हर धार्मिक प्रथा काे काेर्ट में चुनाैती देना ठीक नहीं : सुप्रीम काेर्ट

    08-May-2026
Total Views |
 
 

SC 
सुप्रीम काेर्ट ने गुरुवार काे कहा कि अगर लाेग धार्मिक प्रथाओं और धर्म के मामलाें काे संवैधानिक अदालत में चुनाैती देने लगेंगे, ताे इससे धर्म और सभ्यता पर असर पड़ सकता है. काेर्ट ने कहा कि इससे सैकड़ाें याचिकाएं आएंगी और हर रिवाज पर सवाल उठने लगेंगे. यह टिप्पणी नाै जजाें की संविधान पीठ ने की, जाे अलगअलग धर्माें में धार्मिक आजादी के दायरे और महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़े मामलाें की सुनवाई कर रही है.इसमें केरल के सबरीमाला मंदिर से जुड़ा मामला और दाऊदी बाेहरा समुदाय का केस भी शामिल है.सुप्रीम काेर्ट ने बुधवार काे 40 साल पुरानी जनहित याचिका की वैधता पर सवाल उठाए थे. जस्टिस नागरत्नने कहा कि अगर हर व्यक्ति धार्मिक प्रथाओं पर सवाल उठाएगा, ताे भारतीय समाज पर असर पड़ेगा. उन्हाेंने कहा, मंदिर खुलने या बंद हाेने तक के मामले काेर्ट में आएंगे.
 
जस्टिस एम एम सुन्द्रेश ने कहा कि अगर ऐसे विवादाें काे लगातार अनुमति दी गई, ताे हर व्यक्ति हर चीज पर सवाल उठाएगा. उन्हाेंने कहा कि इससे धर्म टूट सकते हैं और संवैधानिक अदालताें पर भी असर पड़ेगा.यह मामला दाऊदी बाेहरा समुदाय से जुड़ा है. समुदाय के केंद्रीय बाेर्ड ने 1986 में जनहित याचिका दायर की थी, जिसमें 1962 के फैसले काे चुनाैती दी गई थी. उस फैसले में बाॅम्बे प्रिवेंशन ऑफ एक्स कम्युनिकेशन एक्ट, 1949 रद्द कर दिया गया था. इस कानून के तहत किसी सदस्य काे समुदाय से बाहर करना गैरकानूनी था.1962 के फैसले में कहा गया था कि धार्मिक आधार पर किसी सदस्य काे समुदाय से बाहर करना, समुदाय के धार्मिक मामलाें के प्रबंधन का हिस्सा है. इसलिए 1949 का कानून संविधान के अनुच्छेद 26 (बी) के तहत मिले अधिकाराें का उल्लंघन करता है.