अभी मैं दाे-तीन दिन पहले ही दिल्ली में था. एक मित्र आए, उन्हाेंने कहा, मेरी पत्नी चल बंसी.साल भर हाे गया, लेकिन मेरी उदासी का काेई अंत नहीं, मेरा सारा जीवन उदास हाे गया है. मैं ्नया करूं ? ताे मैंने उनसे कहा कि संभावना यही है कि पत्नी मरी हाेगी, ताे आप राेए नहीं, दुखी नहीं हुए. आप दुख काे दबा गए और पी गए. दुख काे पी गए हैं, ताे अब वह दुख उनकी नस-नस और खून के कण-कण में फैल गया.वह निकल नहीं पाया, वह दब गया भीतर, वह सब तरफ फैल गया.जैसे कहीं से मवाद निकल रही हाे, ताे काेई भी नहीं कहेगा चिकित्सक कि इसकाे इबाना है कि रेचन करना है. फाेड़ा हाे गया ै, मवाद है, ताे उसे बाहर निकाल अलग कराे, सफाई कराे. लेकिन हाे सकता है कि काेई कहे कि इसे दबा कर भीतर कर लाे!
अपने शरीर का इतना हिस्सा खराब बाहर चला जाए ताे बड़ा नुकसान हाे जाएगा. वजन ताे जरूर थाेड़ा कम हाेगा ही. ताे इसे दबा लें भीतर, ऊपर से मलहम-पट्टियां कर लें मवाद काे अंदर कर दें.ताे फिर ध्यान रहे कि वह मवाद बाकी खून काे भी मवाद बना देगी. और यह भी ध्यान रहे कि वह पूरे शरीर काे सड़ा देगी. और यह भी धन रहे कि उससे आप स्वस्थ नहीं हाेंगे, और-और बीमार हाेते चले जाएंगे.ठीक ऐसे ही चित्त की वृत्तियां हैं. जिन्हें बाहर फेंकना चाहिए, उन्हें हम भीतर दबा रहे हैं. क्राेध काे हम भीमर दबा रहे हैं. काम काे हम भीतर दबा रहे हैं. लाेभ काे, भय काे हम भीतर दबा रहे हैं.लेकिन आप कहेंगे कि ्नया हम किसी पर भी क्राेधित हाे उठें?
मवाद की बात ताे बहुत दूसरी है, क्योंकि उसका दूसरे से काेई संबंध नहीं, मुझसे ही संबंध है. मेरे पैर में फाेड़ा है, मैंने मवाद बाहर निकाल दी.लेकिन क्राेध का मामला ताे बहुत दूसरा है.क्राेध ताे मैं किसी पर निकालूंगा. लेकिन इसे थाेड़ा यमझना जरूरी है. यह भी आवश्यक नहीं है ्निक क्राेध दूसरे पर निकालें.काेई ऐसा समाज भी हाे सकता है कि जब भी काेई मवाद निकालें दूसरे पर फेंके.
ताे उस समाज में बड़ी द्निकत खड़ी हाे जाएगी. क्राेध काे भी दूसरे पर निकालने की जरूरत नहीं है. क्राेध काे भी ध्यान में निकाला जा सकता है.दुख काे भी दूसरे पर निकालने की जरूरत नहीं है. दुख काे भी ध्यान में निकाला जा सकता है. अकेले ही निकाला जा सकता है. क्राेध मेरा है ताे दूसरे की जरूरत ्नया है? अकेला ही निकल सकता है.