यह नहीं कह सकते कि प्रकृति ने आपकाे गिरा दिया

    03-May-2026
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Osho
 
प्रश्न: आश्चर्य की बात है कि पशुओं में पाखण्ड या मिथ्याचरण नाममात्र भी नहीं है और आदिवासियाें में भी अत्यल्प है, जब कि तथाकथित शिक्षित व सभ्य समाज में सर्वाधिक है. ताे ्नया बर्बरता से सभ्यता की ओर मनुष्य की लम्बी व कठिन यात्रा व्यर्थ ही गई? और तब ्नया आदिवासी व्यवस्था वरण्य नहीं है?
 
पशुओं में मिथ्याचरण नहीं है, पाखण्ड नहीं है, इसलिए नहीं कि पशुओं की काेई उपलब्धि हैं, बल्कि इसलिए कि पशु असमर्थ हैं. पशु पाखण्डी हाे नहीं सकते, हाेने का उपाय नहीं हैं; बुरे हाेने की काेई सुविधा नहीं हैं; पतित हाेने की काेई सम्भवना नहीं है.लेकिन चूँकि पशु पतित नहीं हाे सकते, पशु दिव्यता का आराेहरण भी नहीं कर सकते. जाे गिर नहीं सकता, वह ऊपर भी उठ नहीं सकता. और जिसके जीवन में पाप की सम्भावना नहीं हैं, उसके जीवन में परमात्मा की सम्भावना भी नहीं है. पशु मूर्च्छित है; प्रकृति उससे जैसा कहती है, वह करता है. यन्त्रवत् उसकी यात्रा है.उसकी काेई स्वेच्छा नहीं है. इसलिए बुरा भी पशु कर नहीं सकता; भला भी नहीं कर सकता. प्रकृति जाे करातीहै, वही करता है.
 
पशु की अपनी काेई निजता नहीं है, इसलिए पशु न ताे असाधु हाे सकता है-न साधु; न महा पापी हाे सकता है-न महा सन्त. पशु, पशु ही रहेगा.पशु पूरा का पूरा पैदा हाेता है. उसकी काेई स्वतन्त्रता नहीं है कि अपने काे बदल ले, रूपान्तरित कर ले.स्वभावतः पशु पाखण्डी नहीं है, लेकिन पशु काे यह भी स्मरण नहीं हाे सकता कि वह पाखण्डी नहीं है.और पाखण्ड काे छाेड़ने से जाे जीवन में गरिमा आती है, वह भी पशु काे नहीं हाे सकती. मनुष्य की गरिमा यही है कि वह पाप कर सकता ै, चाहे ताे पाप करना छाेड़ सकता है. छाेड़ने की खूबी है, क्योंकि करने की सुविधा है.जहाँ आप कर ही न सकते हाें, वहाँ छाेड़ने का काेई अर्थ नहीं है. नपुंसक ब्रह्मचारी हाे, ताे इसकी काेई सार्थकता नहीं है. ब्रह्मचर्य की सार्थकता तभी है, जब काम में उतरने की क्षमता हाे.
 
ताे मनुष्य के लिए सम्भावना है कि गिर सके, और मनुष्य के लिए सम्भावना है कि उठ सके; दाेनाें द्वार खुले हैं. मनुष्य परिपूर्ण स्वतंत्र है, इसलिए जिम्मेदारी आपकी है.अगर आप गिरते हैं, ताे आप यह कह नहीं सकते कि प्रकृति ने मुझे गिरा दिया. आप चाहते, ताे न गिरते.आप चाहते, ताे रूक जाते. आप चाहते, ताे जिस शक्ति से आपने पतन की यात्रा पूरी की, वही आपके स्वर्ग का मार्ग भी बन सकती थी. इसलिए मनुष्य स्वतन्त्र है, और साथ ही जिम्मेवार है.पश्चिम का बहुत बड़ा आधुनिक विचारक सार्त्र मनुष्य के लिए दाे शब्दाें का उपयाेग करता है-एक हैः फ्रीडम, और दूसरा हैः रिस्पाॅन्सिबिलिटी; एक हैः परिपूर्ण स्वतन्त्रता और दूसरा हैः परिपूर्ण गहन दायित्व.जाे स्वतन्त्र है, उसका दायित्व भी है. जाे स्वतन्त्र नहीं है, उसका काेई दायित्व नहीं है.