सूरत शब्द याेग परमेश्वर से जुड़ने का सबसे ऊंचा मार्ग है

    03-Apr-2026
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विश्व-विख्यात आध्यात्मिक गुरु और सावन कृपाल रूहानी मिशन के प्रमुख संत राजिन्दर सिंह जी महाराज के सत्संग काे सुनने के लिए 1 अप्रैल, 2026 काे अहिल्यानगर में गंगा उद्यान के पास, सावेदी, मिसकीन नगर में हजाराें की संख्या में लाेग शामिल हुए. इससे पूर्व संत राजिन्दर सिंह जी महाराज 2017 में अहिल्यानगर आए थे.इस आध्यात्मिक कार्यक्रम की शुरुआत में आदरणीया माता रीटा जी ने संत दादू साहब द्वारा लिखित एक भजन का अपने मधुर कंठ से गायन किया.भजन की व्याख्या करते हुए, संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने कहा कि, इस दुनिया में रहते हुए हम सब ज्यादातर सुनी-सुनाई बाताें पर यकीन करते हैं लेकिन एक पूर्ण गुरु सुनी हुई नहीं बल्कि देखकर बयान करते हैं. यहां दादू साहब भी इस शब्द के जरिए हमें यह समझा रहे हैं कि इस संसार में हर काेई सुनी-सुनाई बात कहता है लेकिनजाे मैंने देखा है, मैं यहां वही कह रहा हूं. आगे इस भजन में संत दादू साहब कह रहे हैं कि जब मैंने अपनी इच्छाओं काे काबू किया, तब जाे मेरा मन था, वाे पिता-परमेश्वर की ओर लग गया और फिर मुझे अनहद नाद और बादलाें की गरज आदि अंतर का संगीत अपनेअंदर सुनाई दिया. जिसे अलग-अलग महापुरुषाें ने शब्द, कलमा, वर्ड और बांगे-आसमानी कहकर बयान किया है .
 
संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने आगे समझाया कि जाे सुरत-शब्द याेग का मार्ग है, यह सबसे ऊंचा मार्ग है. इसमें काेई कठिन साधन या याेग मुद्रा की काेई जरूरत नहीं है. एक बार अगर काेई भी व्यक्ति इस अभ्यास काे करता है ताे वह अपने अंतर में पिता-परमेश्वर का अनुभव कर लेता है और उसका काम पूरा हाे जाता है यानी कि जाे मनुष्य जीवन का जाे मकसद है, वाे पूरा हाे जाता है. इस भजन के आखिर में दादू साहब फरमा रहे हैं कि अपने गुरु की दया मेहर से ही मैं अंतर के गगन मंडल में चढ़ाई कर पाया और फिर मैंने अपना तन-मन उन पर न्याैछावर कर दिया. उसके बाद मेरी आत्मा सदासदा के लिए पिता-परमेश्वर में लीन हाे गई. सत्संग के पश्चात संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने नए भाई-बहनाें काे आध्यात्मिक दीक्षा देकर प्रभु की ज्याेति और श्रुति का अनुभव कराया.परम पूजनीय संत राजिन्दर सिंह जी महाराज एक लाभ न कमाने वाली संस्था सावन कृपाल रूहानी मिशन के अध्यक्ष हैं. वे पिछले 35 वर्षाें से जीवन के सभी क्षेत्राें के लाखाें लाेगाें काे ध्यान-अभ्यास की विधि सिखाकर उन्हें अपने अंदर ही प्रभु की ज्याेति और श्रुति का अनुभव करा रहे हैं.