सभी प्रकार के खाद्य तेलों की कीमतें बढ़कर एक जैसी हुईं

सप्लाई चेन डिस्टर्ब होने, इंश्योरेंस के खर्चे बढ़ने का असर ; व्यापारियों में चिंता का माहौल

    11-Jun-2026
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गुलटेकडी, 10 जून (आज का आनंद न्यूज नेटवर्क)

पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होने के बाद कई वस्तुएं महंगी हो गई हैं, उनकी कीमतें बढ़ गई हैं. इसमें तेल एक बड़ा घटक है. पिछले तीन महीनों में खाद्य तेलों की कीमतें बढ़ी हैं. विशेष बात यह है कि व्यापारियों का कहना है कि लगभग सभी प्रकार के तेलों की कीमतें एक ही स्तर पर आ गई हैं, जो इससे पहले अलग अलग होती थी. भारत में आयातित खाद्य तेलों पर बढ़ती निर्भरता ने पुणे के व्यापारियों और उद्योग से जुड़े लोगों के बीच चिंता पैदा कर दी है, क्योंकि देश का आयात बिल साल-दर-साल लगातार बढ़ता जा रहा है. नीति निर्माताओं द्वारा खपत को कम करने और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के बार-बार किए गए आग्रह के बावजूद, घरेलू उत्पादन मांग के साथ तालमेल बिठाने में असमर्थ रहा है. व्यापारियों का कहना है कि युद्ध के कारण, सप्लाई चेन डिस्टर्ब हुई है. पहले जो तेल आने में समय लगता था, उसके मुकाबले फिलहाल ज्यादा समय लग रहा है. दूसरी बात यह है कि किराया और इंश्योरेंस के खर्चे काफी बढ़ गए है. इसी वजह से जो दाम बढ़े हुए हैं, वे वहां स्थिर हैं. आम तौर पर अप्रैल, मई और जून में तेल की बिक्री कम होती है, क्योंकि ऐसा है कि गर्मियों में वैसे भी लोग तेल कम खाते हैं. वही स्थिति अभी भी है. लेकिन जुलाई के बाद तेल की मांग बढ़ने की संभावना है.  
 
ईरान-अमेरिका युद्ध का बाजार पर साफ असर दिख रहा
 भारत में तिलहन की खेती, विशेष रूप से महाराष्ट्र में सोयाबीन उत्पादन में मजबूत क्षमता है, लेकिन स्थानीय प्रोसेसर अक्सर सस्ते आयातित तेलों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में संघर्ष करते हैं. युद्ध शुरू होने के बाद के समय में, वर्तमान में तेल बाजार में लगभग सभी प्रकार के तेलों की कीमतें एक समान हो गई हैं. आमतौर पर सबसे कम कीमत पाम तेल की और बढ़ते क्रम में सबसे अधिक कीमत मूंगफली के तेल की होती थी. हालांकि, वर्तमान में लगभग सभी के दाम एक जैसे ही यानी 2,500 से 2,600 रुपये प्रति डिब्बा (टीन) हो गए हैं. - रायकुमार नहार, तेल व्यापारी, मार्केट याड
 
लगभग 1.6 से 1.7 करोड़ टन आयात की आवश्यकता

 क्षेत्र के अनुमानों के अनुसार, 2025-26 की अवधि में भारत में खाद्य तेल की मांग लगभग 2.60 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है. हालांकि, घरेलू उत्पादन 1 करोड़ टन से कम रहने की संभावना है. इस कमी का मतलब है कि देश को अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए लगभग 1.6-1.7 करोड़ टन आयात करने की आवश्यकता हो सकती है.