बाजीराव रोड, 27 मई (आ.प्र.) मनुष्य को भयमुक्त होना चाहिए. डर तभी समाप्त होता है, जब वेिशास पैदा होता है. मोरया हमारा है यह भावना मन में आते ही डर नहीं रहता. मोरया (श्री गणेश) कहते हैं कि डर छोड़ दो. क्योंकि जो डरा हुआ है, उसे भयमुक्त करने के लिए जो कहा (उपदेश दिया) जाता है, उसी को ‘गणेश गीता’ कहते हैं. यह विचार प.पू. गाणपत्य विद्यावाचस्पति स्वानंद पुंड शास्त्री महाराज ने व्यक्त किए. अधिकमास के पावन अवसर पर आयोजित प्रवचन श्रृंखला का समापन करते हुए वे ‘श्री गणेश गीता’ के अंतर्गत भक्तियोग पर निरूपण (प्रवचन) करते हुए बोल रहे थे. इस प्रवचन श्रृंखला का आयोजन श्रीमंत दगडूसेठ हलवाई सार्वजनिक गणपति ट्रस्ट और सुवर्णयुग तरुण मंडल की ओर से किया गया था. स्वानंद पुंड शास्त्री महाराज ने कहा, मोरया (श्री गणेश) की कृपा का अर्थ है आपके भीतर की नकारात्मक (बुरी) चीजों का भी सकारात्मकता में बदल जाना. आपके भीतर के अवगुणों का गुणों में परिवर्तित होना ही मोरया की कृपा का वास्तविक अर्थ है. यदि मोरया को समझना है, तो या तो एक बालक जैसी मासूमियत होनी चाहिए या फिर नारद जी जैसा दिव्य वैराग्य होना चाहिए. तभी उन्हें अनुभव किया जा सकता है. मोरया बताते हैं कि यह सब केवल भक्ति से ही साध्य होता है.
लोभ और मोह के सूक्ष्म अंतर को जानना बेहद ही जरूरी लोभ यानी जो चीजें हमारे पास नहीं हैं, उन्हें पाने के लिए छटपटाहट या कड़ा संघर्ष करना. दूसरों का पद, पैसा, प्रतिष्ठा और सामर्थ्य देखकर ‘यह मुझे भी मिलना चाहिए’ ऐसा महसूस होना ही लोभ है. प्रयास करके उसे पाने की इच्छा रखना गलत नहीं है, लेकिन मोह इससे अलग है. गलत या अनचाही चीजों के प्रति आकर्षण पैदा होना, विवेक खो देना और गलत खिंचाव में फंस जाना ही मोह है.