शायद झालमुड़ी भी पांच सितारा हाेटलाें में काॅफी-चाय के भाव बिके!

    27-May-2026
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हरियाणा में रहने वाले निकट के परिवार की बहू का बचपन काेलकाता में बीता है. गुड़गांव में एक बहुराष्ट्रीय निगम में काम करती है, लेकिन नाश्ते में उसकी पहली पसंद झालमूड़ी है. एक बार बहुत साल पहले काेलकाता गई थी, ताे झाझा स्टेशन पर लाैकी के बराबर का खीरा और झालमूड़ी भी खाई थी. यह इतनी पसंद आई कि काेलकाता में हर दिन इसे खाती रही. याें भी काेलकाता में शाकाहारियाें के लिए जगह-जगह मिलता यह खाद्य पदार्थ बहुत सुविधाजनक भी हाेता है. बंगाल के अलावा बिहार, झारखंड, उड़ीसा, महाराष्ट्र आदि में भी यह लाेकप्रिय खाना है. सड़क-सड़क इसे बिकते देखा जा सकता है. दिल्ली में भी खूब मिलता है. दस-बीस रुपये जेब पर भारी भी नहीं हाेते. साथ ही कम कैलाेरी हाेने के कारण स्वास्थ्यवर्धक भी माना जाता है. भुने हुए चावल यानी कि मुरमुरे, जिन्हें देश के अलग-अलग भागाें में कहीं लाई ताे कहीं चिवड़ा नाम से पुकारा जाता है.
 
और भी बहुत से नाम हाेंगे. इनके साथ प्याज, टमाटर, हरी मिर्च, धनिया, चटनी, नींबू, कच्चा सरसाें का तेल और मसालाें के साथ इसे बनाया जाता है.बहुत से स्थानाें पर इसे भेलपूरी भी कहते हैं. घर में बनाकर भी इसे लाेग खूब खाते हैं. यह सस्ता और पेट भराऊ भी हाेता है. कहते हैं कि इसे खाने-बनाने की शुरुआत उन्नीसवीं सदी में हुई थी. बहुत से अंग्रेज भी इसे स्वाद लेकर खाते थे.जब से प्रधानमंत्री माेदी ने काेलकाता के दुकानदार विक्रम शा की दुकान से दस रुपये की झालमूड़ी खाई, तब से इंटरनेट पर इसे खाेजने वालाें की बाढ़ आ गई.माेदी ने इस घटना काे एक्स पर पाेस्ट भी किया था. वह शाकाहारी हैं, मछली खा नहीं सकते थे, इसलिए इसे खाकर बंगालवासियाें काे संदेश दिया था कि उन्हें उनके खाने-पीने से काेई परहेज नहीं है. क्याेंकि इसी तरह का प्रचार विराेधी पक्ष के द्वारा किया जा रहा था कि लाेगाें से उनका खाना तक छीन लिया जाएगा. इस घटना काे साै मिलियन व्यूज मिले थे. इंटरनेट पर छा गया था.
 
शायद इसलिए भी कि इस तरह की घटनाएं कभी-कभी ही हाेती हैं. दुकानदार विक्रम शा का कहना भी है कि उन्हें अंदाजा तक नहीं था कि कभी काेई प्रधानमंत्री, उन जैसे मामूली व्यक्ति की दुकान पर आ सकते हैं. लेकिन उन्हें इस बात का दुःख है कि वह इतना घबरा गए कि जिंदगी का एक सुनहरा माैका खाे दिया, जाे अब कभी नहीं मिलेगा.वह माैका था-प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर लेने का. गया, बिहार के रहने वाले विक्रम की दुकान राताेंरात मशहूर हाे गई है.दूर-दूर से इसे देखने लाेग आ रहे हैं. ज्यादा से ज्यादा लाेग उनके बारे में जानना चाहते हैं. बिक्री भी खूब हाे रही है.उनके नाते-रिश्तेदार, गांव के लाेग, इतनी बधाइयां दे रहे हैं कि फाेन बजना ही बंद नहीं हाे रहा. हालांकि, विक्रम के खिलाफ यह प्रचार भी किया गया था कि वह ताे एक कमांडाे हैं और यह घटना पहले से तैयार की गई थी.
 
राताेंरात दुकान बनाई गई थी, जबकि विक्रम का कहना है कि वह ताे बहुत दिनाें से ये काम करते हैं. और काेई कमांडाे नहीं, मामूली से दुकानदार हैं.कैसे काेई घटना के वक्त संस्कृति, खान-पान की आदतें देखकर, बहुत-सी कंपनियां भी मैदान में कूद पड़ती हैं. वे किसी भी प्रसिद्धि काे खूब भुना लेती हैं. बहुत-सी मशहूर कंपनियां अब झालमूड़ी काे पैकेट बंद खाने की तरह प्रस्तुत कर रही हैं. पांच, दस रुपये से लेकर पचहत्तर रुपये तक के पैकेट्स पेश किए जा रहे हैं. विदेश में रहने वाले एक लड़के ने बताया कि वहां के इंडियन स्टाेर्स पर इसकी मांग बढ़ी है, इसलिए दुकानदार भारत से मंगा रहे हैं. हाे सकता है कि दूसरे देशाें में भारतीय और बहुत से विदेशी भी इसे खाना चाहेंगे. दशकाें पहले अमेरिका की टाइम पत्रिका ने भारत के स्ट्रीट फूड पर एक लंबा लेख छापा था. इसमें बताया गया था कि अपने यहां सड़क किनारे मिलने वाली खाद्य सामग्री स्वादिष्ट और उच्चकाेटि की हाेती हैं.
 
जिस तरह से इन दिनाें झालमूड़ी चर्चा में है, वह बात हैरत में भी डालती है. पहले काेई ऐसी घटना हाेती थी, ताे कुछ ही लाेगाें काे पता चलती थी. लेकिन अब ताे मीडिया और साेशल मीडिया के जरिए यह पल की पल में न केवल अपने देश में बल्कि दुनियाभर में पहुंच जाती है. ऐसे में यह भी लग रहा है कि कहीं अतंर्राष्ट्रीय कंपनियां इस मामले में न कूद पड़ें और इसे सुपरफूड साबित कर दें. जैसे ही किसी खाद्य पदार्थ काे सुपरफूड घाेषित किया जाता है, वह अक्सर आम आदमी की पहुंच से दूर हाे जाता है.कुछ दिन पहले कराैंदा काे सुपरफूड घाेषित किया गया है. अपने गांवाें में कराैंदे की झाड़ियां याें ही उग आती हैं.गुलाबी, सफेद, कहीं-कहीं हरे, लाल रंग के ये नन्हे फल बहुत खट्टे हाेते हैं. इन्हें मिर्च के साथ छाैंककर, अचार डालकर, चटनी बनाकर या सब्जी, दाल में डालने के लिए सुखाकर, खटाई के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है.पकने पर इसे चिड़ियां और बंदर भी खूब खाते हैं, क्याेंकि तब इसका स्वाद खट्टा-मीठा हाे जाता है.
- क्षमा शमा