पेपर लीक पर आखिर समाज आवाज क्यों नहीं उठाता?

    28-May-2026
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लेख की शुरुआत शायरा अंजुम रहबर के शेर से, अंजुम तुम्हारा शहर है जिस तरफ, एक रेल जा रही थी और तुम याद आए! लेकिन अब ताे युग ही भूलने का है. जहां लाभ नहीं, काेई हित नहीं, वहां भला काैन- किसकाे याद रखें. आखिर भूलना एक बीमार समाज की आदत भी ताे है. लेकिन मन ताे मन ही ठहरा! वह चाहता है कि काेई उसे पल भर के लिए ही सही, पर याद ताे रखे. सफलता के शाेर में काेई उसकी ओर भी मुड़ कर ताे देखे.भूलना और याद करना-एक ही स्निके के दाे पहलू हैं. मनुष्य की चाहत हमेशा यही रही कि उसे इस जहां में याद रखा जाए. याद रखने से व्यक्ति की महत्ता ताे सिद्ध हाेती ही है, यह भी सिद्ध हाेता है कि व्यक्ति हाेना उपयाेगिता का सिद्धांत नहीं हाेता, बल्कि वह सब कुछ हाेता है, जिसमें उसके अपनाें की खुशी और आमजनाें की आशाएं शामिल हाेती हैं. प्रकृति चाहती है कि सब एक-दूसरे काे याद रखें, जिनके साथ उनका रहना संभव हाे पाया.
 
याद रखना मनुष्य का काैशल है और दूसरे का हक भी, क्याेंकि महसूस करना और स्मृतियां बुनना किसी मशीन का गुण नहीं हाेता. लेकिन वह स्मृतियाें का नायक अब उस समाज का हिस्सा बन रहा है, जहां किसी काे याद रखना समय की बर्बादी है और दिल पर अनावश्यक बाेझ.यही आधुनिक सत्य है, और प्रजातंत्र का उभरता दर्शन. बस निर्ममता से भूलना सीखिए और निर्लज्जता के साथ जिया करिए. बस ‘अपने’ सुख-दुख काे महसूस करिए, बाकी सब बेमानी है. नहीं ताे हर बार काेई परीक्षा याें ही ताे लीक नहीं हाे जाती और फिर उस लीक काे आसानी से भुला भी नहीं दिया जाता. कहीं आपने सुना कि पैरेंट्स या छात्र डेलीगेशन इस समस्या पर काेई सामूहिक आवाज या असहमति दर्ज कराना चाह रहे हैं? थाेड़ा शाेर हाेगा और फिर सब कुछ भुला दिया जाएगा. भुला दिया जाएगा वह सब कुछ, जाे खुद के लाभ-हानि से नहीं जुड़ा हाेगा.
 
नीट की परीक्षा समाप्त हुई और समाप्त हुआ वह सफर, जिसे अभी शुरू हाेना था. आखिर क्या बीती हाेगी उन छात्राें पर जाे सच्चाई और ईमानदारी से परीक्षा देना चाहते थे. लीकेज मानाे एक डरावना स्वप्न बन उन अभ्यर्थियाें के सपनाें पर ग्रहण लगाता रहता है.आखिर वे सभी इंसान थे, एक सुकून की जिंदगी जीना चाह रहे थे. लेकिन उनके सारे प्रयास पानी में डूब गए, आग में भस्म हाे गए. कुछ भी नहीं बचा. जाे बचा वह सिर्फ अवशेष था, क्रंदन था और किसी के हिस्से की यादें थीं. मां से लिपटा बेटा यह समझ नहीं पाया कि सिस्टम की गहराई नदी या तालाब की गहराई से अधिक हाेती है और वह सभी काे डूबने से नहीं बचा सकती.डूबना एक नियति है और तैरना एक दक्षता, जाे सिस्टम काे भी डूबने से बचा ले जाता है. वृंदावन से बिलासपुर तक, गाजियाबाद से दिल्ली तक पानी और आग गवाह बने उस निर्दयता, निष्ठुरता और बेपरवाह भाव में डूबतेजलते उस मानव समाज के, जिसके दरख्ताें में मानाे पूरी तरह दीमक लग चुका है, क्याेंकि वह कभी चुनाव परिणाम से दुखी हाे रहा है, ताे कभी खुश.
 
उसे क्या पड़ी है कि काैन डूबा और काैन उतरा. वह ताे उस समाज में जी रहा है, जहां दूसराें के दुखाें काे दूसरा ही समझा जाता है. उसे ताे अपने घर में भी कई दूसरे लगने लगते हैं.अगर जीवन यात्रा है, ताे सभी यात्री हैं और यात्रियाें काे अपने सामान और खुद की सुरक्षा स्वयं करनी चाहिए. और आग से बचने और गहरे पानी में तैरने की कला भी सीखनी चाहिए. और यह भी कि जीवन और मृत्यु सत्य है और प्रजातंत्र में सभी काे सत्य स्वीकार करना चाहिए. यह न भूलिए कि सिस्टम का व्यवहार भी मनुष्य ही तय करता है.भूलना एक आदत है और शायद आधुनिक हाेना भी. पहले मां-बाप भुला दिए जाते हैं, फिर जीवन साथी, फिर बच्चे भूलते हैं, फिर सिस्टम, फिर समाज, और फिर देश!
 
सब एक-दूसरे काे भूलते जाते हैं. बस जाे नहीं भूलता, वह फाेन में चिपका सिम और मेमाेरी कार्ड हाेता है. वह अगर खाे भी जाता है, ताे वापस दुबारा मिलने की संभावना रहती है. किसी मनुष्य का शरीर छाेड़ जाना, फिर लाैटना नहीं रह जाता. लेकिन उस दिन वह शरीर लाैटा, क्याेंकि जीतू मुंडा काे अपनी बहन की कब्र दाेबारा खाेदनी पड़ी. उसे क्या पता था कि बैंक कर्मचारी किसी के मरने के बाद बिना डेथ सर्टिफिकेट के पैसा निकालने का अधिकार नहीं देते. उसकी बहन का जब देहांत हुआ, ताे उसके अकाउंट में कुछेक हजार रुपये बचे हुए थे. अपनी गरीबी और अशिक्षा में धंसा जीतू यह समझ ही नहीं पाया कि आजादी के इतने साल बाद भी जीवन के बुनियादी मूल्य अनुत्तरित क्याें हैं! इसलिए उसे कागजाें के सबूताें का नियम भी समझ में नहीं आया.
शायद उसे यकीन था कि विकसित दुनिया में संवेदनशीलता और करुणा से बहुत कुछ संप्रेषित हाे सकता है. पर बैंक काे ताे सर्टिफिकेट चाहिए था.
- नन्दितेश विलय