंतजाम मुश्किल हाे गया और वे घर की ओर रवाना हाे गए.इस संकट की जड़ ताे भारत से बहुत दूर है. अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया और जवाबी कार्रवाई में ईरान ने हाेर्मुज जलमार्ग बंद कर दिया.
भारत का 50 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल और गैस इसी रास्ते से आती है. इस आपूर्ति के रुकने का पहला और सबसे गंभीर असर रसाेई गैस पर दिखना शुरू हुआ है.लेकिन अब बात सिर्फ रसाेई गैस की नहीं रह गई है. यह हमारे शहरी असंगठित श्रम बाजार, विकराल अनाैपचारिक अर्थव्यवस्था सामाजिक सुरक्षा के दावाें, आपूर्ति श्रृंखला और ऊर्जा-निर्भरता की एक साथ विफलता का संकेत है.सरकार औपचारिक ताैर पर कह रही है कि गैस की आपूर्ति सामान्य है. मध्यमवर्गीय परिवाराें का अनुभव भी ऐसा है. किंतु द्निकत उन लाेगाें के लिए है, जिनके पास न पता है, न ठिकाना. जिनके पास गैस के कने्नशन भी नहीं हैं. इस व्नत देश का सबसे बड़ा संकट या पलायन इन्हीं लाेगाें की वजह से हाे रहा है.
दर्दनाक तस्वीरें गुजरात से आई हैं. पिछले दिनाें सूरत स्टेशन पर हजाराें प्रवासी मजदूराें की भीड़, लंबी-लंबी लाइनाें और बेतरह भरी हुई ट्रेनाें की खबरें आईं. अखबाराें में भी खबरें आई कि सूरत के टे्नसटाइल व पाॅवरलूम उद्याेगाें में काम करनेवाले मजदूर वापस लाैट रहे हैं, क्योंंकि खाने की सामग्री भी महंगी हाे गई है और गैस या ताे मिल नहीं रही या उसके भाव आसमान पर हैं. साउथ गुजरात चेंबर ऑफ काॅमर्स ने भी जिला प्रशासन से शिकायत की कि घरेलू गैस की कमी से प्रवासी मजदूर बहुत परेशान हैं. गुजरात के लिए यह समस्या बड़ी है, क्योंकि उसका विकास माॅडल पिछड़े इलाकाें से आने वाले सस्ते मजदूराें पर ही टिका हुआ है हालांकि, महाराष्ट्र के नासिक, पुणे, औरंगाबाद जैसे आर्थिक केंद्राें और तमिलनाडु के चेन्नई व काेयंबटूर जैसे शहराें से भी बहुत से मजदूर अपने-अपने गांव-शहराें की तरफ रवाना हुए हैं.
समझना जरुरी है कि यह द्निकत क्यों हाे रही है? केंद्र सरकार का दावा है कि मार्च की शुरुआत से अब तक 18 कराेड़ गैस सिलेंडर लाेगाें के घराें तक पहुंचाए गए हैं. ऑनलाइन बुकिंग 97 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है और गैस सिलेंडराें की कालाबाजारी राेकने के लिए डिलिवरी ऑथेंटिकेशन काेड जरुरी कर दिया गया है. घरेलू गैस उपभाे्नता गवाही देंगे कि यह उपाय काम कर रहे हैं.किंतु यही उपाय उस अनाैपचारिक गैस बाजार पर चाेट करते हैं, जिस पर शहराें में बसे गरीबाें की बड़ी आबादी निर्भर है. इनके पास अपने नाम पर कने्नशन नहीं है और न ही खाना पकाने के लिए बिजली के हीटर या इंड्नशन जैसा काेई विकल्प है. मतलब साफ है, औपचारिक और संगठित व्यवस्था काे बचाए रखने की कीमत असंगठित और अनाैपचारिक मजदूर तबके ने चुकाई है.
दिल्ली-एनसीआर और नाेएडा में इसी किस्से का एक अलग अध्याय लिखा जा चुका है. मार्च के अंत में ही रिपाेर्ट आने लगी थी कि नाेएडा और ग्रेटर नाेएडा के छाेटे कारखानाें से कई मजदूर गांव लाैटने लगे हैं. उन्हछाेटे सिलेंडर मिल नहीं रहे थे. या ब्लैक में कई गुना दाम पर मिल रहे थे. बाद में वही मजदूरी,महंगाई और काम की शर्ताें काे लेकर मजदूराें का गुस्सा सड़काें पर निकला. बात सिर्फ औद्याेगिक मजदूराें पर भी नहीं रूकती. नाेएडा घराें में काम करने वाली महिलाओं के जिस अंदाज में प्रदर्शन किए, वह साफ दिखाता है कि उनके लिए भी जिंदगी चलाना मुश्किल हाे रहा है. इसके साथ ही गरीबाें की यह समस्या शहरी मध्यवर्ग की समस्या में बदल जाती है. जिन परिवाराें में दाे या उससे ज्यादा सदस्य कमाने में लगे हैं और घर का काम पूरी तरह सहायकाें के भराेसे है, उनके लिए ताे यह बड़ा संकट है. अगर हाउस हेल्प गायब हाे जाएं, ताे जिंदगी की लय ही टूट जाती है. दूसरी तरफ, दिल्ली- मुंबई जैसे बड़े शहराें में ‘पेइंग गेस्ट’ बनकर रह रहे लाखाें नवयुवक और नवयुवतियां भी ऐसी ही मुसीबत में हैैं. उनके गैस सिलेंडर भी अ्नसर ब्लैक में ही आते हैं.
जाहिर है, आपूर्ति श्रृंखला का टूटना भले ही नीचे से शुरू हाे, लेकिन उसका असरऊपर तक जा रहा है.एक तरफ, तमाम कारखानाें के पास अब मजदूर नहीं हैं, दूसरी तरफ, शहरी मध्यवर्ग की लाइफलाइन यानी उनके घराें में काम करने वाले सहायक गायब हाे रहे हैं. एक तरफ से देखें, ताे यह एलपीजी की किल्लत नहीं, बल्कि शहरीकरण के भीतर छिपे अन्याय का पर्दाफाश है. शहराें में बसे भद्र लाेग और नीति-नियंता यह मानकर चलते हैं कि सस्ते गरीब मजदूर हमेशा उनकी सेवा के लिए उपलब्ध रहेंगे, भले ही उन्हें जानवराें जैसी जिंदगी बितानी पड़े.भारत के ऊर्जा संकट का दीर्घकालीन हल ्नया हाेगा, वह ताे एक अलग और बड़ा सवाल है. हालांकि, इसके दाे तात्कालिक उपाय हैं. एक, सरकार के यह हाथ में है कि उसे गैस की आपूर्ति बढ़ाने के काम के साथ-साथ छाेटे सिलेंडराें के वितरण की स्थायी और लचीली व्यवस्था बनानी चाहिए. यह जरूरी है उन लाेगाें काे सहारा देने के लिए, जिनके पास स्थायी पता नहीं है. कागजात नहीं हैं और शायद बड़े सिलेंडर काे खरीदने और भरवाने के पैसे भी नहीं हैं.
- आलाेक जाेशी, वरिष्ठ पत्रकार