पिछले कुछ वर्षों में विवाह से जुड़ी समस्याएं काफी गंभीर हो गई हैं. कई पहलुओं के बीच, एक बड़ी समस्या दिख रही है कि आज के युवक-युवती शादी ही नहीं करना चाहते. उनके मन में विवाह को लेकर कई तरह के भ्रम और वास्तविकताओं की एक उलझी हुई पहेली बन चुकी है. इसी पहेली को सुलझाने के लिए भारतीय जैन संगठन (बीजेएस) ने ‘दिल का जिग्सॉ’ नाम से एक विशेष गतिविधि की शुरुआत की है. आगामी 12 जुलाई 2026 को अग्रवाल समाज पूना द्वारा समाज के युवक-युवतियों के लिए यह कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है. इसी पृष्ठभूमि में बीजेएस के शांतिलाल मुत्था ने इस पहल की पूरी संकल्पना को स्पष्ट किया है. ‘आज का आनंद’ के विशेष प्रतिनिधि स्वप्निल बापट द्वारा लिए गए साक्षात्कार का संपादित अंश यहां प्रस्तुत है.
जनरेशन गैप यानी पारिवारिक व्यवस्था का कैंसर
आजकल के जमाने में जनरेशन गैप इस कदर बढ़ गया है कि हम अपनी बातें बच्चों पर थोप नहीं सकते. बच्चों को थोड़ी आजादी दी जानी चाहिए, उन्हें अपनी जिंदगी खुद जीनी है. अगर ऐसा नहीं हुआ, तो दो पीढ़ियों के बीच इतनी दूरी आ जाएगी कि बहुत बड़ी समस्या खड़ी हो जाएगी. यह जनरेशन गैप पारिवारिक व्यवस्था के लिए एक कैंसर की तरह है. हमारे भारत में पारिवारिक व्यवस्था, परिवार और सुखी परिवार ही प्रगति का आधार हैं. अब अगर यह परिवार ही नहीं बचा, तो क्या होगा..? इसीलिए परिवार बहुत महत्वपूर्ण है, परिवार को बचाए रखना और टिकाए रखना जरूरी है. परिवार रूपी संस्था या कुटुंब व्यवस्था को बनाए रखने के लिए यही एक मध्यम मार्ग है.
प्रश्न: आप पिछले लगभग 40 वर्षों से विवाह संबंधी गतिविधियां और कार्यक्रम चला रहे हैं. ‘दिल का जिग्सॉ’ शुरू करते हुए कौन सी समस्याएं आपके ध्यान में आईं?
उत्तर : पिछले 10 वर्षों में वैवाहिक समस्याएं बहुत अधिक गंभीर हो गई हैं. शिक्षा, तकनीक, एआई और सोशल मीडिया के कारण युवक-युवतियों की मानसिकता बदल गई है. वे या तो शादी करना ही नहीं चाहते या फिर देरी करना चाहते हैं. औसतन 28 साल की उम्र से पहले तो वे शादी करते ही नहीं हैं. लेकिन, एक बार शादी की उम्र निकल जाने के बाद जटिलताएं शुरू होती हैं. फिर सही जीवनसाथी मिलना मुश्किल हो जाता है. पहले माता-पिता बच्चों के लिए लड़का या लड़की ढूंढते थे, लेकिन आज के जमाने में बच्चों को किसी का हस्तक्षेप (इंटरफेरेंस) पसंद नहीं है. वे अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीना चाहते हैं. लेकिन, यहीं से कई समस्याओं की शुरुआत होती हुई दिखाई देती है.
प्रश्न: लड़के-लड़कियों का शादी के प्रति नजरिया किस प्रकार बदल गया है?
उत्तर : उदाहरण के तौर पर बताता हूं, अगर किसी लड़की पर घर में शादी के लिए बहुत दबाव बनाया जा रहा हो, तो वह चैट जीपीटी (ChatGPT) से सवाल पूछती है कि मेरे माता-पिता मुझ पर शादी के लिए बहुत दबाव डाल रहे हैं, मैं क्या करूँ..? इस पर चैट जीपीटी उत्तर देता है, घर में किसी की भी बात बिल्कुल मत सुनो, तुम बालिग हो और तुम्हें इसकी कोई जशरत नहीं है. तुम्हें अपनी जिंदगी खुद जीनी है, तुम बगावत करो, झगड़ा करो, बाहर निकल जाओ. इसी तरह, अगर आप इंस्टाग्राम पर 25 पोस्ट देखेंगे, तो उनमें से 5 पोस्ट ऐसी मिलेंगी कि शादी करने की कोई जरूरत नहीं है या फिर देर से करनी चाहिए. दूसरी तरफ, बिना शादी के लड़के-लड़कियों की मीटिंग्स होती हैं, वे रात-रात भर बैठते हैं, पब में जाते हैं और इस वजह से लोगों को शादी की जरूरत महसूस नहीं होती. उन्हें आजादी चाहिए, एन्जॉय करना है, जिंदगी जीनी है, और इसी वजह से लोगों का शादी के प्रति नजरिया बदल गया है.
प्रश्न: क्या इसी वजह से शादी के विषय पर समझ और गलतफहमियों का एक पहेली सा माहौल बन रहा है... और क्या यह कार्यक्रम इसी उद्देश्य के लिए आयोजित किया गया है?
उत्तर: हमने इस तरह का एक मॉडल पेश किया है जो विशेष रूप से युवक-युवतियों के लिए है. इसमें यह सिखाया जाता है कि पार्टनर का चुनाव कैसे करना चाहिए और इसके लिए कौन से कौशल जरूरी हैं. अलग-अलग सेशन्स लेकर और एक्टिविटीज (गतिविधियों) के माध्यम से आपको यह समझने में मदद मिलती है कि कंपैटिबिलिटी (आपसी तालमेल) कैसे जांची जाए, लाइफस्टाइल को कैसे परखा जाए और मैच-मेकिंग कैसे की जाए. साथ ही, कहां समझौता (नेगोशिएशन) करना है और कहां बिल्कुल समझौता नहीं करना है, इसका निर्णय लेना आसान हो जाता है.
प्रश्न: आपने पहले भी माता-पिता के इंटरफेरेंस का उल्लेख किया था. क्या आप उस मुद्दे को और अधिक स्पष्ट करते हुए उन्हें कुछ बताना चाहेंगे?
उत्तर: अगर आजादी नहीं मिली, तो माता-पिता के दबाव में लड़के-लड़कियां शादी करने से ही मना कर देते हैं. या तो फिर शादी करने के बाद ही माता-पिता को बताते हैं. कई बार माता-पिता को आखिरकार थक-हारकर जबरदस्ती उन्हें अपनी सहमति देनी ही पड़ती है. मेरा पुरानी पीढ़ी से एक ही कहना है, मेरी आने वाली पीढ़ी मुझसे अयादा समझदार है, यह बात अगर आपने एक बार मन में बिठा ली तो सारे प्रश्न हल हो जाएंगे. छोटा सा उदाहरण देता हूं, मेरे मोबाइल में कुछ प्रॉब्लम आ गया, तो सबसे पहले मैं पोते को पूछता हूं, मेरे बेटे को भी नहीं पूछता हूं. तो एक्सेप्ट कर लो ना, वो अपने से होशियार है, तो विन-विन सिचुएशन होगी. आप नहीं मानेंगे तो लूज-लूज सिचुएशन होगी.
प्रश्नः माता-पिता को अपनी सोच बदलनी चाहिए, इसका क्या अर्थ है..? उन्हें किस तरह का समझौता करना चाहिए?
उत्तरः हमें यंग जनरेशन को कॉन्फिडेंस में लेना है. हो सकता है उनकी 10 में से 4 गलतियां होंगी. लेकिन फिर ये गलतियां तो आपने भी की होंगी ना कभी ना कभी. पेरेंट्स को बच्चों के एंगल से सोचना चाहिए. आजकल के बच्चे पढ़े-लिखे हैं. वो अलग-अलग शहरों में जाकर करियर बनाना चाहते हैं. आजकल की हर एक लड़की करियर बनाना चाहती है और हम व्यापारी समाज हैं. हम लड़कियों को घर के अंदर बैठना सिखाते हैं, कितनी भी क्वालिफाइड रहेंगी तो भी. ये सबसे बड़ा डिफरेंस है जिसकी वजह से शादियां नहीं हो रही हैं. तो ये गैप निकालना पड़ेगा. वो गैप निकालेंगे तो शादियां तय होंगी. वो गैप निकालने के लिए हमें कॉम्प्रोमाइज करना पड़ेगा, बच्चों को नहीं.
प्रश्न: पहले जब आपने वर-वधु सम्मेलनों की शुरुआत की थी, तब के मुकाबले अब के ‘दिल का जिग्सॉ’ कार्यक्रम में क्या-क्या बदलाव दिखाई दे रहे हैं?
उत्तर: ‘दिल का जिग्सॉ’ यह कार्यक्रम पूरी तरह से युवा पीढ़ी के लिए बनाया गया है. इसे युवा पीढ़ी के नजरिए से तैयार किया गया है, इसीलिए यह बदलते जमाने के अनुकूल है. आप बच्चों को आजादी दीजिए, आप बच्चों को यहां भेजिए, तब उन्हें समझ आएगा कि यह क्या होता है. यहां अगले पांच साल का सोच- विचार चल रहा है. मैंने जब 1985 में इन वर-वधु सम्मेलनों की शुरुआत की थी, तब बच्चे माता-पिता की बात सुनते थे. लेकिन उस समय की पीढ़ी और आज की पीढ़ी में जमीन-आसमान का फर्क है. इस पीढ़ी में, टेक्नोलॉजी, एआई और सोशल मीडिया के जमाने में बच्चों की सोच पूरी तरह से बदल चुकी है. इसी वजह से, अब हम अपने नजरिए से लड़का-लड़की ढूंढने के बजाय, बच्चों को अपना लाइफ पार्टनर खुद ढूंढना चाहिएइसके लिए हमने प्रोग्राम को मोल्ड किया है, चेंज किया है.
प्रश्न: क्या ऐसा कहा जा सकता है कि ‘दिल का जिग्सॉ’ में शादी के बारे में सोच बदलने की कोशिश की जाती है?
उत्तर: इसमें लड़के-लड़कियों को यह सोचने के लिए कुछ एक्टिविटीज दी जाती हैं. उन एक्टिविटीज को देखने के बाद उनके सोच में बदलाव आ सकता है, जिससे आप यह तय कर सकते हैं कि शादी करनी है या नहीं. पहले आप खुद यह तय कीजिए कि शादी करनी है या नहीं करनी है. इसमें हम आप पर कोई दबाव नहीं डाल रहे हैं. लेकिन, इस दौर में, यानी 2026 में शादी करते समय जीवनसाथी का चुनाव कैसे करना चाहिए? उसे चुनने का हुनर यह प्रोग्राम देता है.
प्रश्न: आपने इस कार्यक्रम का नाम ःदिल का जिग्सॉ’ तय किया है.. तो इसमें ‘जिग्सॉ’ शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर: हमारे पास जिग्सॉ गेम होता है, जिसमें पजल को सुलझाना होता है. उसी तरह यह ‘दिल का जिग्सॉ’ यानी आपके अंदर के मन की विवाह से जुड़ी उलझन है, जिसका समाधान इसमें है. लड़के-लड़कियों को खुद ही इस पजल को सुलझाना है. हम बच्चों को इसके लिए कौशल देते हैं.
प्रश्नः इस पहल के उद्देश्य को आप कैसे स्पष्ट करेंगे और बदली हुई परिस्थितियां क्या हैं?
उत्तरः पहले हमारा उद्देश्य होता था कि सुबह से शाम तक वर-वधु सम्मेलन में कितनी शादियां तय हो रही हैं. तब 100-100 लड़के-लड़कियां आते थे. आज के दौर में कितनी शादियां तय होती हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि तय हुई शादियां कितनी टिकती हैं, यह महत्वपूर्ण है. दिल का जिग्सॉ कार्यक्रम का उद्देश्य, अगर शादी करनी है, तो पार्टनर को कैसे ढूंढना चाहिए, इसकी ट्रेनिंग देना है. यह कार्यक्रम पारंपरिक मैच मेकिंग वर-वधु सम्मेलन नहीं है. शादी तय करते समय जैसे कुंडली के 36 गुण मिलते हैं या नहीं, यह देखा जाता है. आज के समय के अनुकूल हमने एक नई कुंडली बनाई है. इस कुंडली में आपकी कम्पैटिबिलिटी, फैमिली और लाइफ स्टाइल पर विचार किया जाता है. यह देखिए कि ये बातें आपस में मेल खाती हैं या नहीं, तभी शादी की बात आगे बढ़ाइए. यानी यह सिर्फ किसी एक समस्या का समाधान नहीं है, हम युवा पीढ़ी को इस बारे में शिक्षित कर रहे हैं.
प्रश्नः इस कार्यक्रम में शामिल होने के बाद माता-पिता की प्रतिक्रियाओं में क्या क्या बदलाव आया है?
उत्तरः माता-पिता की प्रतिक्रियाओं में बहुत बड़ा बदलाव आया है, क्योंकि अब माता-पिता ही बच्चों को यहां आने के लिए प्रेरित करते हैं. बच्चे यहां आने के बाद खुश होते हैं. हम शाम को 5 से 7 बजे तक दो घंटे के लिए माता-पिता को भी अंदर बुलाते हैं और माता-पिता के सामने बच्चों से पूछते हैं कि उन्हें कैसा लगा? फिर जब बच्चे जवाब देते हैं, तो माता-पिता खुश हो जाते हैं. वहां हम बच्चों के सामने माता-पिता से कहते हैं कि, आप इन्हें आजादी दें.. और बच्चे भी खुलकर बात करते हैं.
प्रश्नः विवाह सम्मेलनों में समाज परिवर्तन और कमर्शियलाइजेशन, यह दोनों ही रूप दिखाई देते हैं. आप इसे किस दृष्टिकोण से देखते हैं?
उत्तरः ‘दिल का जिग्सॉ’ कार्यक्रम सिर्फ शादी तय करने के लिए नहीं है. यहां शादी के बारे में गंभीरता से सोचने के लिए समय दिया जाता है. अगर लड़का-लड़की एक-दूसरे को पसंद आते हैं, तो वे कई बार एक-दूसरे से मिलेंगे. बातचीत करेंगे, एक-दूसरे के विचारों को जानेंगे-समझेंगे और फिर शादी करेंगे. यह समाज परिवर्तन है. समाज परिवर्तन बहुत पेचीदा होता है. समाज परिवर्तन के लिए पूरी जिंदगी लगानी पड़ती है. दूसरी ओर यहां कमर्शियलाइजेशन भी देखा जा रहा है. आपको 10 मोबाइल एप्लिकेशन मिलेंगे, आपको 10 जगहों पर पर्सनल एजेंट मिलेंगे. आमतौर पर हमारी मारवाड़ी कम्युनिटी में क्या होता है कि, कौन शादी में कितना लगाएगा, वो पहले बात करते हैं और फिर आगे बढ़ते हैं. 5 करोड़ मिलेगा, 10 करोड़ मिलेगा, 20 करोड़ मिलेगा. ये अपने जैन, गुजराती, मारवाड़ी सब लोगों में, अग्रवाल, माहेेशरी सब लोगों में ये है. अभी तक हमारी वो मेंटालिटी बदली नहीं है. अभी तक भी हमारे यहां एजेंट 5-5 लाख रुपये लेते हैं, 10-10 लाख रुपये लेते हैं शादी फिक्स करने का, लेकिन उससे कुछ फायदा नहीं होने वाला है.
प्रश्नः इस तरह का कार्यक्रम फिलहाल केवल जैन समाज के माता-पिता और बच्चों के लिए ही शुरू था, क्या अब आप इसे अन्य समाजों के लिए भी शुरू कर रहे हैं?
उत्तरः मैंने जब 1985 में सामूहिक विवाह और वर-वधु सम्मेलन शुरू किए थे, तब ये वैवाहिक प्रश्न समाज के स्तर पर सुलझाए जाते थे. 1985 के कार्यक्रम के बाद सभी समाजों ने वर-वधु सम्मेलन शुरू कर दिए. अब मैं जो कर रहा हूं, यह तो अभी मैं अग्रवाल समाज के लिए कर रहा हूं, लेकिन कल को अगर महाराष्ट्र का कोई भी समाज आगे आता है, तो मैं उनकी मदद करने का प्रयास करूंगा. क्योंकि यह एक सामाजिक प्रश्न है. यह कुल मिलाकर हमारी पारिवारिक व्यवस्था का प्रश्न है, भारत के भविष्य का प्रश्न है.आप कितने भी समृद्ध क्यों न हो जाएं, महाशक्ति क्यों न बन जाएं, लेकिन अगर आपके भीतर मूल्य, संस्कार नहीं होंगे और परिवार नहीं होगा, सुख, शांति और संतोष नहीं होगा, तो उसका कोई मूल्य नहीं है. जब आज तीन और चार साल की बच्चियों के साथ बलात्कार होते हैं, तब लोगों को समझ आता है. यह किस वजह से होता है? यह इसलिए हो रहा है क्योंकि आपके पास अब संस्कार, मूल्य बचे ही नहीं हैं! अगर यह सब रोकना है, तो लोगों को समय पर विवाह करने चाहिए. यह बायोलॉजिकल भी है, इसके पीछे विज्ञान है, इस बात को समझना चाहिए.
प्रश्नः समय पर शादी न हो, तो आगे चलकर समस्याएं पैदा होती हैं. यानी क्या यह कहना सही होगा कि यह समस्याओं का एक चक्र शुरू हो जाता है?
उत्तरः यह एक चक्र ही है. सही उम्र में शादी होनी चाहिए, लड़के-लड़कियों की 20 से 25 साल की उम्र के भीतर. लेकिन आजकल के बच्चों को शादी नहीं चाहिए. उन्हें आजादी चाहिए. ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ में रहना है और फिर छह महीने में ब्रेक-अप होता है. उन्हें यह जो तथाकथित ‘तत्काल मिलने वाला सुख’ है, उसका परिणाम जब समझ में आता है, तब इंसान सुधरता है. यह सब क्षणिक है. लेकिन फिलहाल पूरी दिशा उस क्षणिक सुख की ओर ही बढ़ रही है. यह वास्तविक जीवन नहीं है. आखिरकार जीवन में जीवनसाथी का होना जरूरी होता है. अगर वह न हो, तो ब्रेक-अप होने पर आप परेशान हो जाएंगे, आत्महत्या करेंगे, साइकोलॉजिस्ट की जरूरत पड़ेगी. सब कुछ झेलना पड़ेगा. यह सब महज एक गलती के कारण हो रहा है, उसी गलती को सुधारने का हमारा प्रयास है.