सेना काे कार्याें के आधार पर अलग-अलग विभागाें में बाटा गया है. जिनकी भूमिकाएं अलग-अलग हाेती हैं. ठीक इसी तरह हमारे आधुनिक समाज में बुजुर्ग लाेग अगली पीढ़ी के लिए सहायक व्यव्यथा के रूप में हाेते हैं. पीढ़ी दर पीढ़ी माता-पिता हमेशा से बच्चाें के लिए एक सहारा रहे हैं. 30- 60 और 70 के दशकाें में यह सहारा ज्यादातर सलाह देने और भावनात्मक संबल प्रदान करने के रूप से हाेता था. जब भी बच्चे किसी भी तरह की मुश्किल में पड़ते थे, ताे ये वे अपने माता-पिता से सलाह लेते थे. माता-पिता के पास दुनियादारी की समझ हाेती थी और वे पारिवारिक झगड़ाें,आपसी मतभेदाें या यहां तक कि पाेते-पाेतियां से जुड़ेविवादाें काे भी बेहतरीन ढंग से सुलझा लेते थे. इसे सलाह-मशविरा कहा जाता था.तब की युवा पीढी जिनके माता-पिता तब तक उनके साथ रहे. जब तक वे खुद-बुजुर्ग नहीं हाे गए. यानी 50-70 साल की उम्र तक खुद काे बहुत खुशकिस्मत मानती थी कि बेहद अहम और नाजुक मामलाें पर सलाह-मशविराें के लिए उनके माता -पिता माैजूद थे.
अ्नसर खाने काे मेज पर चर्चा हाेती थी. जाे एक बड़ा भावनात्मक सहारा हाेता था. आज भी कई लाेग माता-पिता की उस सलाह काे याद करते हैं.आपने अ्नसर किसी न किसी से ना सुना हाेगा-मेरी मां कहती थी. नैतिक कम्पास के जरिये माता- पिता द्वारा हमें हमेशा दिशा दिखाई जाती थी. जिसे बेहतरीन परवरिश और पारिवारिक मूल्य कहा जाता था. माताएं एक विशाल ज्ञानकाेश थे. भले ही वे बहुत अधिक पीढ़ी लिखी नहीं थी.फिर भी बच्चे मां से बुनियादी संस्कार सीखने काे हमेशा तत्पर रहते थे. रुडयार्ड किपलिंग ने कहा है-ईश्वर हर जगह माैजूद नहीं हाे सकते. शायद इसीलिए उन्हाेंने मां काे बनाया.पिता की भूमिका भी बहुत ही सकारात्मक हाेती है.अमिताभ बच्चन कई बार अपने पिता काे सलाह का जिक्र करते हुए कहते हैं. बाबूजी ने यह कहा था. मुझे याद है.अमिताभ बच्चन ने कहा था. बाबूजी कहते थे जाे मन का, वाे अच्छा जाे मन का नहीं. वह और भी अच्छा. इसका बहुत गहरा मतलब था. इसका मतलब है कि जब आप कुछ चाहते हैं और वह आपकाे मिल जाता है. ताे यह अच्छा है.
पर यदि उसकी जगह आपकाे कुछ और मिल जाए, ताे वह और भी बेहतर हाेता है. यह बिल्कुल सच है. मैंने अपनी जिंदगी में भी यह देखा है कि जब एक रास्ता बंद हाे जाता है. ताे भगवान आपकाे कुछ ऐसा देते हैं, जाे उससे भी बेहतर हाेता है.अनुपम खेर भी अपने दिवंगत पिता के बारे में बहुत ही स्नेह और आदर से बात करते हैं. फिल्मी अभिनेता अक्षय कुमार काे अपनी मां से हिम्मत मिली. वह अपनी सफलता का श्रेय अपनी मां काे ही देते हैं? व्यापक अर्थ में ये संस्कार ही हैं.ये मूल्य माता-पिता द्वारा ही सिखाए जा सकते हैं.काेई पूछ सकता है कि परिवार में जब सबकाे माता-पिता से एक ही संस्कार मिलता है कि ताे एक ही परिवार के चार लड़के अलग-अलग व्य्नितत्व वाले इंसान क्यों बन जाते हैं? काेई डाॅ्नटर, काेई पुलिस अधिकारी काेई सफल वकील ताे काेई गुंडा बन जाता है.
इसका सरल जवाब है सबसे महत्वपूर्ण है, माता-पिता द्वारा दिए गए संस्काराें काे ग्रहण करना यहां भी बुद्धि काम करती है. क्योंकि काेई भी सृष्टि काे श्नित काे नहीं समझ सकता. हाथ की पांचाें उंगलियां बराबर नहीं हाेती. हर युवा काे लगता है कि वह समझदार है. इसका सबसे उच्छा उदाहरण आप देखते हैं कि 23 साल का व्य्नित 22 साल के व्य्नित काे सलाह दे रहा है. युवा पीढ़ी जिस आमताैर पर ‘जेन जेड या जेन-जी’ कहा जाता है.खुद काे सब कुछ जानने वाली पीढ़ी मानती है. कम से कम उन्हें ताे ऐसा ही लगता है. जैसे सेना में कई सेवाएं हाेती हैं.जिनके लिए प्र्रदाता हाेते हैं. ठीक वैसे ही आज के माता-पिता भी अब केवल सलाहकार नहीं रह गए हैं. बल्कि वे भी सेवा प्रदाता बन गए हैैं. आधुनिक युग में चीजें तेजी से बदली है.बच्चे अब सलाह लेना नहीं चाहते क्योंकि यह उन्हें बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है. वे कहते हैं.मुझे यह मत बताओ कि ्नया सही है और ्नया गलत: बस मेरी इच्छा पूरी कर दाे.
एक बार मैं एक छात्र की विधवा मां से बात कर रहा था. जाे हमारे इंस्टीट्यूट में एमबीए में दाखिला ले रहा था.वह अपने बच्चे काे सेट करने के लिए देहरादून से दाे ट्रेनें बदलकर आई थीं. मैंने उनसे पूछा आप यहां क्यों आई हैं? उन्हाेंने जवाब दिया-बच्चे काे सेट करना है. उसका कमरा ठीक करना है. बिस्तर लगाना है. वह लड़का मेरे सामने ही खड़ा था. जाे मुझसे भी ज्यादा लंबा था. लगभग छह फीट से भी उंचा. लेकिन यह सब सुनकर बिल्कुल भी उसे शर्म महसूस नहीं हाे रही थी.शादी हाे जाने के बाद बच्चाें काे देखभाल करने के लिए भी माता -पिता ही माैजूद हाेते हैं.उनसे यह भी उम्मीद की जाती है कि वे घर का खाना भी बनाएंगे. यहां तक कि एयर कंडीशनर और काराें की सर्विसिंग तथा मरम्मत का काम भी माता- पिता काे ही साैंप दिया जाता है. जाे भारतीय माता- पिता विदेश जाते हैं.
वे अपने बेटे-बेटियाें के लिए बर्तन झाडू पाेछा ये सारे काम खुद करते हैं.आजकल ताे जरा सी बात पर ही तलाक हाे जाते हैं.इसमें किसी के दखल की जरूरत नहीं समझी जाती. इस मामले में वे पूरी तरह आजाद हैं और अपने फैसले खुद लेते हैं. किसी ‘मशविरे’ की काेई गुंजाइश नहीं है और सलाह देने की बात ताे बिल्कुल ही भूल जाइए. वे अलग हाेने का फैसला करते हैं और वह सब पलकें झपकते ही हाे जाता है.भले ही उनके बच्चे जाए भाड़ में. तलाक के बाद दी जाने वाली रकम के मामले में कभी-कभी माता-पिता फंस जाते हैं. आखिर, आपकी बचत कब कम आएगी? एक स्टार्टअप शुगर करने के लिए आप माता-पिता की खुशियाें काे दांव पर लगा देते हैं. पैसे उधार लेते हैं. और फिर सब बर्बाद कर देते हैं. आपकाे इस बात की काेई परवाह नहीं हाेती कि कहीं उन्हें हार्टअटैक ही ही न आ जाए. यह हर घर घर की कहानी है. हर दूसरे घर में ऐसा हाेता है. - वीरेंदर कपूर