डेक्कन, 10 जून (आज का आनंद न्यूज नेटवर्क) एंजियोप्लास्टी कराने वाले मरीजों की उम्र तो बढ़ रही है, लेकिन कई मरीज कुछ सालों बाद फिर से ब्लॉकेज, सिकुड़े हुए स्टेंट और जटिल कोरोनरी आर्टरी डिजीज (हृदय रोग) के साथ डॉक्टरों के पास वापस आते दिख रहे हैं. ऐसे मरीजों के लिए दोबारा स्टेंट लगाना, बार-बार इलाज करना या बाईपास सर्जरी एक कठिन विकल्प हो सकता है. ऐसी स्थिति में, सह्याद्रि सुपर स्पेशालिटी हॉस्पिटल (डेक्कन जिमखाना) में उन्नत कार्डिएक लेजर थेरेपी के कारण उपचार के नए विकल्प उपलब्ध हो रहे हैं. इस प्रौद्योगिकी (टेक्नोलॉजी) के बढ़ते उपयोग के बारे में बात करते हुए, डॉ. अभिजीत पलशीकर (निदेशक- कार्डियोलॉजी, सह्याद्रि सुपर स्पेशालिटी हॉस्पिटल) ने कहा, जिन मरीजों में पहले लगाए गए स्टेंट बेअसर साबित हुए हैं, उनमें हम उन्नत कार्डिएक लेजर तकनीक का उपयोग करके प्रभावी उपचार कर रहे हैं. हम कई लोगों को बाईपास सर्जरी से बचने में मदद कर रहे हैं. यह मिनिमली इनवेसिव (कम से कम चीर-फाड़ वाली) उपचार पद्धति रक्त प्रवाह को सुचारू करने, तेजी से ठीक होने में मदद करने और चुनिंदा मरीजों में अतिरिक्त स्टेंट या बाईपास सर्जरी को टालने में सहायता करती है. बताया गया कि एडवांस कार्डियक लेजर थेरेपी विशेष रूप से निष्प्रभावी हुए स्टेंट, जटिल ब्लॉकेज और कैल्सीफाइड (कड़ी हो चुकी) धमनियों के इलाज के लिए काफी उपयोगी साबित होती है. इसके तहत अधिकांश मरीजों को 24 घंटों के भीतर अस्पताल से डिस्चार्ज दे दिया जाता है. सह्याद्रि सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के डायरेक्टर डॉ. नीलेश सिंह ने कहा, एडवांस कार्डियक लेजर तकनीक की शुरुआत और इसका उपयोग मरीजों के लिए आधुनिक हृदय रोग उपचार को अधिक सुलभ बनाने के हमारे प्रयासों का प्रतिबिंब है.
हृदय रोगों का प्रमाण चिंताजनक रूप से बढ़ रहा अध्ययन के अनुसार भारत में कोरोनरी आर्टरी डिजीज के कारण होने वाली कुल मौतों में से 50 प्रतिशत से अधिक मौतें 50 वर्ष से कम उम्र के व्यक्तियों में होती हैं. इसके अलावा, हर चार हार्ट अटैक में से एक अटैक 40 वर्ष से कम उम्र के युवाओं को आता है. महाराष्ट्र में भी युवाओं में हृदय रोगों का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है. विशेष रूप से 30 वर्ष के आसपास के पुरुषों में और 40 से 60 वर्ष के आयु वर्ग की महिलाओं में इसके मामले दर्ज किए जा रहे हैं. पुणे में भी किशोरों और 30 वर्ष से कम उम्र के युवाओं में हार्ट अटैक की घटनाओं में वृद्धि हुई है. विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे गतिहीन जीवन शैली, अस्वास्थ्यकर खान-पान, बढ़ता मानसिक तनाव और जीवन शैली से जुड़े अन्य कारक मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं.