पिछले दिनाें अपने इसी अखबार के प्रथम पृष्ठ पर एक दिलचस्प खबर पढ़ी. इसमें बताया गया कि पंजाब के बठिंडा जिले के बल्लाे गांव की पंचायत ने बेस्ट सास अवाॅर्ड शुरू किया है. इसकी पहल गांव की सरपंच अमरजीत काैर ने की.इसे प्रति वर्ष 8 मार्च काे यानी अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर दिया जाएगा. छह महिलाओं काे पुरस्कृत भी किया गया. यह पुरस्कार किन महिलाओं काे दिया जाए, इसके लिए पूरे गांव से रिपाेर्ट ली जाएगी. बहुओं और पड़ाेसियाें की राय पर भी ध्यान दिया जाएगा. सरपंच अमरजीत काैर ने यह भी कहा कि इससे पारिवारिक संबंध मजबूत हाेंगे. समझदार सास घर की नींव हाेती है, जाे अपनी बहू काे अपनाकर घर काे स्वर्ग बना देती है. इस अवसर पर सबसे अधिक पुस्तकें पढ़ने वाली महिलाओं काे भी सम्मानित किया गया.
अपने समाज में लड़की काे बचपन से ही सिखाया जाता है कि उसे पराए घर जाना है. पराए घर जाकर सास से निपटना है. सास की तस्वीर बहुत डरावने ढंग से पेश की जाती थी.बचपन की एक घटना अक्सर याद आती है. छठी कक्षा में पढ़ती थी. लड़कियाें का स्कूल था. वहां एक बहुत वृद्ध महिला गणित पढ़ातीं. सफेद साड़ी ही पहनतीं. उनके बाल भी एकदम सन से सफेद थे. एक दिन गणित पढ़ाते-पढ़ाते, वे हम सब लड़कियाें से कहने लगीं कि सिर्फ गणित पढ़ने से ही, सब कुछ नहीं हाेगा. जब ससुराल जाओगी ताे वहां कैसे जीना है, यह सीखना पड़ेगा. एक लड़की ने पूछा कि बहन जी क्या सीखना हाेगा. तब वह हंसते हुए बाेलीं कि सास के लिए इम्तिहान में पास हाेना. कैसा इम्तिहान, ताे उन्हाेंने बताया कि हर सास का इम्तिहान लेने का तरीका अलग-अलग हाेता है.
जैसे कि मेरी शादी जब हुई ताे मैं बारह साल की थी. शादी के अगले दिन ही सास ने गेहूं और बाजरा मिलाकर सामने रख दिया कि इसे अलग-अलग कराे. शाम तक काम पूरा करना है. घर के और काम भी थे. शाम क्या, पूरी रात हाे गई, फिर भी नहीं कर पाई. इसी तरह एक दिन नमक और चीनी मिलाकर रख दी. नमक में से चीनी बीननी थी. शर्त यह भी थी कि चीनी से एक भी नमक का दाना चिपका नहीं रहना चाहिए.उनकी बातें सुनकर घबराहट-सी हाेने लगी. घर जाकर मां काे सारी बात बताई. यह भी पूछा कि क्या अम्मा (दादी) भी तुम्हारे साथ ऐसा करती थीं. मां ने हंसकर कहा, तेरी अम्मा बड़ी कठाेर स्वभाव की थीं. बहुओं काे पर्दे में रखती थीं, उनकी हर बात काे मानना भी पड़ता था, मगर ऐसा कभी नहीं किया.
ये ताे टाइम खराब करना हुआ कि बाजरे में गेहूं मिला दाे और चीनी में नमक. इससे ताे गेहूं साफ ही करा लिए जाते, जिससे कि काम बचता. और नमक से चीनी चाहे जितनी अलग कर ली हाे, नमकीन हाे गई हाेगी. मां ने चाहे जितना समझाया, लेकिन सास की तस्वीर ऐसी बनी रही. बड़ी हाेकर जब भी साथ की किसी लड़की की शादी हाेती और वह कहती कि उसकी सास बहुत अच्छी हैं, ताे लगता कि झूठ बाेल रही है. क्याेंकि मान लिया था कि सास खराब ही हाेती हैं, जाे अक्सर दिखता भी था.पुराने जमाने की हिंदी फिल्माें में भी ललिता पंवार मार्का सासें दिखाई देती थीं. जिनका पहला और आखिरी काम यही हाेता था कि वे बहू काे कैसे सताएं. इसके लिए वे अपने बेटाें काे बहू काे पीटने और शारीरिक हिंसा करने के लिए भी उकसाती थीं. जब बहू पिटती थी, दर्शक तालियां बजाते थे.
ये वे बहुएं हाेती थीं, जिन्हें घुट्टी में पिलाया जाता था कि जिस घर में डाेली गई, वहां से अर्थी ही उठे. यह अभागी महिलाएं करतीं भी क्या, क्याेंकि शादी के बाद इन्हें अपने परिवार वाले भी ससुराल के भराेसे छाेड़ देते थे. तलाक लेना बहुत बदनामी का कारण बनता था. ये बहुएं न शिक्षित थीं और न ही आत्मनिर्भर. आखिर जाती भी कहां. इसलिए सास और ससुराल काे सहने और समझाैता करने के अलावा और काेई रास्ता भी नहीं था.और ताे और बहुत से परिवाराें में गैस हाेते हुए भी अक्सर स्टाेव बहुओं पर फट जाते थे. स्टाेवाें काे भी मालूम था कि उन्हें बस बहुओं पर ही फटना है. अक्सर दहेज हत्याएं ऐसे ही की जाती थीं. इस संदर्भ में महान लेखिका महादेवी वर्मा का संस्मरण भाभी इतना मार्मिक है कि पढ़ते हुए आंसू बहने लगते हैं.
यहां बहू काे सताने के लिए सास नहीं, ननद है, वह भी विवाहित. जाे जब आती है, तब अपनी विधवा भाभी काे बुरी तरह से पीटती है, उसे जगह-जगह जलाती है. और उन्नीस साल की विधवा स्त्री, यह सब झेलने काे मजबूर है.इन सासाें की मानसिकता पर ध्यान दें, ताे ये अपनी सास के अत्याचार का बदला, बहुओं से लेती थीं. जाे इन्हाेंने सहा, बहू भला उससे कैसे बचे और क्याें बचे. जबकि कायदे से हाेना यह चाहिए था कि जाे अपमान, अत्याचार, जिल्लत, इन्हाेंने सही, वह बहू काे न सहनी पड़े और एक तरह से अत्याचार का सिलसिला थमे. संयुक्त परिवाराें की ये ऐसी आफतें थीं, जिनका शिकार बहुएं हाेती थीं. दहेज का तड़का इन अत्याचाराें काे बेतहाशा बढ़ाता था.इन दिनाें भी बहुत-सी रील्स और वीडियाे ऐसे दिखते हैं, जहां हर बात पर सास बहू काे सताते दिखाई देती है, लेकिन अंत तक आते-आते सास का हृदय परिवर्तन हाे जाता है.
आज व्नत बदला हुआ है. लड़कियां पढ़-लिख गई हैं. अपने पांवाें पर खड़ी हैं. गांव-गांव लड़कियाें की आत्मनिर्भरता काे परिवार और समाज ने स्वीकार कर लिया है. उनकी शिक्षा चलती रहे, इसके लिए उन्हें तरह-तरह की सरकारी सहायता मिलती है. उनकी रक्षा के लिए बहुत से कानून भी हैं. और ताे और संसद में वुमेन रिजर्वेशन बिल पास हाे गया है. अब लड़कियां वह नहीं रहीं, जैसी ससुराल वाले उन्हें देखना चाहते हैं.यदि वैवाहिक विज्ञापनाें पर नजर डालें, ताे अब भी फेयर एंड लवली, हाेमली कन्या चाहिए. पता नहीं इस हाेमली की क्या परिभाषा है. रील्स और वीडियाे की मानूं ताे ये कि बहू खूब पैसे भी कमाए, लेकिन अपनी तनख्वाह पति या सास के हाथाें में दे. कपड़े ऐसे पहने, जाे सास काे पसंद हाें्.सवेरे जल्दी उठकर घर का काम निपटाकर जाए और आकर काम निपटाए. - क्षमा शमा