अब नए शहराें काे बहुत तैयारी से बनाना चाहिये?

    04-May-2026
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हमारे शहर एक द्वैत काे जीते हैं. एक तरफ, इनमें तमाम सहूलियताें से यु्नत रिहायशी इलाके हैं, ताे दूसरी तरफ ऐसे क्षेत्र भी हैं, जहां बुनियादी सुविधाएं तक मयस्सर नहीं. दिल्ली, मुंबई, बेंगलरू जैसे तमाम महानगराें व बड़े शहराें का यही हाल है. इसी कारण,यहां तेज रफ्तार जिंदगी भी दिखती है, ताे उस जीवन के कदम-कदम पर परीक्षा लेती कुव्यवस्थाएं भी.कभी-कभी इसकी कीमत इंसान अपनी जान देकर चुकाता है.जिसकी तस्दीक महानगराें से हर कुछ अंतराल पर ‘माैत के गड्डे’ या ‘माैत ने नाले’ शीर्षक खबराें से हाेती रहती है.बिहार में 11 शहराें में ‘सैटेलाइट टाउन’ बनाने की नई घाेषणा काे भी हमें इसी नजर से परखना चाहिए. एक बात स्पष्ट है कि आर्थिक विकास व शहरीकरण, एक ही स्निके के दाे पहलू हैं, यानी जब किसी क्षेत्र का शहरीकरण हाेता है, ताे उसका आर्थिक विकास भी साथ-साथ चलता रहता है.
 
यह 11 उप-नगर भी इस मामले में अपवाद साबित नहीं हाेंगे.गैर-कृषि क्षेत्राें में आर्थिक विकास के अनुरूप मैन्युफै्नचरिंग व सेवा क्षेत्र के यहां विकसित हाेने की पूरी संभावना है.वास्तव में, इन शहराें से बिहार ही नहीं, पूरे देश काे लाभ मिलेगा, मसलन, बिहार की प्रतिव्य्नित आय अभी बेहद कम है और शहरीकरण के मामले में भी इसकी गिनती निर्धारित मानकाें में निचले पायदानाें पर हाेती है. यहां के शहराें में इन्फ्रास्ट्र्नचर का स्तर भी काफी नीचे है और मैनहाेल, सड़क, नाली स्थानीय निकायकी आर्थिक स्थिति आदि तमाम मानकाें में वे अब भी बहुत ऊपर नहीं आ सके हैं. ऐसे में, अगर यहां ‘लैंड पूलिंग नीति’ के अनुसार 11 ऐसे उप-नगर विकसित किए जा रहे हैं, जहां हाइटेक उद्याेग स्थापित हाे सकेंगे या सूचना-प्राैद्याेगिकी, अनुसंधान व विकास, फार्मास्यूटिकल्स और फिनटेक (आर्थिक सेवाएं देने वाली संस्थाएं) से जुड़ी कंपनियां काम कर सकेंगी, ताे लाभ यहां के बाशिंदाें काे भी हाेगा.
 
इन कंपनियाें के लिए यहां आना आसान है क्योंकि यहां न सिर्फ उनकाे कामकाज का अनुकूल माहाैल मिल सकता है, बल्कि उन्हें बिहार की जनसांख्यिकी का लाभ भी मिल सकेगा. नतीजतन, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, दिल्ली, नाेएडा, आदि इलाकाें में जिस तरह का व्यावसायिक माहाैल ै, उसमें बिहार भी शुमार हाे सकता है. इससे यहां से श्रम का पलायन कुछ हद तक रुक सकता है.ऐसा देश के तमाम राज्याें में किया जाना चाहिए. हालांकि, इसके साथ चुनाैतियां भी कम नहीं हैं. जैसे-नए उप-नगर या शहर बसाने में सबसे बड़ी बाधा आती है भूमि अधिग्रहण करने में अच्छी प्रक्रिया ताे यही है कि इसे सहभागिता के आधार पर अंजाम दिया जाए. बुनियादी ढांचाें काे विकसित करने के बाद यदि भू-स्वामियाें काे विकास-कार्याें में भागदीार बनाया जाता है, ताे उसका दाे तरफा लाभ मिलता है.
 
एक-व्यवस्था पर लाेगाें का भराेसा मजबूत हाेत है. और दूसरा-भूमि अधिग्रहण से हाेने वाला असंताेष कम हाे जाता है.बिहार इस तरह की सहभागिता काे खासा महत्त्व दे रहा है. इन 11 उप-नगराें में बुनियादी ढांचाें के विकास के बाद 55 प्रतिशत विकसित भूमि भू-स्वमियाें काे पावस कर दी जाएगी. भू-स्वामियाें काे लाभ में शेयर हाेल्डर बनने का फायदा भी मिलेगा. गाैरतलब है कि गुजरात, महाराष्ट्र में यह नीति सुफलतापूर्वक लागू की जा चुकी है. गुरुग्राम, नाेएडा, और नवी मुंबई में भी हम उप-नगर बनाने की नीति के लाभ देख चुके हैं. इसे बनाते समय गुजरात, नाेएडा और गुरुग्राम के अनुभवाें से भी सीख लेनी चाहिए, ताकि याेजना का तेजी से अनुपालन हाे.इसमें दाेराय नहीं कि शहराें के सुनियाेजित विकास और आर्थिक गतिविधियाें के लिए केंद्राें के निर्माण से राज्य काे अर्थव्यवस्था में सकारात्मक बदलाव आता है.
 
इससे राेजगार के अवसर बढ़ते हैं. दरअसल, काेई भी नगर अपने-आप राेजगार पैदा नहीं करता, वहां इस बाबत माहाैल बनाना पड़ता है. हाईटेक शहराें में आईटी उद्याेग स्थापित हाेते हैं, जिससे संगठित क्षेत्र में राेजगार ताे बढ़ता ही है, असंगठित क्षेत्र में भी तरह-तरह के कामकाज का विस्तार हाेता है. माना जाता है कि विनिर्माण-केंद्र का एक कर्मचारी पराेक्ष रूप से आठ आदमियाें के लिए काम पैदा करता है. विनिर्माण क्षेत्र में 99 प्रतिशत श्रमिक असंगठित क्षेत्र से आते है. इस तरह संगठित क्षेत्र में राेजगार से असंगठित क्षेत्र काे भी लाभ पहुंचता है, जाे एक बड़ी आबादी के राेजगार की अभी धुरी है.
 
नए शहराें के साथ नई आपूर्ति-श्रृंखलाओं की भी शुरुआत हाेती है. जैसे-जैसे शहर विकसित हाेते रहते हैं, इन श्रृंखलाओं में शामिल मानव संसाधनाें का भी विकास हाेता रहता है. इससे भी छाेटे शहराें में राेजगार के नए अवसर पैदा हाेते हैं. चूंकि सैटेलाइट शहराें के बसने से माैजूदा बड़े शहराें पर आबादी और संसाधनाें का बाेझ कम हाेता है, इसलिए इन उप-नगराें काे सरकाराें व नाागरिकाें, दाेनाें के मुफीद माना जाता है. नए शहराें या उप-नगराें के लिए जल-संसाधन की उपलब्धता एक बड़ा पहलू है. किसी भी नगर काे बसाने से पहले इसका सर्वे किया जाता है कि वहां बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता में किस तरह की मुश्किलें आ सकती हैं.
 
इन सब कार्माें के लिए विशेष एजेंसी बनाई जाती है, जैसे नाेएडा या नवी मुंबई में हमने देखा है. यह उस शहर के स्थानीय निकाय से अलग हाेकर काम करती है.हालांकि, बाद में उचित व्नत आने पर उनमें बदलाव किया जाता है. या फिर स्थानीय निकाय में विलय.एक बात और इस तरह के उप-नगर इस संकल्पना के साथ बनाए जाते हैं कि उस उपनगर के भीतर काम पर आनेजाने में 15 मिनट से अधिक का व्नत नहीं लगे. इसीलिए, इनमें आवाजाही के बेहतर साधन उपलब्ध कराए जाते हैं और सड़काें का निर्माण मानकाें के अनुरूप किया जाता है. इनसे बसे न सिर्फ यहां ‘माेबिलिटी’ अच्छी हाेती है, बल्कि बेहतर गुणवत्ता वाली शहरी सुविधाएं भी विकसित हाेती हैं.
- के के पाण्डेय, नगर नियाेजन विशेषज्ञ