संवेदनाओं का दम ताेड़ने वाली घटनाएं नैतिकता पर सवाल?

    12-May-2026
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एसिड अटैक मानवता के मुंह पर वह तमाचा है, जहां सभ्यता,संस्कृति और संवेदनाएं एक साथ दम ताेड़ती दिखाई देती हैं. ऐसे अपराध केवल किसी एक व्य्नित पर हमला नहीं हाेते, बल्कि वे पूरे समाज की चेतना और नैतिकता काे कठघरे में खड़ा कर देते हैं.हाल ही में देश के शीर्ष न्यायालय ने शाहीन मलिक बनाम भारत संघ मामले में एसिड अटैक के संबंध में माैजूदा कानूनाें के तहत तेजाब हमलाें से जुड़े मामलाें के निस्तारण काे लेकर गंभीर चिंता व्य्नत की. अदालत ने माना कि ऐसे अपराधाें के लिए निर्धारित दंड पर्याप्त नहीं है. तथा कई पीड़ित अब भी उचित कानूनी पहचान और सहायता से वंचित है. सुनवाई के दाैरान न्यायालय ने विकलांग व्य्नितयाें के अधिकार अधिनियम 2016 के प्रावधानाें की भी समीक्षा की. अदालत ने पाया कि अधिनियम की वर्तमान अनुसूची में तेजाब हमले के पीड़िताें काे केवल उन व्य्नितयाें तक सीमित रखा गया है. जाे एसिड या इसी तरह के संहारक पदार्थ फेंकने से हुए हिंसक हमलाें के कारण विकृत हाे गए है.
 
न्यायालय ने केंद्र सरकार से अनुसूची में संशाेधन कर ऐसे मामलाें काे शामिल करने पर विचार करने काे कहा.सुनवाई के दाैरान अदालत ने कहा, यदि इस संशाेधन काे अधिसूचित किया जाता है, ताे हम इसकी सराहना करेंगे. यही नहीं पीठ ने तेजाब की सहज उपलब्धता और उसकी अवैध बिक्री पर भी गंभीर चिंता जताई और कहा कि अवैध रूप से तेजाब बेचने वाले विक्रेताओं काे जिम्मेदारी से बचने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. तथा ऐसे मामलाें में उनकी जवाबदेही भी सुनिश्चित हाेनी चाहिए.न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि दायित्व केवल हमलावर तक सीमित नहीं रहना चाहिए. सुनवाई के दाैरान अपराधियाें पर कठाेर आर्थिक दंड लगाने और उनकी संपत्ति जब्त करने जैसे उपायाें पर भी चर्चा हुई. अदालत ने टिप्पणी काे हमलावर की संपत्ति जिसमें संयु्नत हिंदू परिवार की संपति में उसका हिस्सा भी शामिल है, क्यों न जब्त की जाए? हम आत्मसम्मान आदि की बात करते हैं. ताे आराेपी काे क्यों नहीं भुगतना चाहिए?एसिड अटैक मानवता के मुंह पर वह तमाचा है.
 
जहां सभ्यता संस्कृति और संवेदनाएं एक साथ दम ताेड़ती दिखाई देती हैं. ऐसे अपराध केवल किसी एक व्य्नित पर हमला नहीं हाेते, बल्कि वे परे समाज की चेतना और नैतिकता काे कठघरे में खड़ा कर देते हैं.विशेष रूप से वे लाेग भी प्रश्नाें के घेरे में आ जाते हैं, जाे इस हिंसा के विरुद्ध बाेलने का साहस नहीं जुटा पाते.बिना किसी अपराध के जीवनभर असहनीय पीड़ा सहना केवल शारीरिक या मानसिक यातना भर नहीं है. यह उस धीमे जहर की तरह है. जिसमें पीड़िता हर दिन जीते हुए स्वयं काे अपराध बाेध, उपेक्षा और सामाजिक असहजता के बीच घिरा हुआ पाती है. विडंबना यह है कि तेजाब का प्र्रभाव केवल शरीर काे नहीं जलाता, बल्कि वह व्य्नित के आत्मविश्वास संबंधाें और जीवन के प्रति विश्वास काे भी भीतर तक झुलसा देता है.यदि हम यह साेचते हैंं कि ऐसी कुंठित मानसिकता केवल भारत तक सीमित है, ताे यह हमारी गंभीर भूल हाेगी. स्त्री काे अस्वीकार किए जाने, नियंत्रण खाे देने या आहत अहंकार के प्रतिशाेध में हिंसा का शिकार बनाना दर असल संपूर्ण विश्व की एक सामाजिक बीमारी है.
 
पुरुष अ्नसर स्त्री की ‘न’ काे स्वीकार नहीं कर पाता. जब उसका अहंकार घायल हाेता है. तब वह श्नित भय, हिंसा या नियंत्रण के माध्यम से स्त्री पर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है और जब वह ऐसा करने में असफल हाेता है, तब कई बार प्र्रतिशाेध सबसे क्रूर रूप में सामने आता है.नारीवादी चिंतक बेल हु्नस पितृसत्ता काे ऐसी व्यवस्था मानती हैं. जाे पुरुष काे यह विश्वास दिलाती है कि प्र्रभुत्व उसका स्वाभाविक अधिकार है. वहीं मनाेवैज्ञानिक लंडी बैनक्राॅप्ट अपनी पुस्तक व्हाय डज ही डू दैट? में लिखते हैं कि हिंसा केवल क्षणिक क्राेध का परिणाम नहीं हाेती बल्कि उसके मूल में स्वामित्व, अधिकार बाेध और नियंत्रण की मानसिकता छिपी हाेती है. यही कारण है कि जब काेई स्त्री अपनी स्वतंत्र इच्छा से निर्णय लेती है. असहमति जताती है. या किसी संबंध काे अस्वीकार करती है. तब पुरुषवादी अहंकार कई बार उसे दंडित करने पर उतारू हाे जाता है.इन तमाम असहनीय यातनाओं और सामाजिक उपेक्षाओं के बीच जाे बात सबसे अधिक चकित करती है. वह है एसिड अटैक सर्वाइवर्स की अदम्य जिजीविषा.
 
उनकी जिजीविषा पित्तृसत्तात्मक मानसिकता काे आईना दिखाती है. जिन लाेगाें ने उन्हें ताेड़ने डराने और जीवनभर के लिए समाप्त कर देने का प्रयास किया, वे इनके शरीर काे ताे घायल कर पाए पर उनकी आत्मा उनका साहस और जीने की इच्छा काे समाप्त नहीं कर सके. शायद यही उन अपराधियाें की सबसे बड़ी हार है कि जिन स्त्रियाें काे वे भय और पीड़ा के अंधेरे में धकेल देना चाहते थे, वही स्त्रियां आज संघर्ष आत्मसम्मान और साहस की सबसे मजबूत आवाज बनकर खड़ी हैं.भारतीय एसिड अटैक सर्वाइवर रेशमा कुरैशी इसका एक सश्नत उदाहरण हैं. जिन लड़की के चेहरे काे तेजाब से मिटा देने की काेशिश की गई थी. वही रेशमा बाद में न्यूयाॅर्क फैशन वीक के रैम्प तक पहुंची. यह केवल एक उपलब्धि नहीं थीं. बल्कि उस मानसिकता के विरुद्ध एक शांत किंतु दृढ़ प्रतिराेध था, जाे किसी स्त्री की पहचान काे उसके चेहरे तक सीमित समझती है. कुछ ऐसी ही कहानी ब्रिटेन की केटी पाइपर की भी है. एक भयानक एसिड अटैक के बाद लंबे समय तक शारीरिकऔर मानसिक पीड़ा से गुजरने वाली केटी ने स्वयं काे केवल एक पीड़िता के रूप में सीमित नहीं हाेने दिया.
- डाॅ.ऋतु सारस्वत