गैस की किल्लत बढ़ने से जनता की परेशानी बढ़ी

    08-May-2026
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काॅमर्शियल गैस सिलेंडर के दाम 993 रुपये और महंगे हाे गए हैं. जाहिर है, यह अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्राे उत्पादाें की चढ़ती कीमताें और पश्चिम एशिया में जारी तनाव का दुष्प्रभाव है. हाेटल, ढाबा और रेस्टाेरेंट चलाने वाले काराेबारी स्वाभाविक ही इस मूल्य-वृद्धि से परेशान हाेंगे.इसका असर खाने-पीने की चीजाें की कीमताें पर पड़ना लाजिमी है, जिसके कारण बाहर खाने वाले लाेग इससे खास प्रभावित हाेंगे. अब घरेलू गैस सिलेंडराें के दाम काे लेकर आशंकाएं गहराने लगी हैं.हाेर्मुज जलमार्ग पर तनाव से तेल की कीमतें बढ़नी ही हैं और इससे भारत में चिंता पैदा हाेना भी स्वाभाविक है. हालांकि, हालात में कुछ सुधार के संकेत उस व्नत मिले थे, जब भारत में ईरान के राजदूत ने 13 अप्रैल काे पत्रकाराें काे बताया था कि तेहरान का भारत सरकार के साथ लगातार संपर्क बना हुआ है.
 
उन्हाेंने यह भी बताया था कि इस जलमार्ग से गुजरने के लिए किसी भी भारतीय जहाज से काेई शुल्क नहीं लिया गया है.यह राहत 18 अप्रैल काे उस समय खत्म हाेती दिखी, जब ईरानी इस्लामिक रिवाेल्यूशनरी गार्ड काेर (आईआरजीसी) ने हाेर्मुज से गुजर रहे दाे भारतीय टैंकराें पर गाेलीबारी की. इससे माना गया कि ईरान में नेतृत्व के स्तर पर एक राय नहीं है. लिहाजा, माैजूदा समय की सबसे बड़ी जरूरत यही है कि ईरान के तमाम सत्ता-केंद्राें की पहचान की जाए और उनसे संपर्क बनाया जाए, ताकि भारतीय टैंकराें के प्रति एक समन्वित नीति बनाई जा सके.हालांकि, यह कहना जितना आसान है, करना उतना ही मुश्किल.इसी बीच, दिल्ली-एनसीआर के औद्याेगिक क्षेत्राें में कामगाराें का असंताेष भड़क उठा, जाे 13 अप्रैल काे हिंसक हाे गया था. उसी शाम मार्च महीने की महंगाई दर जारी हुई थी, जाे 3.4 प्रतिशत थी. फरवरी (3.2 फीसदी) की तुलना में इसमें बहुत मामूली वृद्धि हुई थी. हालांकि, इसमें मार्च में घरेलू गैस की कीमताें में हुई वृद्धि काे शामिल नहीं किया गया था.
 
यह सही है कि घरेलू गैस के दाम 60 रुपये बढ़ाए गए थे और एनसीआर में इसकी कीमत बढ़कर 913 रुपये प्रति सिलेंडर हाे गई है, लेकिन फैक्टरियाें में काम करने वाले श्रमिक आमताैर पर प्रवासी हाेते हैं, उनके पास पंजीकृत कनेक्शन नहीं हाेता है. इसलिए, इस मूल्य-वृद्धि के बाद अनाैपचारिक बाजार में दाे या पांच किलाे के सिलेंडर अधिक कीमत में भरे जाने लगे. ये श्रमिक इन्हीं सिलेंडराें का इस्तेमाल करते हैं.नए उपभाे्नता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) की आलाेचना नहीं की जा सकती, क्याेंकि इसे व्यवस्थित तरीके से आंका जाता है, पर जब अनाैपचारिक बाजार में घरेलू गैस की कीमत पांच गुना या उससे अधिक बढ़ जाती है, ताे आधिकारिक महंगाई दर का काेई महत्व नहीं रह जाता है. जिनके पास ईंधन नहीं हाेता है, वे उन्हीं दुकानाें, ठेले वालाें के भराेसे रहते हैं, जाे इन रिफिल किए जाने वाले सिलेंडराें से खाना पकाते हैं. दिल्ली में मुझे सड़क किनारे एक ऐसा ही ठेला वाला मिला, जाे 20 रुपये में दाेपहर का खाना खिला रहा था, लेकिन पहले की तरह पूरे कुलचे देने के बजाय वह आधा कुलचा ही दे रहा था.
 
ऐसे में, मजदूराें की जेब और पेट, दाेनाें पर सिलेंडर संकट की मार पड़ रही है.हमारे देश में औद्याेगिक श्रमिकाें के वेतन का निर्धारण राज्यस्तर पर हाेता है. हाल ही में, हरियाणा सरकार ने श्रमिकाें के महीनाें के आंदाेलनाें के बाद 1 अप्रैल, 2026 से न्यूनतम मजदूरी में 35 प्रतिशत की सराहनीय वृद्धि की.इस वेतन-वृद्धि ने पड़ाेसी राज्य उत्तर प्रदेश के नाेएडा के कामगाराें के मन में अपने कम वेतन काे लेकर नाराजगी पैदा की. यह सब ऐसे समय में हुआ, जब कच्चे माल और परिवहन लागत पर दबाव लगातार बढ़ रहा है. उत्तर प्रदेश सरकार ने काैशल के अनुरूप वेतन-वृद्धि की घाेषणा जरूर की है, लेकिन कामगाराें काे आशंका है कि यह वृद्धि शायद ही लागू हाे सकेगी, खासकर ठेकेदाराें के माध्यम से काम पर रखे गए श्रमिकाें के मामले में.साल 2025 के आवधिक श्रम-बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के अनुसार, विनिर्माण क्षेत्र में लगभग आधे श्रमिकाें काे हर माह अधिकतम 15,000 रुपये मिलते हैं.
 
यदि वे किसी ठेकेदार के जरिये काम कर रहे हाेते हैं, ताे इसमें से भी उसका कमीशन कट जाता है. अनाैपचारिक बस्तियाें में 100 वर्गफीट के एक छाेटे कमरे का मासिक किराया अमूमन 5,000 रुपये (यूटिलिटी खर्चाें काे छाेड़कर) हाेता है. इसलिए वे कम से कम 18,000 से 20,000 रुपये वेतन मांगते हैं. लेकिन पीएलएफएस, 2025 के आंकड़े बताते हैं कि विनिर्माण क्षेत्र में 25 फीसदी वेतनभाेगी कर्मियाें काे ही 20 हजार रुपये मासिक मिल पाते हैं.मजदूराें के माैजूदा असंताेष का बड़ा केंद्र नाेएडा है.वहां की कपड़ा और हाेजरी फैक्टरियाें में काम करने वाली ज्यादातर महिलाएं काम के घंटे कम करने (जाे अभी 12 घंटे बताए जाते हैं) और इस्तेमाल लायक टाॅयलेट की सुविधाएं देने की मांग कर रही हैं. इन फैक्टरियाें में मजदूराें की जिस कमी की बात कही जा रही थी, शायद उसी वजह से काम के घंटे इतने ज्यादा बढ़ गए हैं. मजदूराें की यह कमी खुद इस बात का संकेत है कि अमेरिकी टैरिफ बढ़ने के बाद काफी मजदूर वापस अपने गांव-घराें की ओर लाैट गए हैं. गैस की कीमताें में हुई बढ़ाेतरी ने उनके लिए हालात काे और अधिक प्रतिकूल बना दिया.
- इंदिरा राजारमन, (अर्थशास्त्री)