अमेरिकी राष्ट्रपति डाेनाल्ड ट्रंप की तरह भारत के दाे नेताराहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल हाल के वर्षाें में चुनाव आयाेग, संसद और अदालत जैसी संवैधानिक संस्थाओं के निर्णयाें काे चुनाैती देते हुए उनकी विश्वसनीयता पर गंभीर संकट खड़े कर रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र माेदी, उनकी सरकार और पार्टी के विरुद्ध अभियान चलाते हुए ये अब सीबीआई और ईडी के साथ वरिष्ठ न्यायाधीशाें पर भी पूर्वाग्रह, पक्षपात के आराेप लगा रहे हैं. यानी ये जनता और दुनिया काे बताना चाहते हैं कि न्यायपालिका पर भी भराेसा न किया जाये. यह लाेकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है. यही कारण है कि दिल्ली हाई काेर्ट और सुप्रीम काेर्ट के न्यायाधीशाें ने केजरीवाल सहित प्रतिपक्ष के नेताओं काे गंभीर चेतावनी दी है.
केजरीवाल ने शराब नीति घाेटाले में निचली अदालत के फैसले काे चुनाैती देने वाली याचिका पर दिल्ली हाई काेर्ट में खुद पेश हाेकर न्यायाधीश के विरुद्ध दलीलें पेश करते हुए खूब प्रचार लूटा.यदि इस मामले में उनकी ओर से काेई सामान्य वकील पेश हुआ हाेता, ताे उसकी बाताें का प्रचार नहीं हाे सकता था.अरविंद केजरीवाल ने न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा के समक्ष शराब नीति मामले की सुनवाई से खुद काे अलग करने के लिए अपनी दलील पेश की और सीबीआई की याचिका की सुनवाई कर रही न्यायाधीश के खिलाफ कई आपत्तियां रखीं. बाद में एक अतिर्नित हलफनामा दायर कर अपने नये आवेदन में केजरीवाल ने न्यायमूर्ति से जुड़े हिताें के टकराव की आशंका जतायी.
उन्हाेंने आराेप लगाये कि न्यायाधीश के बेटे और बेटी काे केंद्र सरकार के कानूनी सलाहकार के रूप में नियु्नत किया गया है, जाे सीबीआई के माध्यम से इस मामले में पक्षकार हैं. उनका तर्क इस कानूनी सिद्धांत पर आधारित था कि पूर्वाग्रह की उचित आशंका भी न्यायाधीश काे हटाने की मांग के लिए पर्याप्त है. उनका कहना था कि न्याय न केवल हाेना चाहिए, बल्कि दिखना भी चाहिए.सामान्य नियम-परंपरा के अनुसार कई मामलाें में जज स्वयं किसी प्रकरण या व्य्नित से काेई पुराना संबंध हाेने पर अलग हट जाते रहे हैं. फिर प्रभावशाली केजरीवाल की तरह काेई सामान्य व्य्नित अदालत में तारीखें या फैसला टलवाने कलिए जज की जाति, धर्म या काेई अन्य कारण बताकर जज काे बदलने की मांग करने लगे, तब अदालत क्या सुनेगी? सच ताे यह है कि फैसले के बाद भी ऐसा आराेप लगाने पर अदालत की अवमानना के आधार पर सजा तक हाे सकती है.
केजरीवाल ने अपनी याचिका की सुनवाई के दाैरान न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा के एबीएपी (अखिल भारतीय अधिव्नता परिषद) के साथ उनके वैचारिक जुड़ाव की संभावना की ओर इशारा किया था, जाे वकीलाें का एक संगठन है और जिसे आरएसएस से संबद्ध माना जाता है. केजरीवाल ने न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा से अपने मामले से हटने की मांग करते हुए पक्षपात की आशंका जतायी.सीबीआई ने केजरीवाल के मामले से खुद काे अलग करने के अनुराेध का विराेध करते हुए तर्क दिया कि इस तरह ताे कई न्यायाधीश सरकारी मामलाें की सुनवाई के लिए अयाेग्य हाेने लगेंगे. एजेंसी के वकील ने दिल्ली हाई काेर्ट काे बताया कि ऐसे दावे कानूनी रूप से निराधार हैं और संपूर्ण न्यायिक व्यवस्था काे बाधित कर सकते हैं. अच्छा यह हुआ कि न्यायाधीश स्वर्णकांता शर्मा ने केस से हटने वाली केजरीवाल की याचिका खारिज करते हुए सख्त संदेश दिया.
उन्हाेंने स्पष्ट किया कि व्य्नितगत आराेपाें या साेशल मीडिया दबाव के कारण जज का हटना न्यायिक स्वतंत्रता के लिए घातक है. अदालत ने केजरीवाल की दलीलाें काे निराधार बताते हुए कहा कि जजाें की क्षमता पक्षकार नहीं, बल्कि उच्च अदालतें तय करती हैं और न्याय प्रक्रिया केवल मेरिट पर चलती है. निश्चित रूप से देश की अदालताें में नियु्नत हाेने वाले हर जज की छात्र जीवन से लेकर पारिवारिक पृष्ठभूमि रहती है. उनके माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी, मित्र किसी-न-किसी कार्य, संस्था, व्यवसाय, राजनीतिक संगठन से जुड़े हाे सकते हैं. उच्च न्यायालयाें के जज ताे एक लंबे कानूनी अनुभव के बाद नियु्नत हाेते हैं. उस दाैरान वे किसी संस्था के सार्वजनिक कार्यक्रम में भी जा सकते हैं. यूं पिछले 50-60 साल में कई वरिष्ठ जज न केवल राजनीतिक पार्टी से आये, बल्कि पार्षद, विधायक अथवा सांसद रहे, या कई वर्ष तक जज रहने के बाद सांसद बन गये.
ताे क्या उन सबके कामकाज और फैसलाें पर राजनीतिक पूर्वाग्रह के आराेप लगाये जा सकते थे या लगाये जा सकते हैं? भारतीय लाेकतंत्र में न्यायपालिका काे संविधान का संरक्षक माना जाता है. हालांकि समय-समय पर यह प्रश्न उठता रहा है कि क्या न्यायपालिका वास्तव में पूरी तरह राजनीति से मु्नत रही है? पिछले करीब साढ़े सात दशकाें में कई ऐसे उदाहरण सामने आये हैं, जहां न्यायाधीशाें का राजनीति से प्रत्यक्ष या पराेक्ष संबंध देखा गया. न्यायपालिका ने कई बार अपनी स्वतंत्रता सिद्ध की है, परंतु राजनीति से उसके संबंधाें ने बार- बार प्रश्न भी खड़े किये हैं. आपातकाल में न्यायपालिका पर राजनीतिक प्रभाव दिखाई पड़ा था. तब वरिष्ठता काे दरकिनार कर जस्टिस एएन रे काे प्रधान न्यायाधीश बनाया गया था.जस्टिस बहरुल इस्लाम पहले कांग्रेस के सांसद रहे, फिर न्यायाधीश और फिर पुनः राजनीति में आ गये. वह भारतीय न्यायिक इतिहास का अनाेखा और विवादास्पद उदाहरण था.
जस्टिस विजेंद्र जैन मेरे भी मित्र थे. - आलाेक मेहता