मनोवृत्ति के अनुसार देवताओं की उपासना भारतीय संस्कृति की विशेषता

अधिकमास में आयोजित कार्यक्रम के दौरान स्वानंद पुंड शास्त्री ने अपने प्रवचन में कहा

    25-May-2026
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बाजीराव रोड, 24 मई (आज का आनंद न्यूज नेटवर्क)

साक्षात परब्रह्म की पूजा (सीधे) नहीं की जा सकती, इसीलिए माध्यमों का निर्माण हुआ. अक्सर यह प्रश्न पूछा जाता है कि इतने सारे भगवान क्यों? इसका उत्तर भारतीय संस्कृति की व्यापकता में छिपा हुआ है. प्रत्येक व्यक्ति की मनोवृत्ति (स्वभाव) के अनुसार अलगअलग देवताओं की आराधना बताई गई है. यही भारतीय संस्कृति का वैभवशाली रूप है. यह प्रतिपादन प.पू. गाणपत्य विद्यावाचस्पति स्वानंद पुंड शास्त्री महाराज ने किया. वे ‌‘श्री गणेश गीता‌’ के अंतर्गत भक्तियोग पर चौथे दिन निरूपण (प्रवचन) करते हुए बोल रहे थे. इस प्रवचनमाला का आयोजन श्रीमंत दगडूशेठ हलवाई सार्वजनिक गणपति ट्रस्ट और सुवर्णयुग तरुण मंडल की ओर से किया गया है. श्रीमंत थोरले बाजीराव रोड पर स्थित नू.म.वि. प्रशाला और कनिष्ठ महाविद्यालय के सभागार में अधिकमास के पावन अवसर पर यह प्रवचनमाला चल रही है. प.पू.स्वानंद पुंड शास्त्री महाराज ने कहा कि संस्कृत का ‌‘निराश‌’ शब्द मराठी में नकारात्मक अर्थ में प्रयोग किया जाता है. परंतु संस्कृत में ‌‘निराश‌’ का अर्थ है ‌‘जिसकी एक भी आशा शेष न बची हो‌’. इसलिए हम सभी को निराश होना चाहिए, अर्थात सांसारिक अपेक्षाओं को छोड़ देना चाहिए. जब मनुष्य अपेक्षाओं से मुक्त हो जाता है और पूरी तरह से मोरया (श्री गणेश) की भक्ति में लीन हो जाता है, तब वह उत्तरायण के मार्ग पर अग्रसर होता है. उत्तरायण में जाने वाला जीव मुक्ति का अधिकारी माना जाता है. यह संपूर्ण रचना हमें मोरया ने बताई है.