सुरेश परिहार : सीनियर सब एडीटर
देश की सबसे महत्वपूर्ण प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल नीट का बार-बार पेपर लीक होना अब केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं रह गयी है. यह उस व्यवस्था की गहरी विफलता का संकेत है, जिस पर करोड़ों युवा अपने भविष्य की नींव रखते हैं. हर वर्ष लाखों विद्यार्थी वर्षों की मेहनत, अनुशासन और त्याग के साथ इस परीक्षा की तैयारी करते हैं, लेकिन एक लीक हुआ प्रश्नपत्र कुछ ही मिनटों में उनकी पूरी साधना को संदेह के घेरे में खड़ा कर देता है. सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह समस्या अब अपवाद नहीं रही, बल्कि एक खतरनाक प्रवृत्ति बनती जा रही है. बार-बार होने वाले पेपर लीक यह संकेत देते हैं कि शिक्षा प्रणाली के भीतर कहीं न कहीं ऐसा संगठित नेटवर्क सक्रिय है, जो छात्रों की मेहनत को बाजार में बेचने का माध्यम बना चुका है. प्रश्न यह नहीं कि पेपर कैसे लीक हुआ, बल्कि यह है कि इतनी बड़ी परीक्षा प्रणाली में हर बार सुरक्षा की परतें आखिर कहां कमजोर पड़ जाती हैं. इसका सबसे बड़ा नुकसान उन विद्यार्थियों को उठाना पड़ता है, जिनके पास केवल मेहनत ही पूंजी होती है. छोटे शहरों और मध्यमवर्गीय परिवारों के छात्र वर्षों तक सामाजिक जीवन से दूरी बनाकर तैयारी करते हैं. कई माता-पिता अपनी जमा पूंजी तक खर्च कर देते हैं ताकि उनके बच्चे डॉक्टर बनने का सपना पूरा कर सकें. लेकिन जब परीक्षा की निष्पक्षता ही सवालों के घेरे में आ जाए, तो सबसे पहले युवाओं का आत्मवेिशास टूटता है. परीक्षा दोबारा कराना समस्या का समाधान नहीं है. हर दोबारा परीक्षा छात्रों पर मानसिक, आर्थिक और भावनात्मक दबाव को कई गुना बढ़ा देती है. लगातार तनाव, अनिश्चितता और असुरक्षा का माहौल युवाओं को भीतर से कमजोर करता है. यह केवल समय की हानि नहीं, बल्कि वेिशास की क्षति है.इस पूरे प्रकरण का एक और गंभीर पक्ष है. शिक्षा का बढ़ता व्यवसायीकरण. आज प्रतियोगी परीक्षाओं के आसपास कोचिंग, दलालों और अवैध नेटवर्क का ऐसा तंत्र विकसित हो चुका है, जहां ईमानदार मेहनत कई बार कमजोर पड़ती दिखाई देती है. यदि व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं बढ़ाई गई, तो यह स्थिति आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देगी कि सफलता मेहनत से नहीं, बल्कि पहुंच और पैसों से तय होती है.
व्यवस्था में संरचनात्मक बदलाव की आवश्यकता अब आवश्यकता केवल जांच और गिरफ्तारियों की नहीं, बल्कि व्यवस्था में संरचनात्मक बदलाव की है. परीक्षा प्रक्रिया को तकनीकी रूप से अधिक सुरक्षित बनाना, जिम्मेदार अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय करना और दोषियों को त्वरित एवं कठोर सजा देना समय की मांग है. शिक्षा किसी भी राष्ट्र की नैतिक और सामाजिक शक्ति होती है. यदि युवाओं का भरोसा शिक्षा व्यवस्था से उठने लगे, तो यह केवल एक परीक्षा का संकट नहीं, बल्कि देश के भविष्य के लिए चेतावनी है. क्योंकि जब मेहनत हारने लगती है और भ्रष्टाचार जीतने लगता है, तब केवल छात्र नहीं, पूरा समाज कमजोर होता है.