जाे है वह बड़ा परछाईं वाला खेल है, बिलकुल रिफ्लेक्शन का खेल चल रहा है. हमारे सुख-दुख बिलकुल ही ऐसे हैं.अब हिन्दुस्तान में एक चपटी नाक की लड़की पैदा हाे जाए, वह दुखी रहेगी जिन्दगी-भर क्याेंकि जाे परछाईं बनेगी, वह असुन्दर की बनेगी हर आंख में. वही लड़की चीन में पैदा हाे जाए वह दुखी नहीं रहेगी, क्याेंकि चपटी नाक सुन्दर है! अब वह दुख काहे का है, चपटी नाक का है? ताे वह चीन में भी हाेना चाहिए. चपटी नाक से काेई दुखी नहीं है. और कल अगर हम भी तय कर लें कि चपटी नाक सुन्दर है-और तय करने में काेई हर्जा नहीं है, काेई कठिनाई नहीं है, क्याेंकि नाक का काम चपटी नाक भी कर लेती है और लम्बी नाक भी कर लेती है.असली काम काम का है और जाे काम हाे रहा है भीतर वह र्सिफ....जैसे कि एक माेटरगाड़ी के पीछे साइलेंसर लगा हुआ है धुआं ेंकने का.
वह चपटा है कि लम्बा, काेई मतलब नहीं, क्याेंकि वह धुआं ेंकने का काम करता है. नाक केवल श्वास काे ले जाने ले आने के मार्ग से ज्यादा नहीं है, पैसेज ज्यादा नहीं है. पैसेज चपटी है कि नहीं है, इससे काेई मतलब नहीं है. काम पूरा हाे जाता है. ताे चाहें ताे चपटी नाक काे सुन्दर मान सकते हैं, चाहें ताे लम्बी नाक काे. यह मान्यता है र्सिफ.और लम्बे दिन तक मानते रहें ताे आदमी भूल जाता है कि जाे हम मान रहे उसका काेई मतलब है? मगर जहां ऐसी मान्यता है, वहां रिफ्लेक्शन दूसरा बनता है.चपटी नाक है ताे आदमी कुरूप हाे गया! अब वह चाैबीस घण्टे नाक के लिए ही काॅन्शस रहेगा. सब उपाय करेगा कि उसकी नाक पर आपका ध्यान न चला जाए.
और मतलब क्या है? समझ लें एक चपटी नाक का आदमी जंगल में है, जहां काेई दूसरा आदमी नहीं है. क्या कभी भी वह अपनी चपटी नाक के लिए दुखी हाेगा? दुखी नहीं हाेगा? क्याेंकि काेई प्रतिबिम्ब नहीं बनता, काेई परछाईं नहीं बनती. यह परछाई दिक्कत देती है.राहुल पहली दा रूस गए. ताे राहुल के हाथ बहुत खूबसूरत थे, बहुत मुलायम थे. और जब उन्हाेंने कभी कुछ काम किया नहीं, तब उनके हाथ मुलायम और खुबसूरत हाे ही जाएंगे, इससे काेई कठिनाई नहीं है.ताे जाे भी उनका हाथ देखता था वही कहता, बहुत बढ़िया बिलकुल स्त्रियाें जैसा सुन्दर हाथ है! रूस गए-पहले आदमी ने, जिसने स्टेशन पर स्वागत किया, हाथ मिलाकर खींच लिया!
और उसने कहा, आप अपना हाथ सम्हालकर रखना. जिससे भी मिलाएंगे, वही आपसे नफरत करेगा. क्याेंकि हमारे मुल्क में ऐसे हाथ काे हम मुफ्तखाेर का हाथ मानते हैं. इससे गट्टे नहीं हैं मज़दूर के. आपने कभी कुछ किया नहीं है, आप मुफ्तखाेर हैं. ताे राहुल ने कहा, बड़ी मुश्किल हाे गई! और राहुल ने कहा पूरे रूस में, मैं हमेशा सचेत रहा कि किसी काे हाथ मिलाऊं, ताे कहीं ऐसा न लगे कि...और जैसे ही हाथ मिलाया, दूसरे आदमी की आख में असर बदला और ाैरन लगे कि यह आदमी मुफ्तखाेर है. अब यह जाे मामला है न! अब हमकाे यह खयाल में नहीं आया कि सुन्दर हाथ हैं, हाथ मिलाने में अच्छा लगन चाहिए. लेकिन वह जाे आंख में तस्वीर बनती है अगर वह तय कर ले कि...हम सब परछाईंर् में जी रहे हैं, बहुत-बहुत तरह की परछाई में. मेरी ताे पूरी चेष्टा है, मेरी बात साेचना चाहिए, गलत, गलत लगे ेंक देना चाहिए, ठीक लगे उपयाेग कर लेना चाहिए.