आयुर्वेद का विज्ञान करीब 5,000 साल पुराना है. इस विज्ञान की सबसे खास बात है-प्रकृति प्रदत्त विद्या और विज्ञान. मतलब, प्राकृतिक रूप से उपजी जड़ी-बूटियाें से इलाज के आधार पर आयुर्वेद पद्धति बनी. इसकी औषधियां वन और दुर्गम क्षेत्राें पर आधारित थीं. इनमें भी हिमालय के पहाड़ दुर्लभ जड़ी-बूटियाें के भंडार थे. चूंकि यहां किसी किस्म की छेड़छाड़ संभव न थी, इसीलिए यह दुर्लभ हाेती थी और यही इनकाे विशिष्टता भी प्रदान करती थीं.तब और आज की परिस्थितियाें में बड़ा अंतर आया है. जिसे समझने की हमने गंभीर काेशिश नहीं की. तब प्राकृतिक स्थितियां अलग थीं, जबकि आज वे पूरी तरह से बदल चुकी हैं. मतलब, तब प्रकृति कैसी थीहवा, मिट्टी, जंगल, पानी यह सभी पूरी तरह से आपसी समन्वय में थे और उस परिस्थिति में काेई जड़ी-बूटी जन्म लेती थी.
इनकाे यूं भी परिभाषित किया जा सकता है, कि वे स्थान विशेष में पाई जाती हैं, जहां का तापक्रम, मिट्टी, उसके अवयव, नमी, छाया और दूसरी सूक्ष्म- पर्यावरणीय परिस्थितियाें की उनके पनपने में अहम भूमिका हाेती है. यह एक सश्नत विज्ञान रहा है. फिर यह घर-गांव की पद्धति थी और सबकी समझ की थी,पर व्यापारीकरण ने इसके मूल भाव पर ही चाेट कर डाली.अंग्रेजी दवाओं ने इसे कहीं अधिक पीछे धकेल दिया,ताे उसका कारण भी साफ था-तत्काल लाभ या फायदा अंग्रेजी दवाओं का मूलमंत्र रहा है. जिस तरह का जीवन हम जीते हैं, हमारे पास इतना धैर्य नहीं है कि हम आयुर्वेद के रास्ते काे अपनाएं. हालांकि, पिछले कुछ समय से जड़ी-बूटियाें और आयुर्वेद की वापसी बड़े सम्मानजनक तरीके से हाेनी शुरू हुई है. उसका बड़ा कारण यह है कि अंग्रेजी दवाओं की अपनी सीमाएं और अतिर्नित दुष्प्रभाव हैं, जबकि आयुर्वेद में माना जाता है कि यह हानिकारक नहीं हैं. आज यह एक विशेष वर्ग के लिए बहुत मायने रखता है.
दुर्याेग से न अब उत्तने जंगल बचे हैं, न नदियां बची हैं और न तालाब-पाेखर रह गए है. तापक्रम कहां से कहापहुंच गया हैं और यह सब जड़ी-बूटियाें के पनपने की बुनियादी शर्तें हैं. बदलती परिस्थितियाें की सबसे बड़ी चाेट किसी काे पहुंची है, ताे हमारी जड़ी-बूटियाें व वनस्पतियाें काे ही पहुंची है. अब प्रसिद्ध च्यवनप्राश काे ही लीजिए, इसकी 54 में से 32 वनस्पतियां खत्म ही समझें. मतलब इसके नाम पर ही संकट आ गया है, गुणवत्ता की बात ताे छाेड़ ही दीजिए. अलबत्ता, इनके विकल्प कंपनियाें ने ढूंढ़ लिए हाेंगे, पर अब 54च्यवनप्राश हाेने का दावा नहीं किया जा सकता.ज्यादातर आयुर्वेदिक दवाइयां ‘काॅम्बिनेशन’ हाेती हैं, जिनमें कई तरह की जड़ी-बूटियाें की भागीदारी हाेती है. हम किसी भी दवा का उदाहरण ले लें, जैसे त्रिफला, अमस्था या अन्य किसी भी आयुर्वेदिक मिश्रण काे देखें, सबमें कई प्रकार की जड़ी-बूटियाें और पाैधाें का संयाेजन है.
अब अगर यह तमाम तरह की जड़ी-बूटियां और वनस्पति ही संकट में हाें, तब फिर किस बात का आयुर्वेदिक हाेने का दावा? ऐसे में, एक ही रास्ता बचता है कि इनकी खेती में उतर जाएं,पर वैज्ञानिक स्वीकारेंगे कि जड़ी-बूटियाें का अपना एक खास विज्ञान है. वे स्थान विशेष की परिस्थितियाें में ही पैदा हाेती हैं.औषधीय महत्व की जड़ी-बूटियाें की खेती सरल नहीं समझी जानी चाहिए, जैसे हम आम या लीची उगाते हैं या किसी विदेशी फल काे लाकर अपने यहां लगा देते है. सबसे पहले ताे हमें यह मानना हाेगा कि जड़ी-बूटियाें के विज्ञान का जब जन्म हुआ, तबसे आज की जलवायु परिस्थिति में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है. इसलिए औषधीय पाैधाें की भले हम खेती कर लें, जड़ी-बूटी के उस मूलतत्व से वंचित रह जाएंगे, जिसे विज्ञान की भाषा में ‘ए्निटव एलिमेंट’ कहते हैं.
आज, बाजार में बिक रही दवाओं का अध्ययन करें, ताे उनके दाे हिस्से हैं. एक, वे दवाएं, जिनके लिए आज भी जड़ी-बूटियाें काे जंगलाें से एकत्र किया जाता है. फिर वे बड़े बाजार में बिकती हैं वे उन फै्नटरियाें तक पहुंचती हैं. जाे इनके फाॅमूले तैयार हाेते हैं और फिर यह उत्पाद के रूप में सामने आती हैं. साफ है, जंगलाें से एकत्रित की जाने वाली जड़ी-बूटियाें का अति-दाेहन हुआ और यह संकट में आ गई हैं. अकेले हिमालय में औषधीय महत्व की 20 वनस्पति प्रजातियां ‘लाल सूची’ में आ गई हैं, वहीं 112 खतरे में हैं. देश के स्तर पर 432 प्रजातियां ‘लाल सूची’ में आ गई हैं. कितनी प्रजातियां पूरी तरह समाप्त हाे गईं, उनकी कुल संख्या ताे पता ही नहीं है.
ऐसे में कई जड़ी-बूटियाें की खेती लाेकप्रिय हुई है जाहिर है, खेती-बाड़ी में इन औषधीय पाैधाें का विकास ताे हाे जाता है, पर उनके अंदर पाए जाने वाले ‘ए्निटव एलिमेंट’ या उनका जाे मूल स्वभाव है, उसमें अंतर आ जाता है. दूसरी किस्म की दवाएं इसी श्रेणी में आती हैं.इसलिए जड़ी-बूटियाें काे उसी स्थान विशेष में उगाया जाना चाहिए, जहां उनकी विशिष्टता रही है या फिर वैसा वातावरण तैयार करना चाहिए, ताकि उनमें ए्निटव एलिमेंट हाे और इनकी गुणवत्ता काे चुनाैती न झेलनी पड़े. यह बात चंद लाेकप्रिय उत्पादाें तक सीमित नहीं है. बल्कि ज्यादातर आयुर्वेदिक, उत्पाद इसी तरह के संकट में हैं. चिंता की बात वह है कि अगर जड़ी-बूटियाें या उनके उत्पादाें की गुणवत्ता खराब हाेती गई. ताे आयुर्वेद पद्धति काे आने वाले समय में आधुनिक अंग्रेजी पद्धतियां ढेर कर देंगी.
- अनिल प्रकाश जाेशी