गुरजिएफ ने अपनी पहली किताब छापी; ताे उसके दाम रखे उसने- एक हजार रुपए. उस जमाने में, आज से पचास साल पहले, एक हजार रुपया बहुत कीमती चीज थी. आज से डेढ़ साै साल पहले ब्रिटिश गवर्नमेंट ने पूरा का पूरा कश्मीर गुलाब सिंह काे, कर्णसिंह के दादा-परदादा काे, र्सिफ तीस लाख रुपए में बेच दिया था.पूरा कश्मीर! और आज से तीन साै साल पहले पूरा न्यूयाॅर्क वहां के आदिवासियाें ने परदेश से आए हुए लाेगाें के लिए र्सिफ तीस रुपए में बेच दिया था- पूरा न्यूयाॅर्क! आज से पचास साल पहले हजार रुपए की बड़ी कीमत थी. जाे भी लेने की साेचता किताब, उसकी हिम्मत न हाेती. हजार रुपए! लाेग गुरजिएफ से पूछते कि किसी बुद्धपुरुष ने कभी अपनी किताबाें के ऐसे दाम नहीं रखे? गुरजिएफ कहता, उनकी वे जानें. मेरी मैं जानता हूं.
जाे आदमी हजार रुपए नहीं चुका सकता, उसकी काेई अभीप्सा, आकांक्षा नहीं है. सत्य मुफ्त नहीं मिलता. और तुम धन की ही एकमात्र भाषा तुम समझते हाे. उसकाे ही छाेड़ने में तुम्हारी आत्मा एकदम कष्ट पाने लगती है.ताे गुरजिएफ ने अपनी किताब... एक हजार पन्नाें की किताब है. उसमें साै पन्ने भूमिका के कटवा रखे थे. और बाकी नाै साै पन्ने जुड़े हुए थे; काटे नहीं थे. ताे वह कहता कि तुम ले जाओ. साै पन्ने पढ़ लेना.अगर न जंचें, ताे अपने हजार रुपए वापस ले जाना और किताब वापस कर देना.अगर जंचें ताे ही आगे के पन्ने काटना. नहीं ताे काटना मत. काट लिए, ताे िफर किताब वापस नहीं लूंगा.लेकिन वे साै पन्ने इतने अद्भुत थे कि मुश्किल था कि आदमी बिना काटे बच जाए. मगर उसने ताे बात साफ कर दी थी कि साै पन्ने पढ़ लाे. मुफ्त पढ़ लाे.िफर आगे मत काटना. अपने पैसे वापस ले जाना. किताब लाैटा देना.