शिवाजीनगर, 12 मई (आ. प्र.)
विदेशी मुद्रा भंडार की बचत करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (10 मई) को देशवासियों से एक विशेष आह्वान किया है. इसमें मुख्य रूप से विदेश यात्राओं से बचने, वर्क फ्रॉम होम नीति अपनाने और सोना खरीदने की योजना को एक साल के लिए स्थगित करने जैसे मुद्दों पर विशेष चर्चा हो रही है. इस संदर्भ में जनता और विशेषज्ञों द्वारा मिली-जुली प्रतिक्रियाएं व्यक्त की जा रही हैं.
कुछ लोगों का मानना है कि प्रधानमंत्री के इस आह्वान को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है. वहीं दूसरी ओर, कुछ वर्गों का कहना है कि इन बातों को अधिक तर्कसंगत और स्पष्ट तरीके से लोगों के सामने पेश किया जा सकता था. इसके अलावा, यह तर्क भी दिया जा रहा है कि बचत और इन बदलावों की शुरुआत सरकार को स्वयं अपने स्तर से करनी चाहिए. किसी वस्तु की ‘खरीद न करें’ ऐसा कहना बहुत सरल होता है, लेकिन उस व्यवसाय से जुड़े लोगों को इस निर्णय के कारण कितनी बड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा, प्रधानमंत्री को इस पहलू पर भी विचार करना चाहिए था. लोगों का तर्कयुक्त सवाल है कि अगर लोग सोना-चांदी नहीं खरीदेंगे तो उन दुकानों का क्या होगा, साल भर का किराया और वेतन कौन देगा..? तो यह एक आम राय है. लोग कहते हैं कि आप सिर्फ सोना-चांदी के बारे में ही क्यों बात कर रहे हैं..? आज और भी तो कई व्यवसाय हैं, जो इन सभी चीजों से जुड़े हुए हैं. ऐसा तो नहीं है कि आज सिर्फ सोना-चांदी ही इम्पोर्ट होता है..? मोबाइल फोन हैं या कई अन्य इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं हैं, उनके बारे में भी बात कीजिए. बाकी चीजें भी तो इम्पोर्ट होती हैं, फिर आप बाकी व्यवसायों के बारे में क्यों नहीं बोलते..? लोग कह रहे हैं कि दुनिया में मानवीय प्रवृत्ति यही है कि हम स्वयं क्या करें, इसके बजाय दूसरों को क्या करना चाहिए, यह बताना आसान होता है और वही किया जा रहा है. क्योंकि, जिनका व्यवसाय बंद होने वाला है, क्या उन्हें यह सब झेलना मुमकिन होगा..? और यदि कोई व्यवसायी साल भर कर्मचारियों को वेतन नहीं देता है तो श्रम कानून के तहत उन पर मुकदमे चलाए जाएंगे. इससे जुड़ी जो अन्य समस्याएं पैदा होती हैं, उन पर उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया है. आज अगर हम लाखों कारीगरों की बात करें, तो क्या कभी इस बात पर विचार किया गया है कि उन पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा..? और आप चुनाव खत्म होते ही यह बात कर रहे हैं. लेकिन, आज जब प्रधानमंत्री खुद बोल रहे हैं, तो हम उस पर क्या कह सकते हैं..? इसकी दखल तो लेनी ही पड़ेगी.
सरकार पहले खुद में सुधार करे
आम लोगों का कहना है कि आप हमें ‘शेयर कार’ इस्तेमाल करने की सलाह दे रहे हैं, जबकि हम अपने खर्च से पेट्रोल भर रहे हैं, वह भी उस रकम से जिस पर हमने पहले ही 35% टैक्स चुकाया है. वहीं दूसरी ओर, आप हमारे द्वारा भरे गए उसी 35% टैक्स के पैसे से अपना पेट्रोल भर रहे हैं. तो सरकार को इन सब बातों पर विचार करना चाहिए ना, कि दूसरों को सुधारने की सलाह देने से पहले खुद में सुधार करना जरूरी है. बड़े बड़े कार्यक्रमों में 200-200 लोगों के प्रतिनिधिमंडल या मंत्रियों के साथ विदेशों के दौरों पर जाने पर रोक लगाने की जरुरत है. इतने बड़े सम्मेलनों की क्या जरुरत है..? यह सब भी तो ऑनलाइन वेबिनार के जरिए हो सकता है.
पीएम की अपील के बाद जनभावनाएं कुछ इस प्रकार भी सामने आयीं
जनता की सरकार से अपील है कि यदि देश में भ्रष्टाचार को छह महीने के लिए भी रोकने की हिम्मत दिखाई जाए, तो देश को पांच साल आगे ले जाया जा सकता है. मंत्रियों और राजनीतिक नेताओं के लिए इस्तेमाल होने वाले महंगे वाहनों के बड़े काफिलों को कम करके भी पेट्रोल और डीजल की बड़ी बचत की जा सकती है. सरकार को पहले खुद से शुरुआत करनी चाहिए. ये जो सोना-चांदी व्यवसाय है, सिर्फ उनके साथ ही ऐसा क्यों..? बाकी भी तो कई बिजनेस हैं ही. आज आईपीएल में क्या चल रहा है..? वहां आप कुछ नहीं बोलते. आईपीएल में आज जो करोड़ों रुपये आप खर्च कर रहे हैं, क्या वहां फॉरेन करेंसी (विदेशी मुद्रा) का मामला नहीं है..? जो विदेशी खिलाड़ी लिए हैं, क्या उन्हें आपने रुपयों में भुगतान किया है..? अगर लोग साल भर सोना नहीं खरीदेंगे, तो दुकानों की किस्तें कौन भरेगा और कर्मचारियों को वेतन कौन देगा..? क्या सरकार इसके लिए तैयार है..? क्या कोई प्रधानमंत्री को इन बातों से अवगत कराएगा..? जिनका व्यवसाय बंद होने वाला है, क्या उन्हें यह सब झेलना मुमकिन होगा..?
सोना न खरीदने का बयान उचित नहीं लगता
प्रधानमंत्री मोदीजी द्वारा सोना न खरीदने के संदर्भ में दिया गया बयान उचित नहीं लगता. शायद उनके कहने का अर्थ कुछ और रहा होगा, क्योंकि वे लोगों से ऐसा कैसे कह सकते हैं कि आप सोना मत खरीदिए..? अगर लोग सोना खरीदना बंद कर देंगे, तो क्या व्यापारियों को अपनी दुकानें बंद कर देनी चाहिए..? क्या कारीगरों को अपने गांव लौट जाना चाहिए..? ऐसे बहुत से लोग हैं जिनका घर खर्च दैनिक व्यवसाय और रोज के छोटे-मोटे काम से चलता है. भारत में व्यापारियों और इन पर निर्भर रहने वाले लोगों की संख्या लाखों-करोड़ों में है. मुझे ऐसा लगता है कि उनके कहने का अर्थ यह हो सकता है कि जो निवेशक हैं, जो बड़े अरबपति हैं, जो केवल निवेश के रूप में सोने की ईंटें, बिस्कुट खरीदकर जमा कर रखते हैं और करोड़ों रुपयों के मुनाफे के हिसाब से उनकी जो भी प्लानिंग होगी; उस पर कहीं न कहीं नियंत्रण लाना आवश्यक है. इससे हमारे फॉरेन एक्सचेंज (विदेशी मुद्रा भंडार) में हमें फायदा हो सकता है, यही मुख्य मुद्दा है. इसलिए उनके भाषण को लेकर उनकी ओर से स्पष्टीकरण आना चाहिए और मुझे लगता है कि उन्हें अपने शब्द वापस लेने चाहिए. -विपुल अष्टेकर, सर्राफा व्यवसायी, पुणे
संस्कृति के अनुसार गहने खरीदना जारी रहेगा
अगर अभी ज्वेलर्स की स्थिति देखी जाए, तो सोने की दरें बढ़ने के कारण फ्रेश गोल्ड की बिक्री में कमी आई है. पिछले डेढ़ साल से कीमतों में जो बढ़ोतरी शुरू हुई है, उसके चलते नए सोने की बिक्री का प्रमाण कम हुआ है. लेकिन इसमें ओल्ड गोल्ड (पुराने सोने) का योगदान 50 से 70 प्रतिशत तक है; यानी री-साइकिलिंग पहले से ही जारी है. लोग अपना पुराना सोना दे रहे हैं और उसके बदले में नए गहने बनवा रहे हैं. इस री-साइकिलिंग की वजह से बाजार पर बहुत बड़ा प्रभाव (इम्पैक्ट) नहीं पड़ेगा. दूसरा मुख्य बिंदु यह है कि भारतीय संस्कृति के अनुसार लोग गहने खरीदते ही हैं और वे इसे जारी रखेंगे. शादियों के लिए गहने खरीदना अनिवार्य होता है, उसके लिए लोग रुकते नहीं हैं, यह भी एक बड़ा कारण है. एक और महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि जेम्स एंड ज्वेलरी गोल्ड काउंसिल ने सरकार के पास गोल्ड मॉनिटाइजेशन (स्वर्ण मुद्रीकरण) का जो प्रस्ताव पिछले दो वर्षों से भेजा हुआ है, अब समय आ गया है कि सरकार उस पर निर्णय ले. गोल्ड मॉनिटाइजेशन का अर्थ है कि भारत में लोगों के घरों में जो अनुमानित 25 हजार टन सोना पड़ा है, उसे बाहर निकाला जाए. उसे आधिकारिक माध्यम से लोगों से लिया जाए और बैंकों के जरिए ज्वेलर्स को देकर सर्कुलेशन (चलन) में लाया जाए. इससे यह फायदा होगा कि ज्वेलर्स को रोजमर्रा की मांग पूरी करने के लिए नया सोना आयात नहीं करना पड़ेगा. साथ ही, जेम्स एंड ज्वेलरी इंडस्ट्री लाखों लोगों को रोजगार देती है, जिसमें हमारे कारीगर, आर्टिजन्स और कर्मचारी वर्ग शामिल हैं. यह एक प्रमुख उद्योग है. ऐसे में अगर हम अचानक यह कह दें कि इसे बंद कर दो, तो इतने सारे लोग आखिर करेंगे क्या..? - वास्तुपाल रांका, रांका ज्वेलर्स, कर्वे रोड
ईटीएफ के नए निवेश पर प्रतिबंध लगाने का विकल्प
सामान्य लोग गोल्ड और सिल्वर ईटीएफ में पैसा निवेश करते हैं. इन ईटीएफ में निवेश किए गए पैसों के लिए म्यूचुअल फंड का यह मैंडेट होता है कि उन्हें उन पैसों से अंडरलाइंग एसेट, यानी गोल्ड और सिल्वर ही खरीदना चाहिए. इसके बाद, निवेश की गई राशि के बराबर गोल्ड और सिल्वर खरीदा जाता है. यदि सरकार ईटीएफ के नए निवेश पर एक साल के लिए प्रतिबंध लगा देती है कि-अभी जो निवेश किया जा चुका है वह ठीक है, लेकिन यदि कोई उससे बाहर निकलना चाहता है तो केवल बाहर निकलने की अनुमति होगी, नया निवेश नहीं किया जा सकेगा. या तो जो लोग बाहर निकलेंगे उनका सोना बाजार में आएगा, यानी नया इम्पोर्ट नहीं करना पड़ेगा, क्योंकि वह पहले से ही इम्पोर्ट हो चुका है. नया निवेश नहीं होगा, इसलिए उसके लिए नई खरीदारी करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. ईटीएफ में जो सोना आता है, वह पूरी तरह से अलग हो जाता है. वह बाजार में नहीं आता, उसके गहने नहीं बनते और न ही कुछ और होता है, उल्टा उसका दबाव सीएडी पर पड़ता है. गहने तो बनने ही वाले हैं, क्योंकि मैं ऐसा नहीं कह सकता कि मेरी बेटी की शादी है, तो आज बेटी को ले जाओ, मैं गहने अगले साल भेज दूंगा. मुझे बेटी और गहनों को एक साथ ही विदा करना पड़ता है. मैं एक और उदाहरण देना चाहूंगा, मान लीजिए किसी की शादी की 50वीं सालगिरह है और पति ने अपनी पत्नी से वादा किया है कि इस 50वीं सालगिरह पर मैं तुम्हें एक गहना बनवाकर दूंगा. लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर अगर पति इसे एक साल के लिए टाल दिया और बाद में वह (पत्नी) रही ही नहीं तो..? इसलिए, जो चीजें जिस समय होनी चाहिए, उन्हें उसी समय करना जरूरी है. तो फिर, एक साल तक गहने मत खरीदो - यह बेतुका तर्क आखिर किसने लगाया..? हम गहने खरीदेंगे किस पैसे से..? हम 35% टैक्स भरे हुए पैसे से गहने खरीदने वाले हैं. 12% इंपोर्ट ड्यूटी भरे हुए सोने से गहने बनवाएंगे और उस पर 3% जीएसटी भी भरेंगे. आरबीआई ने रुपया और डॉलर का जो भी मूल्य तय किया है, उसी दर पर हम डॉलर खरीदकर उससे सोना खरीदेंगे. इतना सब कुछ सरकार को देने के बाद भी अगर आप कहते हैं कि हमें सोना नहीं खरीदना चाहिए, तो फिर इससे अच्छा है कि आप पुराना वाला ‘गोल्ड कंट्रोल एक्ट’ ही वापस ले आइए. यह लोगों का पैसा है और इतने बड़े पैमाने पर टैक्स वसूलने के बाद भी, अगर सरकार लोगों को यह बताने वाली हैं कि हमें इसे कैसे खर्च करना चाहिए, तो फिर लोगों के इतनी मेहनत करके पैसे कमाने का फायदा ही क्या है..? और इतने दिनों से जो सरकार ढोल पीट रही थी कि मुमकिन है. अब तक जो नहीं हुआ वह हुआ और भारत का फॉरेक्स रिजर्व (विदेशी मुद्रा भंडार) उच्चतम स्तर पर पहुंच गया, तो वह सारा जो फॉरेक्स रिजर्व है, वह विदेशी संस्थागत निवेशक के निवेश और उनके द्वारा यहां किए गए कर्ज के निवेश का हिस्सा है. वह कभी भी बाहर जा सकता है. वह निर्यात से कमाया हुआ पैसा नहीं है कि मैं अपनी मर्जी से उसका इस्तेमाल कर सकूं. तो क्या आपको इतने दिनों तक इस बात का होश नहीं था, जो अब अचानक आ गया है..? इतने दिनों तक क्रेडिट लेते समय तो बहुत अच्छा लगा न कि हाइएस्ट फॉरेक्स रिजर्व, लाइफ टाइम हाइएस्ट एफएक्स रिजर्व वगैरा वगैरा. इसलिए, केवल ईटीएफ पर भी यदि वे प्रतिबंध लगाते हैं, तो वह पर्याप्त होगा. दूसरी बात यह है कि ईटीएफ के पास जो सोना जमा है, उसे गोल्ड मेटल लोन के रूप में बैंकों के माध्यम से उपयोग में लाया जा सकता है. साथ ही आरबीआई के पास जो 800 टन सोना पड़ा है, जिसके लिए पहले ही विदेशी मुद्रा का भुगतान किया जा चुका है, यदि उसे जीएमएलके रूप में उपयोग में लाया जाए, तो हमारे पास इतना सोना है कि लगभग डेढ़ साल तक सोने का आयात करने की आवश्यकता नहीं होगी. आरबीआई जो सोना जीएमएल के रूप में देगी, वह बैंक के पास वापस आ जाएगा, इसलिए इससे रिजर्व बैंक को कोई नुकसान नहीं होगा. साथ ही, चूंकि बैंक इस सोने की बिक्री नहीं करेगा, इसलिए उनके फॉरेक्स रिजर्व को सुरक्षित रखने के उद्देश्य को कोई खतरा नहीं पहुंचता है. अतः, सर्राफा व्यवसाय को खत्म करनाजिसमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 1 करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ है और जिसका जीडीपी ( में 7% हिस्सा है - उस इंडस्ट्री को आप अचानक कह रहे हैं कि व्यापार बंद कर दें; यह किसी भी लिहाज से तर्कसंगत नहीं है. -अमित मोडक, वरिष्ठ कमोडिटी एक्सपट