करदाताओं को अपने आयकर रिटर्न में अपने निवेश और वित्तीय स्थिति का विवरण देना जरूरी है. निवेश की जानकारी में शेयर, म्यूचुअल फंड, फिक्स्ड डिपॉजिट आदि में निवेश शामिल है; 31 मार्च तक बैंक बैलेंस, हाथ में नकद, विविध देनदार और लेनदार भी शामिल हैं.
आयकर अधिनियम के तहत अनुमानित कराधान और नई जानकारी देने की जशरतें अनुमानित कराधान भारत की कर प्रणाली का एक मुख्य आधार रहा है, जिसे छोटे करदाताओं के लिए नियमों का पालन करना आसान बनाने के लिए डिजाइन किया गया है. आयकर अधिनियम, 2025 के लागू होने के साथ, इस योजना को फिर से बनाया गया है. इसे आधुनिक किया गया है. जहां नियमों के पालन का बोझ कम करने का मूल उद्देश्य अभी भी बना हुआ है, वहीं नया ढांचा जानकारी देने के बेहतर नियम और ढांचागत एकीकरण पेशकरता है. यह लेख नए अधिनियम के तहत अनुमानित कराधान के विकास, प्रावधानों और प्रभावों की जांच करता है. आयकर अधिनियम, 2025 के तहत, अनुमानित कराधान के प्रावधानों को एक ही धारा (धारा 58) में मिला दिया गया है. मूल्यांकन वर्ष 2026-27 के लिए अपडेट किए गए आयकर रिटर्न (ITR) फॉर्म और आयकर अधिनियम, 2025 के तहत व्यापक बदलाव के साथ, सरकार ने जानकारी देने की बढ़ी हुई जशरतें पेश की हैं, खास कर निवेश और वित्तीय संपत्तियों से संबंधित. पहली बार, अनुमानित कराधान चुनने वाले करदाताओं को अपने आयकर रिटर्न में अपने निवेश और वित्तीय स्थिति का विवरण देना जशरी है. निवेश की जानकारी में शेयर, म्यूचुअल फंड, फिक्स्ड डिपॉजिट आदि में निवेशशामिल है; 31 मार्च तक बैंक बैलेंस, हाथ में नकद, विविध देनदार और लेनदार भी शामिल हैं. इसके अलावा, वित्तीय वर्ष के अंत तक के वित्तीय डेटा को दर्ज करने के लिए खास रिपोर्टिंग फील्ड पेश किए गए हैं, जिससे करदाता की वित्तीय स्थिति की एक झलक मिल सके.सरकार ने देखा कि कुछ करदाता कम अनुमानित आय घोषित कर रहे थे, जबकि उनके पास अनुपातहीन रूप से अयादा संपत्तियां थीं. सरकार ने अनुमानित कराधान योजना के दुरुपयोगको रोकने के लिए ये जानकारी देने के नियम पेश किए. अधिकारियों ने ऐसे मामले देखे जहां करदाताओं ने कम अनुमानित आय घोषित की, लेकिन उनके पास काफी संपत्तियां या निवेश थे. नई जशरत घोषित आय और वास्तविक वित्तीय क्षमता के बीच क्रॉसवेि रफिकेशन (आपसी जांच) को संभव बनाती है. इस प्रकार, इस सुधार का उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना और कर आधार का विस्तार करना है. जानकारी देने के नियमों की शुरुआत से अधिकारियों को आयकर रिटर्न में जमा किए गए वित्तीय डेटा को घोषित आय के साथ क्रॉस-वेरिफाई करने की अनुमति मिलती है. हालांकि अनुमानित कराधान अभी भी आय की गणना का एक सरल तरीका प्रदान करता है, लेकिन आयकर रिटर्न में नियमों के पालन की जशरतें बढ़ गई हैं. अब करदाताओं को अपनी दी गई जानकारी के समर्थन में बुनियादी वित्तीय रिकॉर्ड बनाए रखना जशरी है. निवेश की सही जानकारी न देने या आय और संपत्तियों के बीच बेमेल होने पर कर अधिकारियों द्वाराआयकर की जांच (स्क्रूटनी) की जा सकती है. आयकर का पुनर्मूल्यांकन भी किया जा सकता है. गलत रिपोर्टिंग के मामलों में, टैक्स देने वाले को देय टैक्स का 200% तक जुर्माना देना पड़ सकता है. अनुमानित कराधान (presumptive taxation) के तहत अनिवार्य निवेश खुलासे की शुरुआत भारत के टैक्स प्रशासन में एक बड़ा बदलाव है. जहां यह योजना आय की गणना को आसान बनाती रहती है, वहीं अब यह अयादा वित्तीय पारदर्शिता की मांग करती है. भारत में छोटे टैक्स देने वालों के लिए टैक्स नियमों का पालन आसान बनाने में अनुमानित कराधान की अहम भूमिका है. जहाँ यह खातों और ऑडिट को बनाए रखने का बोझ कम करता है, वहीं हाल के बदलाव सरकार की पारदर्शिता बढ़ाने और दुरुपयोग पर रोक लगाने की मंशा को दर्शाते हैं.
अमोल दातार
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