इबाेला महामारी अभी ताे दूर है लेकिन तैयारी जरूरी

    01-Jun-2026
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भारत और अफ्रीकी संघ ने मई के अंतिम सप्ताह में नयी दिल्ली में आयाेजित हाेने वाले भारत-अफ्रीका फाेरम शिखर सम्मेलन स्थगित कर दिया है. ग्लाेबल बिग कैट पहल से जुड़ी एक अन्य अंतरराष्ट्रीय संरक्षण बैठक काे भी टाल दिया गया है. इस बीच भारत ने कांगाे लाेकतांत्रिक गणराज्य, युगांडा और दक्षिण सूडान की गैर-जरूरी यात्रा के खिलाफ एडवाइजरी जारी की है. यह सब तीन अफ्रीकी देशाें में इबाेला के प्रकाेप के कारण हुआ है. यह पहली बार नहीं है जब इबाेला ने वैश्विक कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय गतिविधियाें काे प्रभावित किया हाे. यह इस बात की भी याद दिलाता है कि संक्रामक राेगाें के प्रकाेप अब केवल स्वास्थ्य संबंधी मामले नहीं रह गये हैं.
 
डब्ल्यूएचओ ने 17 मई काे कांगाे लाेकतांत्रिक गणराज्य में बुनडिबुग्याे वायरस से फैले इबाेला के प्रकाेप के बाद इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति घाेषित की, फिर युगांडा और दक्षिण सूडान में भी इबाेला राेग के मामले सामने आये. इबाेला राेग इबाेला वायरस परिवार के कई वायरसाें के कारण हाेता है. जहां जायरे इबाेला वायरस के लिए वै्नसीन और कुछ उपचार संबंधी प्रगति उपलब्ध है, वहीं वर्तमान बीमारी बुनडिबुग्याे वायरस के कारण फैल रही है. जिसके लिए न लाइसेंस प्राप्त वै्नसीन है, न काेई प्रमाणित उपचार उपलब्ध हैं.बुनडिबुग्याे वायरस की पहचान पहली बार 2007 में युगांडा में हुई थी. अन्य इबाेला वायरसाें की तरह यह भी बुखार, अत्यधिक कमजाेरी, उल्टी, दस्त, र्नतस्राव, शाॅक और गंभीर मामलाें में कई अंगाें के फेल हाेने जैसी स्थिति पैदा कर सकता है.
 
भूमंडलीकृत विश्व में संक्रमण लेकर यात्रा करने वाला व्य्नित लक्षण गंभीर हाेने से पहले ही सीमाओं और महाद्वीपाें काे पार कर सकता है. काेविड के दाैरान हम यह देख चुके हैं. वर्तमान प्रकाेप का सबसे चिंताजनक पहलू इसकी पहचान में हुई देरी है. डब्ल्यूएचओ की रिपाेर्टाें के अनुसार, संभावित पहले मरीज में लक्षण शुरू हाेने और प्रयाेगशाला द्वारा पुष्टि हाेने के बीच चार सप्ताह का समय बीत गया. साथ-साथ फैल रहे आर्बाेवायरल संक्रमण, मलेरिया और फ्लू जैसे राेगाें ने चिकित्सकीयसंदेह काे जटिल बनाया और निदान में देरी की. भारत में आज तक और अब तक इबाेला का काेई मामला सामने नहीं आया है और यहां इसके व्यापक खतरा बनने की आशंका भी कम है.
 
पर दुनिया में कहीं भी हाेने वाला हर प्रकाेप मजबूत तैयारी और ऐसी प्रणालियां विकसित करने की तत्काल जरूरत की याद दिलाता है, जाे डब्ल्यूएचओ द्वारा ‘डिजीज ए्नस’या पैथाेजन ए्नस कहे जाने वाले खतराें का सामना कर सके. यह शब्द ऐसे अज्ञात राेगजनक के लिए प्रयाेग किया जाता है, जाे भविष्य में उभरकर गंभीर महामारी या वैश्विक महामारी फैला सकता है. फरवरी 2018 में डिजीज ए्नस काे डब्ल्यूएचओ की उन प्राथमिक बीमारियाें की सूची में शामिल किया गया था, जिनके लिए अनुसंधान और विकास में तत्काल निवेश की जरूरत है.आज महामारियाें का खतरा मानव इतिहास के किसी भी दाैर से अधिक है. ते शहरीकरण, वनाें की कटाई, जलवायु परिवर्तन, पारिस्थितिक असंतुलन, मनुष्य और पशुओं के बीच बढ़ते संपर्क, प्रवासन, संघर्ष और अभूतपूर्व वैश्विकआवाजाही ने संक्रामक राेगाें के उभरने और फैलने की आदर्श परिस्थितियां बना दी हैं, जबकि वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था कमजाेर हाेती जा रही है.
 
अंतरराष्ट्रीय फंडिंग और अमेरिकी मदद में गिरावट तथा डब्ल्यूएचओ के वित्तपाेषण में लगातार कमी से स्थिति गंभीर हाे गयी है.
निम्न और मध्यम आय वाले अनेक देशाें काे तब अधिक आत्मनिर्भर बनने की और धकेला जा रहा है, जब वैश्विक सहयाेग पहले से अधिक जरूरी हाे गया है.एक और चिंताजनक सच्चाई यह है कि बीमारियाें पर तब तक वैश्विक ध्यान नहीं दिया जाता, जब तक वे सीधे उच्च आय वाले देशाे काे प्रभावित न करें. इबाेला और कई अन्य उभरते राेगजनकाें की अब भी ‘अफ्रीकी समस्या’माना जाता है. इस कारण वै्नसीन, उपचार, जांच और निगरानी में निवेश तब तक अपर्याप्त रहता है. जब तक प्रकाेप अमीर देशाें की प्रभावित करना शुरू नहीं करते. बीमारियां उभरती हैं, अस्थायी वैश्विक चिंता पैदा करती हैं और विकसित देशाें का ध्यान हटते ही वैश्विक प्राथमिकताओं से गायब हाे जाती हैं.
 
ऐसे में, ग्लाेबल साउथ के देशाें काे बड़ी भूमिका निभानी हाेगी. खासकर भारत के पास वैज्ञानिक क्षमता और भू-राजनीतिक कद दाेनाें हैं, जिनकी मदद से वह एशिया और अफ्रीका में सामूहिक राेग तैयारी के लिए मजबूत ढांचा तैयार कर सकता है. भारत काे संयु्नत प्रकाेप निगरानी, प्रयाेगशाला नेटवर्क, वै्नसीन अनुसंधान, जीनाेमिक सी्नवेसिंग और उन बीमारियाे के लिए दवाओं के विकास में निवेश बढ़ाना चाहिए, जाे निम्न और मध्यम आय वाले देशाें काे अधिक प्रभावित करती हैं.बार-बार उभरते इबाेला और अन्य संक्रामक खतरे भारत जैसे कई देशाें काे अपनी तैयारी प्रणालियां मजबूत करने की भी याद दिलाते हैं. इसलिए ईमानदारी से कई आयामाें में आकलन हाेना चाहिए. पहला आयाम अंतरराष्ट्रीय संपर्क है. भारत के पूर्वी और मध्य अफ्रीका के साथ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हवाई संपर्क व्यापक हैं और हजाराें यात्री इन क्षेत्राें के बीच यात्रा करते हैं, दूसरा आयाम उपस्थिति है.
- डाॅ. चंद्रकांत लहारिया