मौलिक विज्ञान को खोज के स्तर पर आगे बढ़ाना जरूरी

आईसर पुणे द्वारा आयोजित ‌‘विज्ञान और उद्यम को जोडना‌’ के विशेष कार्यक्रम में किरण मजूमदार-शॉ ने कहा

    13-Jun-2026
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पाषाण , 12 जून (आज का आनंद न्यूज नेटवर्क)

भारत के पास वैज्ञानिक प्रतिभा, नवीन विचार और वैश्विक नवाचार में अग्रणी बनने की महत्वाकांक्षा है. अब हमें ऐसे सिस्टम बनाने की जरूरत है, जो मौलिक विज्ञान को खोज के स्तर से आगे बढ़ाकर वास्तविक दुनिया में प्रभाव उत्पन्न करने तक ले जा सकें और विज्ञान और उद्यम को जोड सके. आईसर पुणे जैसे संस्थान बुनियादी अनुसंधान और उसके व्यावहारिक अनुप्रयोग के बीच इस कड़ी को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं, यह विचार प्रख्यात जैव-प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ और बायोकॉन लिमिटेड की कार्यकारी अध्यक्ष किरण मजूमदार-शॉ ने व्यक्त किए. विज्ञान की बारीकियों और उद्यमशीलता की सोच को मिलाते हुए प्रेरणादायक भाषण में, प्रख्यात जैव-प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ और बायोकॉन लिमिटेड की कार्यकारी अध्यक्ष किरण मजूमदार-शॉ ने युवा शोधकर्ताओं से समाज के लिए समाधान खोजने वाले (सोल्यूशन क्रिएटर) बनने का आह्वान किया. वह भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (आईसर,पुणे) में विज्ञान और उद्यम को जोड़ना (ब्रिजिंग साइंस एंड एंटरप्राइज) नामक विशेष कार्यक्रम को संबोधित कर रही थीं. सी. वी. रमन प्रेक्षागृह में आयोजित इस कार्यक्रम में लगभग 200 लोग शामिल हुए, जिनमें आईसर के संकाय सदस्य, छात्र, शोधार्थी और आमंत्रित व्यक्ति शामिल थे. उपस्थित लोगों में आस-पास के शैक्षणेिटेक और फार्मा सेक्टर के इंडस्ट्री पार्टनर के प्रतिनिधि भी शामिल थे. मजूमदार-शॉ का दौरा पोस्टर प्रस्तुति सत्र के साथ शुरू हुआ, जिसमें आईसर पुणे के चुनिंदा संकाय सदस्यों ने बायोलॉजिक्स, बायोसिमिलर्स, मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज और कॉन्जुगेटेड रिकॉम्बिनेंट प्रोटीन के क्षेत्रों में अपने शोध कार्य प्रस्तुत किए. उन्होंने ऑन्कोलॉजी, इम्यूनोलॉजी, डायबिटीज, नेत्र स्वास्थ्य और अस्थि स्वास्थ्य से संबंधित उपचार क्षेत्रों को लाभ पहुंचाने वाले ट्रांसलेशनल रिसर्च पर भी प्रकाश डाला. इस सत्र ने आमंत्रित अतिथियों को आईसर पुणे के शोधकर्ताओं के साथ बातचीत करने, चल रही परियोजनाओं के बारे में जानने, और विचारों का आदान-प्रदान करने के लिए मंच प्रदान किया. निदेशक प्रो. सुनील भागवत ने स्वागत भाषण दिया और आईसर पुणे के रिसर्च इकोसिस्टम के बारे में जानकारी दी. सहयोगी प्रोफेसर और सहयोगी अधिष्ठाता डॉ. कृष्णपाल करमोदिया ने धन्यवाद ज्ञापन किया.