अदालत किन आधारों पर तय करती है गुजारा भत्ता ?

एडवोकेट भालचंद्र एस. धापटे ने दी विस्तार से महत्वपूर्ण कानूनी जानकार

    17-May-2026
Total Views |
ngdN
वैवाहिक विवादों में भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषयों में से एक माना जाता है. पति-पत्नी के बीच आर्थिक जिम्मेदारियां, बच्चों का पालन-पोषण, पत्नी की आर्थिक स्थिति और अदालत की भूमिका को लेकर समाज में कई तरह की गलतफहमियां मौजूद हैं. इस बारे में एड. बीएस.धापटे ने दै. आज का आनंद से बातचीत में महत्वपूर्ण जानकारी दी. प्रस्तुत हैं उनसे बातचीत के प्रमुख अंश-  
 
प्रश्न- भरण-पोषण तय करते समय न्यायालय किन प्रमुख आधारों पर विचार करता है?
उत्तर- भरण-पोषण की राशि तय करना केवल गणितीय प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि प्रत्येक मामले की वास्तविक परिस्थितियों का गहराई से अध्ययन करके न्यायालय द्वारा लिया जाने वाला न्यायिक निर्णय होता है. न्यायालय सबसे पहले पति की वास्तविक आय, व्यवसाय, संपत्ति, बैंक लेन-देन, जीवनशैली और आर्थिक क्षमता का परीक्षण करता है. केवल वेतन कितना है, इसी आधार पर निर्णय नहीं लिया जाता, बल्कि यह भी देखा जाता है कि संबंधित व्यक्ति के पास आय के अन्य स्रोत, कृषि भूमि, किराये से आय, निवेश या व्यापार से लाभ है या नहीं. कई बार पक्षकार अपनी आय कम दिखाने का प्रयास करते हैं, परंतु न्यायालय परिस्थितिजन्य प्रमाण, खर्च करने की शैली और सामाजिक स्तर के आधार पर वास्तविक आर्थिक स्थिति समझने का प्रयास करता है. इसके साथ ही न्यायालय पत्नी की आर्थिक स्थिति, उसकी शिक्षा, नौकरी, बच्चों की जिम्मेदारी, स्वास्थ्य, उपचार खर्च और वैवाहिक जीवन के दौरान के रहन-सहन के स्तर पर भी विचार करता है. नाबालिग बच्चों की शिक्षा, मकान किराया, दवाइयों का खर्च, दैनिक आवश्यकताएँ और बढ़ती महंगाई भी महत्वपूर्ण तत्व माने जाते हैं.
 प्रश्न- यदि पत्नी नौकरी करती हो तो क्या उसे भरणपोषण मिल सकता है?
उत्तर- केवल इस आधार पर कि पत्नी नौकरी करती है, उसे स्वतः भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता. भारतीय न्याय व्यवस्था में बार-बार यह स्पष्ट किया गया है कि केवल आय होना और सम्मानपूर्वक स्वतंत्र जीवन जीने में सक्षम होना, दोनों अलग बातें ह्‌ैं‍. न्यायालय पत्नी की मासिक आय, उसके खर्च, जीवन स्तर, बच्चों की जिम्मेदारी तथा पति की आर्थिक क्षमता का तुलनात्मक अध्ययन करता है. उदाहरण के लिए, यदि पत्नी कम वेतन वाली नौकरी करती है और उस पर मकान किराया, बच्चों की पढ़ाई, चिकित्सा खर्च तथा अन्य पारिवारिक जिम्मेदारियां हैं, तो उसकी आय अपर्याप्त मानी जा सकती है. ऐसी स्थिति में न्यायालय पति को भरण-पोषण देने का निर्देश दे सकता है. विशेष रूप से यह देखा जाता है कि विवाह के बाद पत्नी जिस सामाजिक और आर्थिक स्तर पर जीवन जी रही थी, उससे वह पूरी तरह वंचित न हो.
प्रश्न- पति स्वयं को बेरोजगार बताता हो तो न्यायालय की क्या भूमिका होती है?
उत्तर- भरण-पोषण के अनेक मामलों में पति स्वयं को बेरोजगार या आर्थिक रूप से असमर्थ बताने का प्रयास करता है. किंतु न्यायालय केवल वर्तमान में आय नहीं है इस कथन पर निर्भर नहीं रहता. न्यायालय संबंधित व्यक्ति की शिक्षा, अनुभव, पूर्व व्यवसाय, जीवनशैली तथा आय अर्जित करने की क्षमता पर भी विचार करता है. यदि कोई व्यक्ति शिक्षित, सक्षम और नौकरी या व्यापार करने योग्य होते हुए भी जानबूझकर बेरोजगार रहता है, तो न्यायालय उसे जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता. क्योंकि कानून का उद्देश्य पारिवारिक जिम्मेदारियों से बचने को बढ़ावा देना नहीं है. न्यायालय यह जांच करता है कि कहीं संबंधित व्यक्ति जानबूझकर अपनी आय छिपा तो नहीं रहा या आर्थिक दायित्व से बचने का प्रयास तो नहीं कर रहा.
प्रश्न- अंतरिम भरण-पोषण और स्थायी भरण-पोषण में क्या अंतर है?
उत्तर- भरण-पोषण के मामलों में अंतरिम भरणपोषण और स्थायी भरण-पोषण दो अलग अवधारणाएं हैं.अंतरिम भरण-पोषण वह राशि होती है जो मुकदमे की कार्यवाही चलने के दौरान आवेदक की अस्थायी आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए दी जाती है. कई बार वैवाहिक विवादों के मुकदमे वर्षों तक चलते ह्‌ैं‍. ऐसी स्थिति में आर्थिक रूप से कमजोर पक्ष को तत्काल सहायता की आवश्यकता होती है. इसलिए अंतिम निर्णय आने तक न्यायालय अस्थायी आर्थिक सहायता प्रदान करता है. हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के अंतर्गत अंतरिम भरण-पोषण की व्यवस्था की गई है. इसके अनुसार न्यायालय मुकदमे का खर्च और दैनिक आवश्यकताओं के लिए राशि प्रदान कर सकता है. वहीं स्थायी भरण-पोषण अंतिम निर्णय के बाद तय किया जाता है. हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के अंतर्गत न्यायालय दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति, भविष्य की आवश्यकताओं, वैवाहिक जीवन की अवधि तथा अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखकर अंतिम राशि निर्धारित करता है. यह राशि मासिक या एकमुश्त दोनों रूपों में दी जा सकती है.
प्रश्न- राजनेश बनाम नेहा निर्णय का भरण-पोषण मामलों में क्या महत्व है?
 उत्तर- राजनेश बनाम नेहा भरण-पोषण से जुड़े मामलों में अत्यंत महत्वपूर्ण और मार्गदर्शक निर्णय माना जाता है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भरण-पोषण मामलों में पारदर्शिता और समानता सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण दिशानिर्दे श निर्धारित किए. इस निर्णय में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दोनों पक्षों को अपनी संपूर्ण आर्थिक जानकारी शपथपत्र के माध्यम से प्रस्तुत करनी होगी. आय, संपत्ति, बैंक लेन-देन, निवेश, ऋण, मासिक खर्च और आर्थिक दायित्वों का पूरा विवरण न्यायालय के समक्ष रखना अनिवार्य किया गया. इससे आय छिपाना या गलत जानकारी देना कठिन हो गया. इस निर्णय में यह भी कहा गया कि भरण-पोषण मामलों में अनावश्यक विलंब नहीं होना चाहिए्‌‍. आर्थिक रूप से कमजोर पक्ष को समय पर सहायता मिलना अत्यंत आवश्यक है, इसलिए न्यायालयों को ऐसे मामलों पर यथासंभव शीघ्र निर्णय का प्रयास करना चाहिए.