विराेध या आक्राेश से राष्ट्र का भविष्य नहीं गढ़ सकते

    11-Jun-2026
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पाल के प्रधानमंत्री के हालिया बयान ने न केवल भारत-नेपाल सीमा विवाद काे चर्चा का विषय बना दिया है, बल्कि इसने तथाकथित जनरेशन जेड या जेन-जी की राजनीतिक परिप्नवता और शासन-दृष्टि पर भी व्यापक विमर्श काे जन्म दिया है. प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने नेपाली संसद में कहा कि सिर्फ भारत ने ही नेपाल की भूमि पर अतिक्रमण नहीं किया है, बल्कि नेपाल ने भी कुछ स्थानाें पर भारतीय भूमि पर कब्जा किया हुआ है. इस बयान के बाद नेपाल के भीतर ही तीखी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आईं और बाद में नेपाल के विदेश मंत्रालय काे स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा.सवाल केवल नेपाल तक सीमित नहीं है. बांग्लादेश, केन्या, सर्बिया, इंडाेनेशिया और विश्व के अनेक देशाें में उभरते ‘जेन-जी’ आंदाेलन इसी प्रश्न काे नए संदर्भाें में सामने ला रहे हैं. आंदाेलन का काम व्यवस्था की कमियाें काे उजागर करना है.
 
वह प्रश्न पूछता है, चुनाैती देता है और परिवर्तन की मांग करता है.किंतु शासन का कार्य कहीं अधिक जटिल हाेता है. उसे केवल समस्याओं की पहचान नहीं करनी हाेती, बल्कि उनके व्यावहारिक समाधान भी प्रस्तुत करने हाेते हैं. उसे आदर्श और यथार्थ, आकांक्षा और संसाधन, परिवर्तन और स्थिरता के बीच संतुलन स्थापित करना पड़ता है. यही कारण है कि इतिहास में अनेक क्रांतियां सफल हुईं, परंतु उनके बाद की व्यवस्थाएं अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सकीं.नेपाल का अनुभव इसी की पुनर्पुष्टि करता है. जिस युवा ऊर्जा ने स्थापित राजनीतिक संरचनाओं काे चुनाैती दी, सत्ता में आने के बाद वही ऊर्जा प्रशासनिक जटिलताओं, आर्थिक सीमाओं और संस्थागत बाधाओं से टकराने लगी.यह किसी व्य्नित या दल की विफलता का प्रश्न नहीं ै, बल्कि लाेकतांत्रिक शासन की स्वाभाविक चुनाैती है.
 
आंदाेलन की भाषा भावनाओं की हाेती है, जबकि शासन की भाषा प्रक्रियाओं, नीतियाें और उत्तरदायित्व की हाेती है. दाेनाें के बीच की दूरी काे पाटना किसी भी नए नेतृत्व के लिए सबसे कठिन परीक्षा हाेती है. ‘जेन-जी’ आंदाेलनाें की विशेषता उनका डिजिटल स्वरूप है. साेशल मीडिया ने इस पीढ़ी काे अभूतपूर्व श्नित प्रदान की है.अब राजनीतिक लामबंदी के लिए पारंपरिक संगठनात्मक ढांचे की जरूरत नहीं रही. एक वीडियाे, एक पाेस्ट या एक अभियान लाखाें लाेगाें काे प्रभावित कर सकता है. इससे लाेकतंत्र में सहभागिता बढ़ी है और सत्ता की जवाबदेही भी सुदृढ़ हुई है. किंतु डिजिटल शक्ति के साथ एक अंतर्निहित जाेखिम भी जुड़ा हुआ है. साेशल मीडिया तत्काल प्रतिक्रिया काे महत्व देता है, जबकि शासनदूरगामी परिणामाें काे ध्यान में रखकर निर्णय लेने की अपेक्षा करता है. लाेकतंत्र में जनसमर्थन आवश्यक है, परंतु केवल जनसमर्थन पर्याप्त नहीं है. उसे संस्थागत क्षमता, नीतिदृष्टि और प्रशासनिक परिप्नवता का भी सहारा चाहिए.
 
लाेकतंत्र की श्नित परिवर्तन में निहित है. जाे व्यवस्था समयानुकूल परिवर्तन की क्षमता खाे देती है, वह स्वयं काे सुरक्षित व प्रासंगिक बनाए रखने की शक्ति भी खाे बैठती है. इतिहास गवाह है कि समाज तब आगे बढ़ते हैं, जब वे अपनी त्रुटियाें काे पहचानने और स्वयं काे बदलने का साहस रखते हैं. इस दृष्टि से देखें, ताे जेन-जी आंदाेलनाें ने लाेकतांत्रिक व्यवस्थाओं काे चेतावनी दी है. उन्हाेंने स्मरण कराया है कि जनाकांक्षाओं की अनदेखी अंततः संकट का कारण बनती है.किंतु दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है. परिवर्तन का वास्तविक मूल्य उसके उद्घाेष में नहीं, बल्कि उसके संस्थागत रूपांतरण में निहित हाेता है.
 
केवल विराेध, आक्राेश और असंताेष किसी राष्ट्र का भविष्य नहीं गढ़ सकते. राष्ट्र का निर्माण नीतियाें, संस्थाओं, अनुशासन और उत्तरदायित्व से हाेता है. इतिहास साक्षी है कि जब परिवर्तन इन मूल्याें का स्वरूप ग्रहण नहीं कर पाता, तब वही क्रांति, जाे कभी आशा का प्रतीक थी, धीरे-धीरे माेहभंग का कारण बन जाती है.फ्रांसीसी क्रांति से लेकर अरब स्प्रिंग तक अनेक उदाहरण इस सत्य की पुष्टि करते हैं. परिवर्तन की ऊर्जा जितनी महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण उस ऊर्जा काे रचनात्मक दिशा देने की क्षमता है. आज ‘जेनजी’ आंदाेलनाें के समक्ष भी यही चुनाैती है. यदि वे केवल व्यवस्था-विराेध तक सीमित रहते हैं, ताे उनका प्रभाव क्षणिक रहेगा. - हरवंश दीक्षित