धर्म की जबर्दस्ती बच्चाें काे अधार्मिक बनाती हैं

    01-May-2026
Total Views |
 
 
 
Osho
 
 
बहुत बच्चे धर्म से इसीलिए अनुत्सुक हाे जाते हैं. जब उनकी तैयारी नहीं हाेती सुनने की, तब माँ-बाप उनकाे गीता पढ़ा रहे हैं. मन्दिर ले जा रहे हैं! मसजिद ले जा रहे हैं! वे घसीटे जा रहे हैं. उनकाे फिल्म में जाना है, प्निचर देखना है. बाजार में मदारी आया है, ये कहाँ के कृष्ण- गीता काे लगाए हुए हैं! मैं एक संस्कृत महाविद्यालय में कुछ दिन तक अध्यापक था. संस्कृत विद्यालय था-महाविद्यालय था, ताे पुराने ढंग से चलने का हिसाब था. ताे सभी विद्यार्थियाें काे सुबह चार बजे उठना पड़ता, स्नान करना पड़ता. पाँच बजे प्रार्थना में इकट्ठे हाेना पड़ता.मैं नया पहुँचा था; मेरे पास काेई और रहने का मकान न था, ताे पहली ही रात मैं विद्यालय के छात्रावास में ही ठहरा. विद्यार्थियाें काे भी पता नहीं था कि मैं अध्यापक हूँ; नया नया था. और मैं भी सुबह चार बजे उठकर स्नान करता था, ताे मैं भी कुएँ पर स्नान करने गया.
 
वहाँ विद्यार्थी स्नान कर रहे हैं. मैंने साेचा था कि विद्यालय है, लाेग स्नान करते हुए संस्कृत के श्लाेकाें का पठन कर रहे हाेंगे; वेद की ऋचाएँ दाेहराते हाेंगे. वहाँ वे भगवान् तक काे माँ-बहन की गालियाँ दे रहे हैं! मैं थाेड़ा हैरान हुआ, क्योंकि ठण्डा पानी है, सर्दी के दिन, चार बजे रात से उठना; काैन नहीं भगवान् काे गाली देगा. वे परमात्मा से लेकर प्रिंसिपल काे बड़े भद्दे ढंग से गाली दे रहे थे और उन्हें पता नहीं था कि मैं अध्यापक हूँ; नया-नया था. ताे उन्हाेंने मेरी काेई फिक्र नहीं की. वे देते रहे. मैंने भी सुनी उनकी गालियाँ. मैंने प्रिंसिपल काे जाकर कहा कि ‘यह आप गलत कर रहे हैं. इनके जीवन से सदा के लिए प्रार्थना का रस नष्ट हाे जाएगा. इनके प्रार्थना के साथ गलत सम्बन्ध जाेड़ा जा रहा है. विकृत स्थिति बनी जा रही है.’ प्रिंसिपल बाेले,‘ नहीं; वे सब अपनी मर्जी से कर रहे हैं.’ जैसा कि सभी अधिकारियाें काे खयाल है.
 
मैंने उनकाे कहा,‘ ताे फिर आप ऐसा करें, अगर वे अपनी मर्जी से करते हैं, ताे मैं एक तख्ती लगा देता हूँ कि कल चार बजे वही उठें, जिनकाे उठना हाे. और आपकाे भी उठना पड़ेगा, ताकि हम दाेनाें माैजूद हाे सकें-साक्षी-कि काैन आया, काैन नहीं आया.’ अब तक ताे वे खुद ताे उठते नहीं थे. मैंने कहा, ‘तुम खुद ही साेचाे. तुम खुद भी नहीं उठते चार बजे. तुम भी उठकर अगर स्नान कराे, ताे भी थाेड़ा उनका गाली देने का मन कम हाे जाय, कम से कम प्रिंसिपल काे ताे गाली न दें; परमात्मा काे दें, ताे काेई हरजा नहीं. तुम खुद भी नहीं उठते!’ उनकी मजबूरी है, क्योंकि वे सभी विद्यार्थी स्काॅलरशिप पर थे. सरकार स्काॅलरशिप दे, ताे ही लाेग संस्कृत पढ़ते हैं! नहीं ताे काेई काहे के लिए पढ़ेगा! वे सब स्काॅलरशिप पर थे, इसलिए सबकाे मजबूरी थी, न जाएँ ताे उनकी स्काॅलरशिप कटती थी. ताे दूसरे दिन मैंने तख्ती लगा दी कि ‘अब जिसकाे मरजी हाे, वही प्रार्थना करें.
 
जिसकाे मर्जी हाे वही चार बजे उठ.’ दूसरे दिन मेरे और प्रिंसिपल के सिवाय वहाँ काेई भी नहीं आया. कुआँ खाली था. तब कम से कम कुएँ पर ज्यादा प्रार्थनापूर्ण स्थिति है. कम से कम कुआँ ताे प्रार्थना कर रहा है. काेई गाली ताे नहीं बक रहा है! सन्नाटा ताे है.आकाश के तारे हैं. सुबह अच्छी है. जिसकाे नहाना है, वह आयेगा.’ काेई नहीं आया. जिन बच्चाें काे तुम जबर्दस्ती मंदिर ले गए हाे, उनकाे तुमने सदा के लिए मंदिर के विराेध में कर दिया है. जाे सुनने काे राजी नहीं था, उसकाे तुमने सुनाने की काेशिश की है.तुमने उसके कान पर ही अत्याचार नहीं किया, तुमने हृदय के द्वार भी बंद कर दिए हैं. इसलिए कृष्ण कहते हैं,‘ उससे मत कहना, जाे सुनने काे राजी न हाे;’ जब हजार बार पूछे तब कहना.बुद्ध का ताे नियम था, जब तक काेई आकर तीन बार न पूछे, तब तक वे उत्तर ही न देते थे. वे कहते हैं, ‘ जाे कम से कम तीन बार पूछने काे राजी न हाे, उससे कहना ही नहीं.’