वाणीभूषण प. पू. प्रीतिसुधाजी का देवलोकगमन
पुणे के वर्धमान प्रतिष्ठान में अंतिम दर्शन : लोणीकंद के क्षेत्रपाल प्रतिष्ठान में दी गयी अंतिम विदाई
03-May-2026
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पुणे, 1 मई (आज का आनंद न्यूज नेटवर्क) संस्कारभारती वाणीभूषण प. पू. प्रीतिसुधाजी म. सा. (उम्र 83) का शुक्रवार (1 मई) को प्रातः 1.12 बजे संथारासहित देवलोकगमन हुआ है. उनकी अंतिम बिदाई दोपहर 4 बजे क्षेत्रपाल प्रतिष्ठान, लोणीकंद (पुणे) में हुई. उनके महा-समाधि दर्शन के लिए वर्धमान प्रतिष्ठान (सेनापति बापट रोड, पुणे) में सुबह 7 से 9 बजे तक पुणे के प्रतिष्ठित गणमान्य उपस्थित थे. प्रातः 9 बजे के बाद उनकी अंतिम डोली ने लोणीकंद (पुणे) के लिए प्रस्थान रखा और सुबह 11 से दोपहर 4 बजे क्षेत्रपाल प्रतिष्ठान, लोणीकंद में दर्शन के लिए रखा गया था. इस अवसर पर विविध प्रांतों से श्रद्धालुओं ने आकर उनका अंतिम दर्शन किया.
आचरण, अनुकरण और समर्पण का उदाहरण प्रीतिसुधाजी म. सा. का जीवन आचरण, अनुकरण और समर्पण के तीन सूत्रों से बना था. प्रीतिसुधाजी म. सा. उर्फ लीला भीकमचंदजी रायसोनी का जन्म 1 अगस्त 1943 को नासिक में हुआ था. शांता रायसोनी उनकी मां का नाम था. धर्म और धार्मिकता, अध्यात्म और आध्यात्मिकता, जैन धर्म और जैनत्व से वह बचपन से ही जुड़ी हुई थीं. तेज बुद्धि, हर चीज को विश्लेषण के साथ समझने की प्रवृत्ति और निरीक्षण क्षमता यह उनके खास गुण थे, जिन्होंने उन्हें उनके जीवन में सफल बनाया.
मां और बेटी ने एक साथ ली दीक्षा
जन्म के ठीक 19 साल बाद, उन्होंने 7 मार्च 1962 को अपनी मां के साथ दीक्षा ली. लीलावती प्रीतिसुधाजी बन गईं. प्रीतिसुधाजी के पहले गुरु प. पू. श्री कल्याणऋषिजी म. सा. जी थे. दीक्षा के बाद 1968 तक मोहनऋषिजी म. सा. और श्री उज्ज्वल कुमारीजी म. सा. के सानिध्य में रह कर मां-बेटी ने बड़ी लगन से धर्म का पालन किया. अेिश क्षेत्री प्रीतिसुधाजी ने अपना पहला प्रवचन दिया. वह इतना प्रभावशाली हो गईं कि उनके पहले ही प्रवचन में बहुत भीड़ जमा हो गई.
दिल्ली में कभी न भूलने वाला चातुर्मास प्रीतिसुधाजी म. सा. का 1972 का चातुर्मास दिल्ली के चांदनी चौक में था. यह भगवान महावीर का 2500 वां निर्वाण महोत्सव था. इस समय प. पू. आचार्य विद्यानंदजी महाराज (दिगंबर), प. पू. देशभूषणजी महाराज (दिगंबर), साध्वी विचकनजी म. सा. (मूर्तिपूजक), पूर्व आचार्य श्री तुलसीजी म. सा., युवाचार्य महाप्रज्ञजी म. (तेरापंथी), क्रांतिकारी संत प. पू. श्री सुशीलकुमारजी म. सा. के साथ माताजी म. सा और प्रीतिसुधाजी म. सा. (स्थानकवासी) ऐसे सभी जैन मुनि और साध्वियां इकट्ठा हुए थे. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी उनके प्रवचनसे मंत्रमुग्ध हो गईं थीं.
घाटकोपर-मुंबई का चातुर्मास प्रीतिसुधाजी ने अपने जीवन में अनेक जगहों पर चातुर्मास किया. लेकिन उनके कुछ चातुर्मास विशेष रहें. 1982-83 का चातुर्मास क्रांतिकारी था. उन्होंने संवत्सरी के दौरान बड़े पैमाने पर होने वाली गोहत्या को रोकने के लिए एक आंदोलन शुरू किया. देवनार मुंबई का सबसे बड़ा स्लॉटर हाउस है. आचार्य विनोबाजी के साथियों अच्युत देशपांडे और कालिंदीताई के साथ उन्होंने घाटकोपर से देवनार तक तीन बार पदयात्रा की. तीसरी पदयात्रा में करीब 10 हजार लोग शामिल थे. इस आंदोलन से पूरा मुंबई हिल गया था. जहां पहले हर दिन 1500 जानवरों की हिंसा होती थी, वह संख्या दो सौ तक आ गई. अहिंसा का यह असली आंदोलन एक सफल आंदोलन बन गया.